जलसेना का मालाबार अभ्यास: कर्नल (रि.) मनीष धीमान, स्वतंत्र लेखक

नवरात्रों में कोरोनाकाल की जरूरी ऐहतियात के साथ पूरे देश में रामलीला तथा मंदिरों में देवी पूजा शुरू हो गई है। बिहार चुनाव में मूल मुद्दों से हटकर पाकिस्तान तथा आतंकवाद का आगमन हो चुका है तथा जैसे-जैसे चुनावी पारा बढ़ेगा, वैसे-वैसे बहस शिक्षा, स्वास्थ्य और बेरोजगारी से हटकर किसी नई आइटम तक पहुंच जाएगी जिसका शायद आम आदमी से कोई लेना-देना नहीं होगा। मेरे अपने गृह क्षेत्र में पिछले दसीयों सालों से सेंट्रल यूनिवर्सिटी का सपना संजोए बैठे लोगों के लिए यूनिवर्सिटी न बनकर एक विशेष पार्टी के कार्यालय का शिलान्यास करके क्षेत्रवासियों के लिए तोहफा देने की बात की जा रही है और कुछ लोग इसे भी क्षेत्र का विकास मान रहे हैं। आजादी के 70 साल बाद शायद आज हम उस मोड़ पर आ गए हैं जहां पर हमें बेकार तथा अनर्गल विषयों पर बहस करने के बजाय असली मूलभूत मुद्दों तथा तथ्यों पर मंथन कर राजनीतिक पार्टियों की कथनी व करनी का आकलन करना चाहिए।

 शीत ऋतु के शुरुआती दिन जिस तरह से धार्मिक पूजा-पाठ तथा चुनावी माहौल के साथ व्यस्त हैं, उसी दौरान जलसेना का मालाबार अभ्यास जो कि बे ऑफ  बंगाल और अरब सागर  के समुद्र में भारत और अमरीका की जल सेना के आपसी तालमेल को सुदृढ़ करने के लिए 1992 में शुरू हुआ था, बाद में 2015 में जापानी जल सेना भी इसका हिस्सा बन गई थी। अगले महीने शुरू हो रहे इस अभ्यास में इस बार ऑस्ट्रेलिया की जल सेना भी हिस्सा लेगी। इस समय जब पूर्वी लद्दाख में भारत एवं चीन के सीमा विवाद पर हर स्तर की बातचीत के बावजूद कोई हल नहीं निकल पा रहा, उस समय दुनिया की चार बड़ी ताकतों का चीन के नाक तले उसको सम्मिलित किए बिना समुद्री युद्ध अभ्यास करना भारत के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। यह युद्धाभ्यास चीन के भारतीय सीमा के आसपास के समुद्री क्षेत्र में बढ़ रहे दबदबे को भी एक चुनौती है।

 अमरीका, जापान तथा ऑस्ट्रेलिया जैसे शक्तिशाली देशों के साथ भारत का यह समुद्री अभ्यास चीन के हाई प्रोफाइल प्रोजेक्ट ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ का भी जवाब है। स्ट्रिंग ऑफ  पर्ल्स यानी मोतियों की लड़ी प्रोजेक्ट के जरिए चीन ने हिंद महासागर में अपनी पकड़ तथा दबदबा मजबूत करने के लिए बंदरगाहों को एक-दूसरे से इस तरह से जोड़ा है कि वह चीन के मुख्य क्षेत्र  से शुरू होकर हॉर्न ऑफ अफ्रीका में सुडान  की बंदरगाह तक एक माला या लड़ी बनाता है। इस लड़ी को चीन अपने व्यावसायिक तथा सैन्य फायदे के लिए इस्तेमाल करना चाहता है। मालाबार अभ्यास चीन के समुद्री दबदबे को चुनौती देने की तरफ  एक सही कदम है।सरकार को चाहिए कि भविष्य में भी इस तरह के अभ्यास करके दक्षिण एशिया में बढ़ रहे चीन के दबदबे को रोके। अगर सही समय पर इस तरह के सामरिक, रणनीतिक तथा राजनीतिक परिपक्वता वाले कदम नहीं उठाए गए तो वह दिन दूर नहीं जब ड्रैगन अपनी विस्तारवादी नीति के चलते भारत की सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था के लिए खतरा बन सकता है।

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