कब लागू होंगी वेतन आयोग की सिफारिशें: डा. एचएल धीमान, लेखक नगरोटा सूरियां से हैं

डा. एचएल धीमान

लेखक नगरोटा सूरियां से हैं

तब से यह परंपरा चली आ रही है और आज भी प्रदेश के कर्मचारी पंजाब राज्य वेतन आयोग की कृपा पर निर्भर हैं, क्योंकि बदली परिस्थितियों में पंजाब की विभिन्न सरकारों ने जिस तरह से सियासी लाभ के लिए प्रदेश के विभिन्न घटकों को विभिन्न क्षेत्रों में रेवडि़यां बांटकर अर्थव्यवस्था का कचूमर निकाला है और भ्रष्टाचार से पंजाब की वित्तीय स्थिति जिस तरह से कमजोर हुई है, ऐसे में पंजाब अपने कर्मचारियों को समय पर वित्तीय लाभ देने में असमर्थ अनुभव करता रहा है और अब भी कमेटियों के सहारे वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने की टालमटोल कर रहा है। उसी की आड़ में हिमाचल प्रदेश सरकार भी अपने कर्मचारियों की वेतन बढ़ोतरी से कन्नी काट रही है। ऐसे में कर्मचारियों के विभिन्न संगठन यह मांग कर रहे हैं कि उन्हें पंजाब से अलग करके केंद्रीय वेतन आयोग से जोड़ा जाए…

केंद्र सरकार सभी केंद्रीय कर्मचारियों को सातवां वेतन आयोग लागू कर चुकी है, परंतु हिमाचल प्रदेश के लाखों कर्मचारी चिरकाल से इसके लागू होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। जबकि परंपरा के अनुसार वेतन आयोग की सिफारिशों को जनवरी 2016 से लागू हो जाना चाहिए था। पांच साल की अवधि बीत जाने के बावजूद अभी तक कर्मचारियों को इसके लागू होने का इंतजार है। हिमाचल प्रदेश में कार्यरत भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी इससे लाभान्वित हो चुके हैं। प्रदेश में स्थित वेतन के मामले में न्यायिक व्यवस्था का भी अपना सिस्टम है। प्रदेश के कॉलेजों  व यूनिवर्सिटी के प्रोफेसरों की वेतन व्यवस्था यूजीसी के मापदंडों से संचालित होती है, पर उसे लागू हिमाचल प्रदेश सरकार करती है। प्रदेश का अधिकांश कर्मचारी वर्ग पंजाब राज्य वेतन आयोग की सिफारिशों से बंधा है और यह परंपरा तब से चली आ रही है, जब हिमाचल प्रदेश पूर्ण राज्य बना और  हिमाचल प्रदेश में पंजाब के क्षेत्रों का मर्जर हुआ। तब पंजाब  से सम्मिलित क्षेत्रों  में कार्य कर रहे कर्मचारी क्योंकि पंजाब के वेतन आयोग से जुड़े हुए थे और हिमाचल प्रदेश के हिस्से में कार्य कर रहे कर्मचारियों के मुकाबले उन्हें ज्यादा वेतन मिलता था, इसलिए  ज्यादा तनख्वाह मिलने के कारण हिमाचल के सभी कर्मचारियों को पंजाब वेतन आयोग से जोड़ दिया गया।

तब से यह परंपरा चली आ रही है और आज भी प्रदेश के कर्मचारी पंजाब राज्य वेतन आयोग की कृपा पर निर्भर हैं, क्योंकि बदली परिस्थितियों में पंजाब की विभिन्न सरकारों ने जिस तरह से सियासी लाभ के लिए प्रदेश के विभिन्न घटकों को विभिन्न क्षेत्रों में रेवडि़यां बांटकर अर्थव्यवस्था का कचूमर निकाला है और भ्रष्टाचार से पंजाब की वित्तीय स्थिति जिस तरह से कमजोर हुई है, ऐसे में पंजाब अपने कर्मचारियों को समय पर वित्तीय लाभ देने में असमर्थ अनुभव करता रहा है और अब भी कमेटियों के सहारे वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने की टालमटोल कर रहा है। उसी की आड़ में हिमाचल प्रदेश सरकार भी अपने कर्मचारियों की वेतन बढ़ोतरी से कन्नी काट रही है। ऐसे में कर्मचारियों के विभिन्न संगठन यह मांग कर रहे हैं कि उन्हें पंजाब से अलग करके केंद्रीय वेतन आयोग से जोड़ा जाए। वर्तमान में पूरे देश में करीब बीस राज्य ऐसे हैं जिनके कर्मचारी केंद्रीय वेतन आयोग की सिफारिशों से लाभान्वित होते हैं।

सन् 1971 में जिन कर्मचारियों की वजह से वेतन की सिफारिशों को पंजाब से जोड़ा गया था, अब वे सेवानिवृत्त हो चुके हैं। राज्य प्राप्ति के बाद कर्मचारियों का चयन हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग व स्टाफ  सिलेक्शन बोर्ड द्वारा होने लगा है। उन पर सेवानिवृत्ति की उम्र को छोड़ केंद्रीय सेवा नियम और पेंशन नियम लागू होते हैं। ऐसे में कोई तुक नहीं बनता कि कर्मचारियों के वेतन के मामले में पंजाब से जोड़ा जाए। गत दशकों से इस तरह की व्यवस्था के चलते हिमाचल प्रदेश के कर्मचारियों के वेतन  हित प्रभावित होते रहे हैं। वेतन आयोगों  की रिपोर्ट आने के बाद भी तीन-चार साल तक उन्हें यह लाभ नहीं मिलते हैं। अगर पूर्व के वेतन आयोगों पर एक दृष्टिपात करें तो 1996 का वेतन आयोग 1999 में लागू हुआ। वर्ष 2006 के वेतन आयोग की सिफारिशें 2009 में लागू हुईं और 2016 की सिफारिशें अब तक लागू नहीं हुईं, जबकि बहुत से कर्मचारी और अधिकारी सेवानिवृत्त हो चुके हैं या इस संसार से जा चुके हैं।

उधर केंद्र का वेतन आयोग कब का लागू हो चुका है। वैसे भी जो कर्मचारी 2016 से अब तक सेवानिवृत्त हो चुके हैं, जिनकी मृत्यु हो चुकी है, उनको लीव एनकैशमेंट व ग्रेच्युटी आदि के लाभ पूर्व तिथि से नहीं मिलते हैं, न ही मिलेंगे। प्रदेश कर्मचारी संगठनों की मांग जायज है। त्वरित लाभ के लिए प्रदेश कर्मचारियों के वेतन व भत्तों  को केंद्रीय वेतन आयोग से जोड़ा जाना वाजिब है। उल्लेखनीय है कि हिमाचल में लाखों की संख्या में कर्मचारी हैं जिन पर सरकार की जनहित वाली योजनाओं को लागू करने की जिम्मेवारी है। अगर कर्मचारी ही संतुष्ट नहीं होंगे, तो जनहित की योजनाओं को लागू करना कठिन हो जाएगा। कर्मचारी अगर हड़ताल भी करते हैं तो इससे सारी योजनाएं प्रभावित होंगी। इसलिए सरकार को चाहिए कि वह कर्मचारियों की ओर से कोई कठोर पग उठाने से पहले ही उनकी मांगों को पूरा करे। वेतन आयोग न लागू होने के कारण कर्मचारियों में अंदर ही अंदर गुस्सा है।

यह गुस्सा कब आंदोलन का रूप अख्तियार कर ले, कोई पता नहीं है। कोरोना वायरस के इस कठिन समय में कर्मचारी पहले ही परेशानियां झेल रहे हैं, अतः उनकी मांगों को पूरा करना सरकार की प्राथमिकता होना चाहिए। यह भी गौरतलब है कि कर्मचारी एक ऐसा वर्ग है, जो प्रदेश की राजनीति को प्रभावित करता रहा है। कर्मचारियों के संतोष पर ही कई सरकारें शासन करती रही हैं। अगर कर्मचारी ठान लें कि किसी सरकार को प्रदेश से उखाड़ फेंकना है, तो यह बात इस वर्ग के लिए संभव है। कोरोना काल के कठिन दौर में कर्मचारियों में कोई असंतोष न फैले, इसके लिए सरकार को प्रयास करने चाहिए।

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