जिला परिषदों का कमतर होता वर्चस्व: डा. एचएल धीमान, लेखक नगरोटा सूरियां से हैं

डा. एचएल धीमान

लेखक नगरोटा सूरियां से हैं

पूरे प्रदेश में सिर्फ  पंचायतों को छोड़कर इस एक्ट के तहत बने ब्लॉक समिति सदस्यों और जिला परिषद सदस्यों की जिस तरह से फंडिंग काटकर उन्हें अशक्त किया गया है,  यह राजसत्ता की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है क्योंकि जिला परिषद प्रतिनिधि परंपरागत राजनीतिक सत्ता के लिए खतरा बन कर उभर रहे हैं। इस खतरे को भांपते हुए इन्हें जानबूझकर अशक्त करने का षड्यंत्र किया गया है। हालांकि इस षड्यंत्र के खिलाफ  एकजुट होकर 12 जिलों के जिला पार्षद सरकार के खिलाफ  कई बार अनशन भी कर चुके हैं और ज्ञापन देकर अपनी नाराजगी भी जाहिर कर चुके हैं, परंतु राजसत्ता इनकी बढ़ती प्रभुता से भयभीत है…

सन् 1995 से अस्तित्व में आई प्रदेश की बारह जिला परिषदें अब नाममात्र व महज प्रस्ताव पारित करने तक सीमित रह गई हैं। जिस तर्ज पर पच्चीस वर्ष पूर्व जिला परिषदों को वित्तीय संसाधन व महत्त्व मिलने लगा था, समय के साथ सरकार ने उनके पर काट दिए। सन् 2015 में बनी प्रदेश की जिला परिषदें शक्तिहीन व मोहरा बनकर रह गई हैं। वित्तीय संसाधन तो परिषदों के खत्म ही कर दिए हैं। जन कार्य करवाने की सूची को भी संकुचित कर दिया है। एक सोची-समझी रणनीति के तहत इन्हें पंगु बनाया गया है। वर्ष 1995 में  हिमाचल प्रदेश में संविधान के 73वें  संशोधन के लागू होने से ग्राम विकास की योजनाओं व उनके क्रियान्वयन में जनता की सीधी भागीदारी होने लगी थी। सत्ता का विकेंद्रीकरण हुआ था। गांव की सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, लघु उद्योग, स्वच्छता, रोजगार व अन्य विभिन्न प्रकार की गांव की अनिवार्य आवश्यकताओं की भरपाई की अपेक्षा पंचायती राज प्रणाली में चुने गए जनप्रतिनिधियों से होने लगी थी। सभी वर्गों, महिलाओं, अनुसूचित जातियों, जनजातियों व पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधित्व की भागीदारी सुनिश्चित हुई थी। ग्राम, खंड स्तर व जिला स्तर पर पंचायतों, ब्लॉक समितियों व जिला परिषदों के रूप में सशक्त जन संसदों का निर्माण होने लगा था।

जनता को तृणमूल स्तर पर वास्तविक रूप से लोकतंत्र की अनुभूति होने लगी थी। प्रदेश के सैकड़ों लोगों को जनप्रतिनिधि बनने का अवसर उपलब्ध हुआ था। वित्त आयोग की अनुशंसा पर धनराशि का सीधे वितरण पंचायत, खंड और जिला परिषदों के माध्यम से होने लगा था। सीधे धन की उपलब्धता  के कारण विकास का पैसा गांवों के अनछुए व अविकसित क्षेत्रों में खर्च होने लगा था, जिसके कारण इन प्रतिनिधियों की जनता में पैठ बनने लगी थी। इस तरह से बढ़ते जनाधार व राजनीतिक उभार से चिरस्थापित वर्चस्ववादी राजनीतिक मानसिकता की चिंता बढ़ गई। उन्हें अपने राज महलों के ढहने का खतरा पैदा हो गया। कईयों के राज महल गिरे भी। लोकतंत्र में तृणमूल स्तर तक मिले इस जनप्रतिनिधित्व के कारण प्रदेश की राजनीति में नए व युवा चेहरे उभरने लगे। प्रदेश की वर्तमान विधानसभा में 68 में से 15 ऐसे विधायक हैं जिन्होंने अपने राजनीतिक कैरियर की शुरुआत जिला परिषद सदस्य का चुनाव लड़कर की है। जिला कांगड़ा से अर्जुन ठाकुर, पवन काजल, रीता धीमान व रमेश धवाला, जिला चंबा से विक्रम जरियाल व हंसराज, मंडी से हीरालाल व जवाहर ठाकुर, जिला हमीरपुर से कमलेश कुमारी, जिला बिलासपुर से सुभाष ठाकुर, जिला सोलन से परमजीत सिंह व लखविंदर राणा, सिरमौर जिला से रीना कश्यप, ऊना के गगरेट  से राजेश ठाकुर और शिमला से अनिरुद्ध सिंह ऐसे विधायक हैं जो जिला परिषद से विधायकी तक पहुंचे हैं।

जिला परिषद से होते हुए जब बहुत से लोग विधानसभा तक पहुंचने लगे तो सत्ता का यह विकेंद्रीकरण राजसत्ता को खटकने लगा। परिणामस्वरूप सत्ता विकेंद्रीकरण की इस नई सोच के राज सत्ता ने पर कतरने शुरू कर दिए। सन् 2015 तक पंचायती राज प्रणाली की इन दो महत्त्वपूर्ण संस्थाओं ब्लॉक समिति व जिला परिषद को ढेर सारी राशि विकास योजनाओं के लिए मिलती थी। उन्हें उसे अपने विवेक पर खर्च करने का अधिकार था, जिसे बिल्कुल कमतर कर दिया गया और इन दोनों को पंगु बना दिया गया। पांच वर्ष की अवधि में मिलने वाले विकास के करोड़ों के फंड घटाकर महज खानापूर्ति कर दिए गए और यह संस्थाएं मात्र औपचारिक व प्रस्ताव पारित करने तक सीमित होकर रह गई हैं। सन् 1995 से तीन बार नगरोटा सूरियां वार्ड से पार्षद रही वीना कुमारी ने बताया कि पहले कार्यकाल में उन्होंने अपने वार्ड में एक करोड़ की धनराशि खर्च की थी। इसलिए दूसरी बार सन् 2000 में पांच पुरुष सदस्यों की जमानत जब्त करवा कर दोबारा पार्षद बनी। दूसरा-तीसरा कार्यकाल भी शानदार व विकासमयी रहा और करोड़ों रुपए जनता के हितार्थ खर्चे। अभी उसी वार्ड से चुने जिला पार्षद पवन कुमार बताते हैं कि उन्हें सन् 2015 से अब तक मात्र तीस लाख ही ग्रांट के रूप में मिले हैं जो कि वार्ड की तीस हजार की आबादी की विकास आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए नाकाफी हैं और इस वर्ष मात्र 12 लाख रुपए मिले हैं जो कि पंद्रह पंचायतों की मांगों की पूर्ति के लिए लेश मात्र हैं।

 यह चर्चा उदाहरण मात्र है। पूरे प्रदेश में सिर्फ  पंचायतों को छोड़कर इस एक्ट के तहत बने ब्लॉक समिति सदस्यों और जिला परिषद सदस्यों की जिस तरह से फंडिंग काटकर उन्हें अशक्त किया गया है,  यह राजसत्ता की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है क्योंकि जिला परिषद प्रतिनिधि परंपरागत राजनीतिक सत्ता के लिए खतरा बन कर उभर रहे हैं। इस खतरे को भांपते हुए इन्हें जानबूझकर अशक्त करने का षड्यंत्र किया गया है। हालांकि इस षड्यंत्र के खिलाफ  एकजुट होकर 12 जिलों के जिला पार्षद सरकार के खिलाफ  कई बार अनशन भी कर चुके हैं और ज्ञापन देकर अपनी नाराजगी भी जाहिर कर चुके हैं, परंतु राजसत्ता इनकी बढ़ती प्रभुता से भयभीत है। इसलिए राजसत्ता चाह कर भी इनकी भरपूर फंडिंग को पुनर्जीवित नहीं करना चाहती क्योंकि कोई भी विधायक अपने विधानसभा क्षेत्र में किसी दूसरे को उभरते नहीं देखना चाहता।  अगर राज सत्ता ऐसा सोचती है तो यह संविधान के इस संशोधन की मूल भावना के विरुद्ध है जिसमें राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज की परिकल्पना की गई है और भारतीय लोकतंत्र की आत्मा के खिलाफ है। ब्लॉक समितियों व जिला परिषदों का सशक्तिकरण वास्तव में भारतीय लोकतंत्र का सशक्तिकरण है। केंद्र व प्रदेश सरकारों को इस पर पुनर्विचार अवश्य करना चाहिए।

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