Tuesday, August 11, 2020 12:55 AM

कहने भर को कबाइली

हिमाचली समाज के परिवर्तनों में मानव विकास की सफलताएं परिलक्षित हैं और यही वजह है कि यहां तमाम आरक्षित वर्गों ने अपने ज्ञान,क्षमता व हुनर को परिमार्जित करते हुए हर अवसर को सुनहरी कलम से लिखा है। खासतौर पर कबाइली लोगों ने मानव विकास को मानव संसाधन में सशक्त करते हुए मूल्य केंद्रित समाज का निरुपण किया है। प्रदेश की कुल आबादी का मात्र छह फीसदी हिस्सा अब कहने भर को कबाइली है,जबकि हिमाचल के हर परिवर्तन,बदलती भूमिकाओं में अग्रसर तथा आर्थिक बदलाव की हर निगाह से सबसे अधिक चिन्हित और क्षमतावान समाज है कबाइली। प्रदेश के भरमौर-पांगी,लाहुल-स्पीति और किन्नौर की भौगोलिक परिस्थितियों ने जितनी भी खुरदरी सतह पैदा की थीं,उनसे कहीं बाहर अब कबाइली समाज का मूल्यांकन हिमाचल को प्रगतिशील बनाता है। राज्य की व्यावसायिक गतिशीलता,सामुदायिक विकास की प्रखरता, विकास के नए संवाद और मानव स्वतंत्रता के नए अभिलेख लिख रहे कबाइली समाज को हिमाचल की आर्थिक गतिविधियों खासतौर पर शहरीकरण में समझा जा सकता है। करीब चार लाख कबाइली लोग अपनी भौगोलिक विषमताओं और सामाजिक कंदराओं के बाहर शहरीकरण की संज्ञा में,माइग्रेशन की अद्भुत पहल है। चंबा के करीब 26 प्रतिशत कबाइली लोग आज कांगड़ा के अधिकांश और खासतौर पर धर्मशाला, पालमपुर व बैजनाथ के शहरीकरण का नया ध्रुव हैं। मकलोडगंज के करीब पचास फीसदी होटलों व टैक्सी संचालन के अस्सी फीसदी अमले में गद्दी आर्थिकी का नया आकाश देखा जा सकता है। इसी तरह लाहुल-स्पीति जिला की 87 फीसदी ट्राइबल आबादी के प्रभाव ने मनाली का रुतबा बदल दिया। दरअसल अब मनाली में लाहौल की आर्थिक क्षमता,व्यापारिक निपुणता और सामुदायिक उत्थान का परिदृश्य साबित करता है कि हिमाचल में कबाइली होना कितना प्रभावशाली है। किन्नौर की 66 प्रतिशत कबाइली जनसंख्या में सामाजिक परिवर्तन की करवटें सबसे पहले शुरू हुईं और ज्ञान व अवसर की पराकाष्ठा में यह वर्ग हिमाचल की बुलंद तस्वीर बन गया। कबाइली तरक्की में लिखी गई रोजगार की कवायद प्रदेश की प्रशासनिक, व्यावसायिक व सरकारी नौकरी में दर्ज है,लेकिन अब यह वर्ग खुशहाली के नए आयाम पर अपनी समृद्धि का पता बदल रहा है। सोलन का तीव्रता से हुआ प्रसार अपने वजूद में किन्नौर की कबाइली ख्वाहिशों का नया परिचय भी है। चंडीगढ़ और आसपास विकसित होते शहरों में हिमाचल की क्षमता का नूर बरकरार है, लेकिन इसके मध्य लाहुल व किन्नौर की कबाइली महत्त्वाकांक्षा भी नत्थी। कहना न होगा कि हिमाचल में कबाइली चेतना पूरे सामाजिक परिदृश्य को यह सिखाती है कि किस तरह भौगोलिक व आर्थिक विषमताओं से बाहर निकल कर एक नई  कहानी लिखी जा सकती है। किन्नौर,लाहुल के बाद इस समय हिमाचल का सबसे बड़ा सामाजिक आंदोलन गद्दी समुदाय में शुरू हुआ है। ऐसे में एक विस्तृत अध्ययन की जरूरत है, जो यह साबित कर सकता है कि हिमाचल का कबाइली समाज सबसे अधिक प्रगति के साथ लाभ की स्थिति में है। राष्ट्रीय स्तर पर अनुसूचित जनजातीय लोगों की औसत साक्षरता दर 59 के मुकाबले हिमाचल में 2011 के आधार पर 82 फीसदी कबाइली पढ़े लिखे हैं। दूसरी ओर मध्य प्रदेश,महाराष्ट्र,ओडीसा,तमिलनाडु तथा पश्चिम बंगाल के कबाइली इलाके राष्ट्रीय औसत से भी 18 से 26 फीसदी के अंतर पर पिछड़े हैं। रोहतांग सुरंग का निर्माण लाहुल-स्पीति को कबाइली शक्ति के नए आयाम पर पहुंचा कर निश्चित रूप से देश की अति प्रगतिशील कहानी लिखेगा।

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