काम हराम है

सुरेश सेठ

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हम बहुत दिन से इस चिंता में थे कि यह देश तरक्की क्यों नहीं कर रहा? नेता जी ने जब कहा ‘आराम हराम है’ तो इस देश के लोगों ने सुन लिया ‘काम हराम है’। अब यहां एक नई कार्य संस्कृति का विकास हो रहा है, जहां हर नेता करोड़पति है और उसके बाद उसकी गद्दी का उम्मीदवार अरबपति। लेकिन वे लोग काम क्या करते हैं, इसकी खबर हमें आज तक न हो सकी। पेशा पूछो तो कहते हैं ‘जन सेवा’। जनता भी ऐसे सेवक तलाश करती है जो उनका हर गलत काम सही करवाए। क्योंकि सही काम तो अपने आप हो जाते हैं। वहां फाइल रुक जाए तो अधिक से अधिक उसके नीचे चांदी के पहिए लगा दो। मज़ा तो नेतागिरी का तब है जब आपके साये तले माफिया तंत्र पले। आपकी निगहबानी गैंगस्टर करें। नौजवान पीढ़ी नशों की दलदल में फंस गई, रेत-बजरी अवैध रूप से खोद-खोद कर बेचने के काम में लगी। एक खुदाई की मंजूरी लो दस खोदो।

बड़े नेता जी अपने उड़नखटोले से तुम्हारी कारस्तानी देख लें तो ऐसे अवैध कामों को जड़मूल से उखाड़ फैंकने के भावुक भाषण फरमा दो, तस्करी की इस अवैध खेल में अपने प्यादे फजऱ्ी बनाकर पकड़वा दो। फिर इस देश में राम राज्य आ  गया, इस कल्पना से गदगद हो जाओ। अच्छे दिनों ने कितनी मात्र तय कर ली। कभी उसे ‘उदित होता हुआ भारत’, कभी ‘चमकता भारत’। फिर ‘अच्छे दिन आएंगे, सब जन रोटी खाएंगे’ के सपनीले नारों के साथ देश के नए प्रधान सेवक कुछ वर्ष पहले राजपाट संभाला। देश  इन वर्षो में नारों की बैसाखियों से विजयगान गाते मद्धम सुर से सप्तम पर पहुंच गया। मेक इन इंडिया के अलाप में मेड इन इंडिया का सुर लगा और देश के छोटे उत्पादक धनपति देशों की बहु-राष्ट्रीय कम्पनियों की अंधाधुंध आयात की मार खा अपना काम-धाम छोड़ उनके डीलर बन गए। प्रधान सेवक देश-देश गए, वहां सबका मन मोह आए। अब देशी हथेलियों में विदेशों से आयातित कागज़ के फूल हैं और अपने देश के गुलाब जो कभी इसके कस्बों और छोटे शहरों की क्यारियों में गुलाब से खिलकर लघु और कुटीर उद्योग पनपाते थे, अब पस्त होकर अतीत बन गए। देश के कृषक समाज को कभी दूसरी हरित क्रांति के पंख देने का वायदा था, लेकिन इस पंख कटी उड़ान को खेती की खड़गभुजा कहलाने वाले राज्यों ने स्वीकार नहीं किया।

उत्तर पूर्वी राज्यों में भी इसका क्रांति विमान न उतर सका।  वहां अच्छे दिन आएगा, उनके टूटे मलबा हो रहे घरों में, उम्मीद जिंदा है। इसलिए यह उम्मीद ही तो बार-बार उनके वोट बनती है। ईवीएम मशीनों पर महामना उनके हक में अंगूठा दबता है। इस अंगूठे पर मंगल टीका कब लगेगा? देश बरसों से उसी जगह रुका क्यों है? यहां प्रगति का एक कदम आगे बढ़ता है तो उसे भ्रष्टाचार, वंशवाद, महंगाई और पतित मूल्यों की अजगर फांस क्यों घेर लेती है? एक कदम आगे की नियति दो कदम पीछे में क्यों परिणत हो जाती है? देश के खेत फसलों के रूप में हर वर्ष भरपूर सोना उगलते हैं, लेकिन देश की भूखी-प्यासी, बेकार और कर्ज़दार जनता भुखमरी के सूचकांक में और भी नीचे क्यों सरक जाती है? बार-बार यह प्रश्न उलझ जाते हैं।

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