कर्म क्या है?

चलिए जानते हैं कि कर्म क्या है? आप जिस तरह किसी बात को ग्रहण करते हैं, उसे जानते हैं, उसे अनुभव करते हैं और जिस तरह किसी बात पर प्रतिक्रिया देते हैं, वह आपके अतीत की यादों पर निर्भर करता है। उदाहरण के तौर पर अगर आप शांतिदायक संगीत सुनना चाहते हैं और हम आपके लिए बहुत तेज आवाज में बीट्स वाले गाने चला दें, तो आपकी नसें फट जाएंगी, लेकिन वहीं कुछ ऐसे नौजवान होंगे, जिन्हें यह पसंद आएगा।  एक ही आवाज किसी एक इनसान के कानों को संगीत लगती है, तो किसी दूसरे को शोर लगता है। आप किसी खास आवाज को कैसे लेते हैं, ये आपके कर्म हैं। इसलिए हमने कहा था कि जब हम कर्म की बात करते हैं, तो हमारा मतलब आपके कष्ट भोगने से नहीं होता है। यह कर्म का पक्ष नहीं है। कर्म का अर्थ होता है गतिविधि। इस वक्त यहां बैठे हुए हमारी गतिविधि चार आयामों में हो रही है भौतिक, मानसिक, भावनात्मक और ऊर्जा के स्तर पर। आज आपके जागने के पल से इस पल तक इन चारों कर्मों में से कितनों के प्रति आप जागरूक रहे हैं? आप नहीं गिन पा रहे होंगे। मैं आपको बता रहा हूं कि यह एक प्रतिशत से भी कम होगा। जब आप अपने कर्मों के केवल एक प्रतिशत के प्रति ही सचेत रहते हैं तो इसका मतलब यह हुआ कि आपकी जिंदगी में सब कुछ संयोग से हो रहा होता है। इसे इस तरह भी कह सकते हैं कि जब आप सड़क पर गाड़ी चलाते हैं और एक प्रतिशत समय के लिए ही आंखें खुली रखते हैं, बाकी समय आंखों को बंद करके गाड़ी चलाते हैं, फिर दुर्घटना तो होनी ही है। यही जीवन में हो रहा है और इसीलिए इतना ज्यादा तनाव, इतना ज्यादा डर है क्योंकि जिंदगी में ज्यादातर चीजें अचेतन में हो रही हैं। आप क्या कर रहे हैं, आपका शरीर क्या कर रहा है, आपकी ऊर्जा, आपके विचार, आपकी भावनाएं क्या कर रही हैं, इन सब बातों के प्रति केवल मुट्ठी भर लोग ही जागरूक होते हैं। अगर आप चेतना का दायरा बढ़ा लेते हैं, तो अचानक आपको महसूस होने लगता है कि सब कुछ आपके अपने हाथ में है। अगर आप अपने शरीर को जागरूकता के साथ संभाल सकते हैं, तो आपकी जिंदगी और भाग्य का पंद्रह से बीस प्रतिशत आपके हाथों में होगा। अगर आप अपनी सोचने की शक्ति पर काबू पा लेते हैं, तो चालीस से पचास प्रतिशत भाग्य और जिंदगी आपके हाथों में होगी और अगर इसके साथ भावना भी जुड़ जाए, तो समझिए कि दोनों का चालीस से सत्तर प्रतिशत भाग आपने काबू में कर लिया। कर्म करना तो इनसान का धर्म है, लेकिन कभी-कभी हम जीवन में आने वाली कठिनाइयों से इतना घबरा जाते हैं कि हर चीज का दोष परमात्मा को देते हैं, जबकि  इन सबके लिए हम स्वयं ही जिम्मेदार होते हैं। हर किसी का अपना नजरिया होता है काम करने का और देखने का भी। जो वस्तु हमें देखने में सही लगती है किसी दूसरे को शायद न पसंद हो। आप इसे बदल तो नहीं सकते, लेकिन खुद को उस काबिल बना सकते हैं।

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