Wednesday, November 25, 2020 10:40 PM

करेला, वह भी नीम चढ़ा: पूरन सरमा, स्वतंत्र लेखक

एक बार एक पड़ोसी महाशय मेरे पास हांफते हुए से आए और बोले-‘अमां यार, यह ‘करेला और वह भी नीम चढ़ा’ का क्या तात्पर्य है? कई दिनों से खामख्वाह इस बात को लेकर परेशान हूं। सोचा तुम तो घर के आदमी हो, तुम से ही पूछ लूं।’ ‘बस यही तो ‘करेला और नीम चढ़ा’ वाली बात है। लालबुझक्कड़ों के गांव में इसी तरह के कौतुक होते हैं।’ पड़ोसी बटुकदास ने आंखें फाड़ीं और कहा-‘क्या मतलब?’ ‘मतलब साफ  है। आप करेले हैं और मौहल्ला विकास समिति का अध्यक्ष पद नीम है। इस तरह आप करेले और नीम चढ़े हो। अब तो समझे।’ मैंने कहा। ‘बात बिल्कुल व्यावहारिक रूप से समझाओ।

 मेरा आशय मैं करेला कैसे हूं और अध्यक्ष पद नीम का पेड़ कैसे है?’ बटुकदास ने शेखचिल्लीपन दिखाया। ‘ऐसा है लाला बटुकदास, शक्ल तुम्हारी भले करेले से नहीं मिलती हो, परंतु स्वाद में तुम्हारे सामने करेला भी फीका है। यानी यही कि तुम्हें यही पता नहीं है कि यह हमारे नाश्ते का समय है और आप कवाब में हड्डी की तरह आ उपस्थित हुए हैं। आप वाकई करेले और नीम चढ़े नहीं हो तो अभी अपने घर जाओ, मैं तुम्हें इसकी विशद् व्याख्या करके बाद में समझा दूंगा।’ मेरे यह करने पर बटुकदास को गलती का एहसास हुआ और वह बराबर वाले पड़ोसी के मकान में अनचाहे रूप से जा घुसा। मैंने राहत की सांस ली और बच्चों को नाश्ता ले आने को कहा। बटुकदास नीम पर चढ़े हुए थे, अतः उन्हें सब्र कब रहने वाला था। अतः वह कुछ क्षण बाद ही फिर आ धमके और बोले-‘शर्माजी मुझे रास्ता दिखाओ।

क्या मुझे अब नीम से उतर जाना चाहिए या वहीं बना रहना चाहिए?’ मैंने कहा-‘बटुकदास जी, जो नीम पर चढ़ा है, वह कभी नहीं उतरा, उसे उतारा जाता है। आप को पता होना चाहिए करेला रहने तक तुम्हें नीम पर ही रहना।’ ‘इसका मतलब यह कि पहले मुझे करेले के जैसे स्वाद से मुक्ति पानी चाहिए?’ ‘जी आप समझे थोड़ा-सा। ऐसा करिए मोहल्ले और आपके, दोनों के हित में यही है कि आप मोहल्ला विकास समिति के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दें तथा नीम से धड़ाम से गिर पड़ें, असंतोष का वेग इतना तीव्र है कि मोहल्ले की युवा जनता आपको गिरेबान पकड़कर नीचे उतारकर आपसे फ्री स्टाइल में मुक्केबाजी करना चाहती है।’ मैंने कहा। करेले का दिल दहल गया और मुंह सूख गया। पानी मांगने के बाद उसने कहा-‘यह क्या कह रहे हैं आप? मैंने तो ‘करेले और नीम चढ़े’ का आशय पूछा!’ बटुकदास पर मानो बिजली गिर गई थी। वह मेरी बात को या तो समझे नहीं थे अथवा समझना नहीं चाहते थे। मैंने भी यही अच्छा समझा कि मैं पहले अपना नाश्ता निपटा लूं। कोई और न आ जाए, इसलिए मैं जल्दी से नाश्ते पर टूट पड़ा।

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