Sunday, January 24, 2021 04:09 AM

कई काम एक-दूसरे पर ही निर्भर; विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका जीवंत लोकतंत्र का आधार

गुजरात के केवडिया में 80वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारियोें के लिए सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस सम्मेलन का विषय विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के मध्य जीवंत लोकतंत्र का आधार बनाए रखना था। इस विषय पर अपने विचार रखते हुए हिमाचल प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष विपिन सिंह परमार ने कहा कि ये तीनों लोकतांत्रिक व्यवस्था के विशिष्ट अंग है। हर एक के अपने-अपने कार्य है। प्रत्येक अंग को संविधान में शक्ति प्राप्त हैं। प्रभावी प्रशासन की प्रक्रिया में तीनों अंग स्वतंत्र कार्य करते हैं तथापि कई कार्यों में वे एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं। स्वस्थ परंपरा के लिए तीनों में सामंजस्य होना आवश्यमभावी है। तीनों अंगों के मध्य टकराव से न केवल राजनीतिक व्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचा है, बल्कि इससे उनकी प्रतिष्ठा तथा विश्वसनीयता भी कम हुई है। इसलिए स्वस्थ परंपराओं को पोषित और विकसित किए जाने की आवश्यकता है, ताकि समतावादी समाज की स्थापना से तीनों अंगों में सामंजस्य पूर्ण समन्वय हो।

 विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका पिरामिड के तीनों किनारों के समान है। श्री परमार ने कहा कि हिमाचल विधानसभा देश की प्रथम विधानसभा है जहां उच्च तकनीक युक्त ई-विधान प्रणाली का चार अगस्त, 2014 को शुभारंभ हुआ है। प्रणाली कागज रहित तथा पर्यावरण मित्र प्रणाली है, जिसके लागू होने से जहां हजारों वृक्ष प्रत्येक वर्ष कटने से बचेंगे, वहीं कार्य में पारदर्शिता तथा दक्षता आई है। हिमाचल प्रदेश विधानसभा में ई-विधान प्रणाली लागू होने के उपरान्त ऑनलाइन कार्य चल रहा है। हिमाचल प्रदेश में धौलाधार के आंचल में पर्यटन नगरी धर्मशाला स्थित तपोवन में प्रदेश विधानसभा का दूसरा भवन है। केंद्र सरकार से आग्रह किया कि इस भवन में राष्ट्रीय ई-विधान अकादमी की स्थापना की जाए, ताकि यहां पर सासदों, अन्य राज्यों की विधानसभाओं के सदस्यों, केंद्र सरकार व राज्य सरकारों के अधिकारियों को प्रशिक्षण दिया जा सके व इस भवन का उचित इस्तेमाल भी किया जा सके।

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