Tuesday, September 22, 2020 08:49 PM

जीवन रूपी ऊर्जा

बाबा हरदेव

गतांक से आगे…

जब ऊपर से विद्युत न मिले, तो ट्राम तत्काल रुक जाती है। अब जैसे ट्राम विद्युत के माध्यम से चलती है, लेकिन वह विद्युत यात्रा नहीं करती है, ठीक वैसे ही आत्मा जो व्यापक तत्त्व है इसके द्वारा परमात्मा से जीवन रूपी ऊर्जा जहां भी यह सूक्ष्म शरीर जाता है, इससे मिलती रहती है। अब जैसे ट्राम में बिजली ग्रहण करने वाला यंत्र टूट जाता है, तो बिजली अपनी जगह रह जाती है, ऐसे ही जिस दिन सूक्ष्म शरीर बिखर जाता है अथवा सूक्ष्म शरीर टूटता है, तो आत्मा अपने परम स्रोत परमात्मा से मिल जाती है। आत्मा तो परमात्मा से सदा मिली हुई है, केवल सूक्ष्म  शरीर ही दीवार के कारण अलग मालूम पड़ती है।

 अब आने जाने अर्थात आवागमण की जो धारण है। यह केवल सूक्ष्म शरीर की ही है। ऊपर वर्णन किए गए उदाहरण में विद्युत जीवन रूपी ऊर्जा है, ट्राम में जो यंत्र विद्युत ग्रहण करता है वह सूक्ष्म शरीर है और ट्राम स्थूल शरीर का प्रतीक है। अतःसूक्ष्म शरीर न हो तो स्थूल शरीर ग्रहण करना असंभव है। इसलिए सूक्ष्म शरीर के  टूटते ही दो घटनाएं घटित होती हैं, एक ओर सूक्ष्म शरीर गिरा अर्थात स्थूल शरीर की यात्रा समाप्त हुई और दूसरी ओर परमात्मा है जो आत्मा की दूरी बनी हुई थी, वह मिट जाती है मानो सूक्ष्म शरीर के गिरते ही बीच का सेतु गिर जाता है। इस सूक्ष्म शरीर के गिर जाने का ही दूसरा नाम मुक्त हो जाना है, आवागमन से पार हो जाना है।

कारण शरीर- अब मनुष्य का जो तीसरा शरीर है कारण शरीर यह मनुष्य के विचारों की एक ऐसी स्थिति अथवा अवस्था का नाम है जिसमें अहम और अहंकार का अभाव होता है। अध्यात्म में इस विचार स्थिति को कारण शरीर या सब्जेक्टिव माइंड कहते हैं। अब यह तीनों शरीर स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर तथा कारण शरीर आपस में ऐसा संबंध बनाए रखते हैं जैसे पानी और बर्फ का संबंध होता है। उदाहरण के लिए जो कार्य हमारे हाथ से होता है इसका प्रभाव हमारे मन पर पड़ता है और फिर हमारे मन की गहराई में यह प्रभाव बैठ जाता है। जैसे हम किसी व्यक्ति के विचारों को बड़े ध्यानपूर्वक सुन रहे होते हैं। अपनी इंद्रियों द्वारा (कान के माध्यम से) सुन रहे होते हैं और हमारे मन पर इसका प्रभाव पड़ता है। यह हमारे सूक्ष्म शारीर का कर्म होता है।

अब हम यह विचार सुनकर अपने घर को चल देंगे, तो इन विचारों का कुछ समय तक तो हम पर प्रभाव रहेगा, परंतु धीरे-धीरे समय व्यतीत होने के साथ-साथ इन विचारों का प्रभाव हमारे मन पर कम होता जाएगा और एक समय ऐसा आएगा जब हम इन विचारों को पूरी तरह से भूल जाएंगे। अतः प्रश्न यह पैदा होता है कि आखिर वह जो शक्ति थी, जिसका प्रभाव हमारे मन पर पड़ा हुआ था, अब यह शक्ति कहां चली गई? वह कहीं नहीं जाती अपितु कहीं न कहीं हमारे भीतर ही मौजूद होती है। विद्वानों का मानना है कि मन पर प्रभाव छोड़ने वाली यह शक्ति हमारे कारण शरीर में चली जाती है और वहीं पर पड़ी रहती है। इस शक्ति का कारण शरीर में चले जाने को हम यूं समझें जैसे एक झील है उसमें यदि बहुत सी वस्तुएं गिरें तो ये वस्तुएं कुछ देर तक तो पानी के ऊपर तैरती रहेंगी और फिर झील की गहराई में बैठ जाएंगी।

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