कांगड़ा किला

भारत प्राचीन किलों और स्मारकों का देश माना जाता है। जो आज भी अपनी गहरी प्रगति के अतीत का वर्णन करते हैं। उनमें एक प्रसिद्ध कांगड़ा किला जो हिमाचल प्रदेश की खूबसूरत घाटी में बाणगंगा और माझी नदियों के संगम पर स्थित है। प्रसिद्ध कांगड़ा किला भारत का सबसे पुराना किला है। प्राचीन काल में कांगड़ा को त्रिगर्त के नाम से जाना जाता था। ब्रह्मा पुराण के अनुसार जब मां अंबिका ने राक्षसों को नष्ट करने के लिए युद्ध किया था, उसी समय रात में मां ने अपने माथे के पसीने को जमीन पर फेंका था, जिससे एक बलशाली बालक का जन्म हुआ। धरती से जन्म होने के कारण उसका नाम भूमि चंद रखा गया। मां अंबिका ने राक्षसों को खत्म करने के बाद बाकी बचे राक्षसों का नाश करने का कार्य भूमि चंद को दिया और उन्हें राजा की उपाधि से नवाजा।

ब्रह्मा पुराण के अनुसार कटोच वंश के मूल राजा भूमि चंद माने जाते हैं। राजा भूमि चंद के वंश के त्रिगर्त राज्य का वर्णन रामायण एवं महाभारत में भी मिलता है। राजा सुशर्मा चांद जो कटोच वंश के 234वें उत्तराधिकारी थे, जिनकी शादी महाराजा धृतराष्ट्र की कन्या के साथ हुई थी, इसी कारण महाभारत के युद्ध में दुर्योधन के पक्षधर रहे थे। राजा सुशर्मा का अर्जुन से युद्ध का जिक्र महाभारत में विराट पर्व में मिलता है और रामायण में भी त्रिगर्त के राजा ने श्री रामचंद्र जी के पुत्र लव और कुश की मदद उनके लक्ष्मण से युद्ध के समय की थी। कांगड़ा का नाम त्रिगर्त, नगरकोट, भीम कोट, भीम नगर, सुशर्मा पुर के नाम से भी जाना जाता रहा है।

हिमाचल प्रदेश का इतिहास उतना ही प्राचीन है जितना कि मानव अस्तित्व का अपना इतिहास है। जब सिंधु घाटी सभ्यता विकसित हुई थी, तभी इस बात का प्रमाण प्रदेश में कई भागों में खुदाई के दौरान और प्राप्त सामग्रियों से मिला है। फिर भी इतिहास में किले का वर्णन 1009 में मिलता है। किला पहाड़ी क्षेत्र और गहरी नदियों के किनारे होने के कारण इस तक पहुंचना बहुत ही मुश्किल था इसी कारण कांगड़ा किले को अभेद्य भी कहा जाता था। सन् 1337 में महमूद बिन तुगलक एक लाख की सेना के साथ कांगड़ा किले में आक्रमण करने के लिए आया था, उस समय कांगड़ा किला के राजा पृथ्वी चंद ने अपनी कम सेना होने के बावजूद बहुत बहादुरी और शूरवीरता से उसका मुकाबला किया था।                                              -क्रमशः            – मनवीर चंद कटोच, पालमपुर

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