जगह अभी खाली है मेरे दोस्त: अजय पाराशर, लेखक, धर्मशाला से हैं

विकास कभी नहीं मरता। विकास कभी मर ही नहीं सकता। विकास शाश्वत है, अमर है; नेता जी के दिल में ़कायम कुरसी की तृष्णा की तरह, आ़िखरी सांस लेते आदमी की और जीने की इच्छा की तरह। विकास कभी नहीं मर सकता। चाहे उत्तम प्रदेश की ़खाकी अपनी मनोहर कहानियां गढ़कर उसका एन्काउंटर ही क्यों न कर दे। विकास का शरीर मर सकता है। ज़ात बदल सकती है। लेकिन आत्मा नहीं मर सकती। उसके शरीर के मरने पर उसकी आत्मा किसी और जिस्म में समा जाती है। हमारे जीवन में विकास की जगह कभी ़खाली नहीं हो सकती। सुना है जब से दूब वाले विकास का एन्काउंटर हुआ है, तब से बरगद वाले विकास के पद के लिए आवेदन आमंत्रित किए जा चुके हैं। ज़ाहिर है अगर विकास का ही विकास नहीं हुआ तो किसका विकास होगा? अगर अपना विकास करना है तो विकास का विकास तो करना ही पड़ेगा। तीन दशक पहले विकास नाम की जो दूब लगी थी, वह नरभक्षी हो चुकी थी। इसीलिए तृणासुर की तरह उसका उड़ाया जाना लाज़िमी हो गया था। अब गोली चाहे सीने में लगी हो या पेट में, कथा तो पीठ वाली ही घड़नी पड़ेगी। ऐसी दूब से कई माननीयों के घरों में हुई पूजा का भांडा फूटने की आशंका थी। फिर चांडाल और पुरोहित की भूमिका ़खाकी से बेहतर कौन निभा सकता था? वैसे भी कहते हैं मौत सारे ़हिसाब बराबर कर देती है। जब बांस ही नहीं बचेगा तो बांसुरी कौन बजाएगा? जब वेश्या मर गई तो ग्राहकों के नाम किससे पूछेंगे और बताएगा कौन?  दुबे साहिब गए तो गए। विकास की खाली जगह तो अब प्रमोशन के साथ ही भरी जाएगी। चंद्रगुप्त के चाणक्य ने तो केवल ‘साम, दाम, दंड, भेद’ की बात कही थी।

भारत विजय पर निकले आधुनिक चंद्रगुप्त और चाणक्य तो छब्बे जी की तलाश में है। चौबे तो वे ़खुद ही हो गए हैं। ‘कहीं पे नि़गाहें, कहीं पे निशाना’ की तरह वे कहते कुछ हैं, करते कुछ हैं। चंद्रगुप्त के चाणक्य ने तो जड़ों में मट्ठा डाला था। आधुनिक चंद्रगुप्त और चाणक्य तो जड़ों को ही मट्ठे में डाल देते हैं। वैसे भी सत्ता की जंग में सब जायज़ है। कहावत भी है जिसने की शरम, उसके फूटे करम। करम फोड़ने से तो बेहतर है, पर पराओं और संस्थाओं को ही तहस-नहस कर दो। पर पराओं और संस्थाओं की लाशों पर कुरसी के पाए रखने से ही तो उसकी ऊंचाई बढ़ेगी। ऐसे में विकास की जगह कभी ़खाली नहीं रह सकती। जैसे किसी संस्था में लोग आते-जाते रहते हैं, वैसे ही विकास के साथ दुबे, दाऊद, अली व़गैरह आते-जाते रहते हैं। विकास तो सतत चलने वाली प्रक्रिया है। लेकिन इस बार विकास के जातिगत हो जाने से आरक्षण का प्रश्न खड़ा हो गया है। पहले विकास स्वर्ण जाति का था तो अब आरक्षित वर्ग से होना चाहिए। लेकिन आरक्षित वर्ग से योग्य उम्मीदवार न मिलने की सूरत में पद को ़कतई ़खाली नहीं रखा जा सकता। अतः वैकेंसी को बैकलॉग से भरे जाने की प्रक्रिया नहीं अपनाई जाएगी। आरक्षित वर्ग से योग्य उम्मीदवार न मिलने पर यह पद पुनः स्वर्ण जाति के उम्मीदवार को दे दिया जाएगा। क्योंकि अगर विकास रुका तो राजनीति और व्यवस्था रुक जाएगी। रुकना तो ज़ंग की निशानी है। रुका पानी सड़ांध मारने लगता है। इसीलिए विकास ज़रूरी है।

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