Friday, October 30, 2020 04:02 AM

कितनी जहरीली है ‘थाली’!

कड़ी से कड़ी जुड़ रही है। परतें खुल रही हैं, लिहाजा चेहरे भी उघड़ रहे हैं। ये ऐसे चेहरे हैं, जिन्हें देश की जनता पलकों पर बिठाती रही है, बल्कि पलक-पांवड़े भी बिछाती रही है। आज वे चेहरे ‘आदर्श’ नहीं, भयभीत हैं। पूरी फिल्म इंडस्ट्री में हड़कंप मचा है -न जाने आगे किसकी बारी है? सभी सुपर स्टार, नायक और महानायक चुप्पी साधे हैं, मानो उनका कोई सरोकार नहीं है! छोटे से छोटे मुद्दे या घटनाक्रम पर टिप्पणियां करने वालों के सोशल मीडिया हैंडल बंद हैं-बिलकुल सफाचट! अब भी देश यह तोहमत देने या कलंक लगाने को तैयार नहीं है कि समग्र बॉलीवुड ‘नशेड़ी’ है। उसकी आड़ में ड्रग्स का खतरनाक कारोबार किया जा रहा है या ड्रग्स के अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट एक कलात्मक जमात को खोखला करने पर आमादा है! लेकिन दीपिका पादुकोण, सारा अली खान, श्रद्धा कपूर और रकुलप्रीत सिंह सरीखी प्रख्यात अभिनेत्रियों को नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) ने, ड्रग्स के संदर्भ में ही, समन किया है। क्या ये अभिनेत्रियां साररूप में बॉलीवुड नहीं हैं? जवाब प्रख्यात, बुजुर्ग अभिनेत्री एवं राज्यसभा सांसद जया बच्चन को देना है। अभी तो एक नामी टीवी सीरियल निर्माता, एक प्रख्यात फिल्म निर्माता-निर्देशक, दो बड़े हीरो, दो कोरियोग्राफर और तीन फैशन डिजाइनर्स समेत 50 से अधिक फिल्मकार और कलाकार भी एनसीबी के राडार पर हैं।

 चूंकि उन्हें अभी तक एजेंसी के समन नहीं भेजे गए हैं, लिहाजा हम कुछ नैतिकता से बंधे हैं कि उनके नाम उजागर नहीं कर रहे हैं। इन नौजवान और स्थापित फिल्मी चेहरों के पैरोकार उनके पक्ष में दलीलें दे सकते हैं कि यह एक जमानती अपराध है। बेशक कानूनी तौर पर ऐसा ही है, लेकिन अपराध तो किए गए हैं। क्या ऐसे बेनकाब चेहरों और नामों के सामने आने के बाद भी बॉलीवुड की ‘थाली’ की दुहाई दी जाती रहेगी? बॉलीवुड एक इंडस्ट्री है, परिवारनुमा है। यदि इसके नामचीन सदस्यों पर अपराध के आरोप हैं, तो सवाल उठता है कि ‘थाली’ में कितना जहर है? क्या ऐसी ‘थाली’ को साफ  करना जरूरी नहीं है? यह तो फैसला अदालत करेगी कि अपराध कितना संगीन है और उसकी सजा क्या होगी। सवाल है कि इन ‘दागदार’ फिल्मी चेहरों की सामाजिक और देशव्यापी छवि का क्या किया जाए? अपराध तो उन्होंने किए हैं। बहरहाल उनके पैरोकार दलीलें देते रहे हैं कि एनसीबी का छोटे-मोटे नशेडि़यों को पकड़ना ही दायित्व नहीं है। यकीनन उसका जनादेश अंतरराष्ट्रीय स्तर के ड्रग्स सिंडिकेट और गिरोहों को खंगालने का है, क्योंकि नशीले पदार्थों की हमारे देश में तस्करी का अनुमान करीब 30,000 करोड़ रुपए का है, लेकिन बॉलीवुड के लिपे-पुते चेहरों को भी छोड़ क्यों देना चाहिए?

वे बदनाम कंपनियों के स्रोत साबित हो सकते हैं! उनके जरिए सिंडिकेट बेनकाब हो सकते हैं, अवैध कारोबारी गतिविधियों की जानकारी भी मिल सकती है और बड़े अपराधियों को कानून के कठघरे तक पहुंचाया जा सकता है। बॉलीवुड में ही दशकों से सक्रिय अन्य चेहरों का दावा है कि नशा करना या ड्रग्स का सेवन करना एक ‘खुला रहस्य’ है। नशे के आदी फिल्मकार और अदाकार तो शूटिंग के सैट पर ही नशा करते पाए जाते रहे हैं। क्या इन दूषित प्रवृत्तियों पर खामोशी रखी जाए, क्योंकि यह बॉलीवुड का सरोकार है और यह इंडस्ट्री देश में सबसे ज्यादा टैक्स देती है? तो क्या प्रतिबंधित नशे पर बॉलीवुड को निरंकुश छोड़ देना चाहिए? क्या बॉलीवुड कानून से भी ऊपर है? क्या अब दीपिका आदि के जरिए बॉलीवुड की ‘बड़ी मछलियां’ भी गिरफ्त में आएंगी? दरअसल यह सब कुछ अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की अप्राकृतिक मौत के कारण संभव हुआ है। मकसद तो यह था कि नशे की दुनिया में मौत का कोई सुराग मिल सके। हालांकि यह संभव नहीं हो पाया है, लेकिन रिया चक्रवर्ती ने जिन नामों का खुलासा किया था, उससे ही बॉलीवुड बेनकाब हुआ है और अभी यह सिलसिला जारी है। बेशक चुनौतियां एनसीबी के सामने भी हैं, क्योंकि उसे ही सबूत साबित करने हैं कि व्हाट्स एप पर जो बातचीत पकड़ी गई हैं, वे बॉलीवुड के भीतर का स्याह सच उद्घाटित करती हैं। ड्रग्स का किसी भी तरह का ‘खेल’ अवैध है, जिसका निष्कर्ष अदालत को करना है, लेकिन छविभंग तो हुए हैं।

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