Friday, September 25, 2020 09:18 AM

कहां तक कोरोना की पराकाष्ठा?

शनिवार को कोरोना वायरस से संक्रमित मरीज, एक ही दिन में, 65410 तक पहुंच गए। नतीजतन कुल संख्या 21.50 लाख को भी पार कर गई है। इस स्थिति के दो आयाम हैं। एक तो रोजाना पांच लाख से अधिक टेस्ट किए जा रहे हैं, लिहाजा संक्रमित मरीजों की संख्या बढ़ना स्वाभाविक है। दूसरे, जिस स्तर पर मरीज पहचाने जा रहे हैं, उससे भी तेज गति से वे स्वस्थ होकर लौट रहे हैं। ऐसे लोगों को दोबारा कोरोना का संक्रमण होना संभव नहीं है। लिहाजा संक्रमण फैलने पर भी नियंत्रण लग सकता है। यही कारण है कि संक्रमित मरीजों की संख्या 21.50 लाख से ज्यादा होने के बावजूद सक्रिय मरीज छह लाख से ज्यादा ही हैं। उनका उपचार किया जा रहा है, लेकिन जो संकेत हमें डरावने लग रहे हैं और भविष्य के प्रति आशंकित कर रहे हैं, वे अमरीका और ब्राजील को भी पार कर चुके हैं।

  रोजाना के स्तर पर संक्रमित मरीजों और एक ही दिन में मौतों के संदर्भ में भारत दुनिया में पहले स्थान पर है। बेशक कुल आंकड़ों को लेकर भारत अभी अमरीका और ब्राजील से पीछे तीसरे स्थान पर है। तमाम विश्लेषण सिर्फ  कोरोना की टेस्ट जांच के आधार पर ही नहीं किए जा सकते। एक ही दिन में 60,000 से अधिक संक्रमित मरीजों के सामने आने के मायने ये भी हैं कि भारत में कोरोना वायरस अभी पूरे यौवन पर है। कोरोना का प्रभाव-क्षेत्र बढ़ता ही जा रहा है। अभी तो चिकित्सकों का यह आकलन है कि कोरोना का ‘पीक’ शेष है। जिस औसत दर और गति से संक्रमण बढ़ रहा है, उसके मद्देनजर भारत में अगस्त अंत तक संक्रमण का आंकड़ा 40-50 लाख हो सकता है। चूंकि अभी कोरोना का ‘पीक’ बाकी है, तो संक्रमित मरीजों की संख्या एक करोड़ को लांघते ज्यादा देर नहीं लगाएगी। यह कोई सामान्य आंकड़ा नहीं होगा। इस दौरान ब्रिटेन में एक शोधात्मक आध्ययन किया जा रहा है कि एशियन, अफ्रीकी और अल्पसंख्यक जमातों के लोग ही कोरोना की गिरफ्त में ज्यादा क्यों आ रहे हैं? इन जमातों में ही ज्यादा मौतें क्यों हो रही हैं? इस अध्ययन के लिए 40 लाख पाउंड की राशि अलग से रखी गई है। अभी तक कुछ संकेत मिले हैं कि अश्वेतों का सामाजिक और सार्वजनिक व्यवहार श्वेतों की तुलना में अलग होता है।

मसलन हम भारत के शहरों और गांवों में भी देख सकते हैं कि मास्क और सामाजिक दूरी को लेकर हमारा रवैया और आचरण लापरवाही वाला है, जबकि श्वेत और यूरोपीय ऐसी सावधानियों के प्रति बेहद सचेत, सजग हैं। इस आचरण का कोरोना संक्रमण पर सीधा असर पड़ता है। दरअसल समस्या यह है कि संक्रमित मरीजों का दायरा बढ़ता ही जाएगा, तो सक्रिय मरीज भी ज्यादा होंगे, लिहाजा संसाधन भी उतने ही चाहिए! कोरोना वायरस के भारत में फैलते हुए छह माह से ज्यादा का वक्त बीत चुका है। अधिकतर राज्यों में लॉकडाउन खुल चुका है, लेकिन देश के 734 जिलों में से 376 में अब भी पूर्ण या आंशिक लॉकडाउन है। इसके चौतरफा प्रभाव दूरगामी होंगे। भारतीय रिजर्व बैंक ने पहली बार ऐसी टिप्पणी की है कि आजादी के 73 साल बाद पहली बार देश के नागरिकों का औसत आत्मविश्वास सबसे निचले स्तर पर है। जीडीपी की विकास-दर भी नकारात्मक होगी और मुद्रास्फीति लगातार बढ़ने की ओर है।

लॉकडाउन का असर व्यापार और नौकरियां दोनों क्षेत्रों पर ही पड़ा है। उससे उबरने में अभी वक्त लगेगा, लिहाजा कोरोना वायरस की स्थिति हमारे लिए चिंताजनक भी है और कुछ नया विचारने पर भी बाध्य कर रही है। बेशक कोरोना के कारण भारत में औसत मृत्यु-दर 2.01 फीसदी है, जबकि विश्वस्तर पर यह औसत 6-7 फीसदी है। हमारे देश में स्वस्थ होने का औसत भी 68 फीसदी से ज्यादा है। टेस्ट जांच भी 2.5 करोड़ से ज्यादा हो चुकी है। देश में नाजुक मामले पांच फीसदी से भी कम हैं, लेकिन कोरोना संक्रमण के आंकड़े कई स्तरों पर प्रभावित करते हैं, लिहाजा सरकार को नई रणनीति बनाने पर सोचना होगा। संक्रमण के बचे-खुचे अध्याय को सिर्फ  नागरिकों के भरोसे ही नहीं छोड़ा जा सकता।

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