Saturday, September 19, 2020 07:56 PM

कारवां ही कोरोना का सूत्रधार

उनके कदमों की आहट में कहीं कोरोना छुपा था, ऐ दोस्त जरा संभल तेरे आने से बाजार खफा है। यह व्यथा पालमपुर बाजार की है जिसे दो दिन बंद रहने की सजा मिली, क्योंकि इससे पहले रौनक में जलजले का समाचार उड़ रहा था। इसे एक व्यापारी के कोरोना पॉजिटिव होना मानें या व्यापारी का राजनीति में होना करार दें, हर व्यक्ति दोधारी तलवारों के बीच फंसा है। इससे पहले पालमपुर में ही पूर्व सांसद शांता कुमार को होम क्वारंटीन होना पड़ा, क्योंकि नेताओं की मुबारकें इस वक्त चुनौती भरी हैं। इसीलिए जब सरकार के एक मंत्री सुखराम चौधरी कोरोना पॉजिटिव हुए, तो सारा कारवां ही आशंकाओं का सूत्रधार बना। इस दौरान जहां जीवन को कारवां बनाने की अतिरंजना हो रही है, वहां हिदायतों की मिट्टी पलीद होने लगी है। हिमाचल को सर्वप्रथम यह देखना होगा कि सरकारी फर्ज अपनी प्रक्रिया में चले, न कि इसके लिए मंचन का दस्तूर बने। दुर्भाग्यवश देश की तरह हिमाचल के नेता और सत्ता के पुरोधा अब खुद के लिए कारवां ढूंढने लगे हैं, तो हाल के परिणाम सचेत करते हैं। कोरोना की खबरों में हिमाचल के अस्पताल बंद हो रहे हैं, तो यह सोचना होगा कि मरीज की पहचान में व्यापार का कारवां खड़ा तो नहीं हो रहा। व्यापार को मिली छूट ने हिदायतें ही तो कहीं निगल लीं या जनता ने अब इसी तरह जीने की सीख ले ली।

 जो भी हो यह मानना पड़गा कि अगर एक ही दिन में हिमाचल डेढ़ सौ के करीब कोरोना पॉजिटिव आंकड़े बटोर रहा है, तो हमारे आसपास बीमारी के लक्षण घूम रहे हैं। पिछले कुछ दिनों से कोरोना के लक्षण लेकर औद्योगिक व बागबानी मजदूर पहुंचे, तो सैन्य सेवाओं से घर लौटे जवान भी शरीक हुए। अब तो बसों में हर दिन कारवां बनता है, लेकिन ऐसी अनिवार्यता के दस्तूर में न कोई शर्त बची और न ही सुरक्षा का कोई दायरा। आरंभ में हर पंचायत से नगर निकाय तक बचने का जो जोश था, वह कहां गया। घर-घर मास्क बांटने का सियासी परोपकार अब भीड़ को करीब बुला यह क्या बांटने लगा। क्या कोरोना काल में शोहरत की तफ्तीश हो सकती है या सरकार यूं ही जनता के बीच घूम सकती है। पालमपुर के पॉजिटिव नेता में चिन्हित कोरोना काल को कहीं समझने की गलती न हो, इसलिए खुद को हर कारवां से दूर रखो। आश्चर्य यह है कि प्रशासन की ओर से जारी एसओपी की धज्जियां उड़ रही हैं, लेकिन कहीं कोई जांच नहीं। बसें बिना सेनेटाइजेशन के चल रही हैं और स्थानीय निकाय भी भूल गए कि  कब तक इसका छिड़काव किया जाए। सबसे ज्यादा खतरा रेहडि़यों पर बिक रहा है, जहां न मास्क और न सोशल डिस्टेंसिंग है। नाई की दुकान भले ही गांव तक खुल गई, लेकिन वहां आवश्यक शर्तों की सरेआम अवहेलना ने उपभोक्ता को बढ़ी हुई दरों से काटना शुरू कर दिया, जबकि ग्रामीण सैलून अब कोरोना खतरे के अड्डे बन गए हैं।

खतरा सेब बागीचे तक मंडरा रहा है और बाहर से आते हर आगुंतक भी मंडरा रहा है, लेकिन हम केवल सामान्य परिस्थिति में लौटने के लिए यह भूल रहे हैं कि हमारे आसपास कम्युनिटी स्प्रैड के खतरे बढ़ रहे हैं। हिमाचल में आवश्यक सेवाओं को ढोते-ढोते पुलिस तथा स्वास्थ्य कर्मी इसकी जद में हैं, तो एक बुरी खबर ने मीडिया के जोश को निचोड़ दिया है। डमटाल से पत्रकार पप्पी धालीवाल की कोरोना से हुई मौत से सकते में है कलम और वे माइक भी खामोश होंगे, जो इस काल में हिम्मत दिखाते हैं। यहां यह मांग भी स्वाभाविक तौर पर सरकार से होगी कि दिवंगत पत्रकार को कोरोना वॉरियर के रूप में सम्मान मिले ताकि हम यह कह सकें कि इस दौर में सबसे अव्वल न्याय मिलता रहा है। बहरहाल, कोरोना काल के अति पीड़ाजनक मोड़ पर देश के हर नागरिक को अपनी खुशियों और ख्वाहिशों पर अंकुश रखना होगा। हो सकता अब रेडियो-टीवी पर गूंजते निर्देश बासी लगने लगे हों या खुशी व गम के आयोजनों की किसी सीमा से बाहर निकल समाज अपनी रिवायतों को नार्मल मान रहा हो, लेकिन ये सारे काफिले और संगम इस काबिल नहीं कि कोरोना को अलविदा कह सकें। चुनौतियां हर घर के आंगन तक विराजमान हैं, अतः समाज, सरकार, इश्तिहार, यश या उपकार के भीतर कोई कारवां न बने।

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