Saturday, August 15, 2020 10:02 PM

इस साल को धक्का दो

निर्मल असो

स्वतंत्र लेखक

यह साल भी अतीत के अपने पूर्वजों की तरह ही भाग रहा है। साल को अब भागना आ रहा है और भगाना भी, इसलिए काफी थक रहा है। उस दिन मेरे घर को चिन्हित करने के इरादे से टपक पड़ा। कहने लगा, ‘मेरे चिन्ह लौटा दो ताकि आराम से गुजर जाऊं।’ मैं हैरान था कि साल तो पहले भी गुजरते रहे, लेकिन किसी ने इस तरह चिन्हित नहीं किया और न ही कभी मेरे चिन्ह देखे। हैरानी हुई कि साल का अता-पता और उसके वजूद की सारी निशानियां मेरे आसपास ही थीं। उसे मालूम था कि मैं कोरोना से बच रहा हूं। उसे यह भी पता था कि इससे पहले मैं डेंगू, चिकनगुनिया, तपेदिक और दिमागी बुखार से बच चुका था। पूछने लगा, ‘कैसे बचे’, तो मैंने कहा दिन अच्छे थे। उत्तर से साल की आंखें फैल गईं और कंधा चौड़ा होता गया, क्योंकि उसे भरोसा हो चुका था कि ‘साल’ बचेगा तो मेरे घर पर ही बचेगा। साल को कुछ महीनों की पनाह चाहिए थी, तो मुझे साल के गुजरने की उम्मीद थी, इसलिए उसे वहीं छुपा दिया जहां पहले से ही कई सालों की उतरी हुई खाल पड़ी थी। वहां कई कैलेंडर पड़े थे, कुछ फटे थे, कुछ अड़े थे। साल उन्हें घूरने लगा कि पहले भी वक्त यूं ही बर्बाद होता रहा, तो उसे क्यों लांछित किया जा रहा है। इतने में फटा कैलेंडर बोल पड़ा कि उसके भीतर भी एक भरा-पूरा साल था। इच्छाएं थीं, स्तुतिगान थे, तीज-त्योहार थे, लेकिन दिन अच्छे नहीं थे। ताजा साल उसे टोकते हुए बोला, ‘दिन के अच्छे होने से साल अच्छे नहीं होते, बल्कि इतिहास के अच्छे होने से साल अच्छे होते हैं।’ फटा कैलेंडर नेहरू के जमाने का था, इसलिए साल की टोह लेकर बोलने लगा, ‘मैंने नेहरू का इतिहास बनाया, और हर दिन को अपने नाम किया, लेकिन न साल मेरे हुए और न नेता।’ ‘अरे भाई, नेता कब सालों के हुए या सालों तक हुए। मेरे पास तो एक से एक बड़ा नेता है, लेकिन अमरीका से इंग्लैंड या रूस से चीन तक सभी मुझे ही धक्का दे रहे हैं’, कह कर साल कुपित हो गया। इतने में कैलेंडरों के बीच फिर हलचल हुई और नींद से जागते हुए एक आगे आया। बिलकुल नया था, लेकिन उसने अपने कई चिन्ह खो दिए थे। कई महीने गायब करके भी कैलेंडर ने साल को गले लगाया और बोला, ‘देख बड़े भाई और मुझसे सीख कि अगर हर दिन को अच्छा बनाना है, तो पिछले को अपने वजूद से हटा दो।’ साल को अपने ही कैलेंडर की सलाह अच्छी लगी तो मेरी तरफ भागा और मेरे भीतर के तमाम बीते दिनों को चुन-चुन कर निकालने लगा और साथ में कहने लगा, ‘यही तेरे वजूद से चिपके पुराने दिन हैं, जिन्होंने मुझे बदनाम किया। अब न ऐसे चिन्ह होंगे और न ही कोई पूछेगा कि हुआ क्या।’ मैं कैलेंडर की तरह कुछ महीने निकाल चुका था और सोच रहा था कि कब पूरा साल गुजर जाए ताकि कोई मुड़ कर न देखे।

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