Sunday, July 25, 2021 09:17 AM

कश्मीर फिर लहूलुहान

कश्मीर एक बार फिर लहूलुहान हुआ है। कश्मीरियत, जम्हूरियत, अमन और भाईचारे की भी हत्या करने की जेहादी कोशिश की गई है। आतंकवाद कश्मीर के लिए कोई नया यथार्थ नहीं है, लेकिन एक दरिंदे की तरह यह प्रकट होने लगता है, जब हम दहशतगर्दी के घुटने तोड़ देने को आश्वस्त होने लगते हैं। सिर्फ  कश्मीरी पंडित और हिंदू ही आतंकियों के निशाने पर हैं। हर बार कोई न कोई ‘शहीद’ होता है। फिर हुंकारें भरी जाती हैं कि दहशतगर्दों को चुन-चुन कर मारा जाएगा। कुछ अंतराल के बाद सब कुछ शांत और सामान्य होने लगता है। उसके बाद कश्मीर में नई बलि, नई कुर्बानी का इंतज़ार रहता है। देश यह सिलसिला 1990 के दशक से देखता और महसूस करता रहा है, जब कश्मीरी पंडितों को उन्हीं की घाटी और घरों से बेदखल कर दिया गया था। उस दौर में हिजबुल मुजाहिदीन आतंकी संगठन ने धमकियां देने की शुरुआत की थी-‘कश्मीरी पंडितो! हिंदुओ!! घाटी छोड़ो।’ इस आशय के नारे मुस्जिदों से सार्वजनिक तौर पर बुलंद किए जाते थे। आतंकियों और अलगाववादी गुर्गों ने पंडितों के घर, कारोबार लूट लिए, बर्बाद कर दिए।

बहू-बेटियों को बलात्कार का शिकार होना पड़ा। उनकी हत्याएं भी की गईं। यकीनन वह नरसंहार का दौर था। कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति का अनुमान है कि 1990 के कालखंड में 357 कश्मीरी हिंदुओं को मार दिया गया, लेकिन विस्थापित कश्मीरियों के संगठन ‘पनुन कश्मीर’ ने 1341 कश्मीरी पंडितों और हिंदुओं की एक सूची छापी थी, जिनकी 1990 के दौर में हत्या कर दी गई। दरअसल सही आंकड़े वे परिवार ही जानते हैं, जिन्हें कश्मीर घाटी से विस्थापित होना पड़ा अथवा आज भी उनके नेताओं के कत्ल किए जा रहे हैं। यह सम्यक संदर्भ मानस में तब जीवंत हो उठा, जब पुलवामा जिले के त्राल नगरनिगम के चेयरमैन राकेश पंडिता को दहशतगर्दों ने गोलियों से भून डाला। वह ऐसे भाजपा नेता थे, जिन्हें घाटी के त्राल क्षेत्र से निर्विरोध चुना गया था। राकेश पंडिता त्राल के ही मूल निवासी थे। 1990 के दौर में उनके परिवार को पलायन करके जम्मू में बसना पड़ा था, लेकिन सार्वजनिक और सामाजिक सेवा के लिए पंडिता ने त्राल को ही चुना। त्राल का संदर्भ आया है, तो फरवरी, 2019 का पुलवामा आतंकी हमला भी स्मृतियों में कौंधने लगता है। उस हमले में हमारे 40 जांबाज जवान ‘शहीद’ हुए थे। पलटवार में हमारे कमांडो सैनिकों ने पाकिस्तान के बालाकोट में ऐसा हवाई हमला किया था, जिसकी टीस वजीर-ए-आजम इमरान खान और वहां की संसद को सालती रहती है। उस हमले में हमारे सैनिकों ने 250-300 आतंकियों को ‘लाश’ बना दिया था और कई आतंकी अड्डे ‘मलबा’ हो गए थे। यह पाकिस्तान और जेहादियों की फितरत है, जो मार खाकर भी नहीं बदलती। बहरहाल कश्मीर में सेना और सुरक्षा बलों के ‘ऑपरेशन ऑल आउट’ ने आतंकवाद का कचूमर निकाल दिया है। गिनती भर के जेहादी बचे होंगे! आतंकियों को लगातार ढेर किया जा रहा है, लेकिन फिर भी कुछ साजि़शें ऐसी हैं, जो कामयाब हो रही हैं और हमारे जन-प्रतिनिधियों की हत्याएं की जा रही हैं। सितंबर, 2020 में सरपंच अजय पंडिता भारती को बारूद की बौछार ने ‘शहीद’ कर दिया था। यह क्रम आज भी जारी है। सवाल उचित सुरक्षा-व्यवस्था और सूचनाओं का भी है। राकेश पंडिता के घरवालों का शक है कि उन्हें ‘जाल’ में फंसाकर मारा गया है, लिहाजा वे एनआईए जांच की मांग कर रहे हैं। टीवी चैनलों पर ऐसे कई निर्वाचित चेहरों के बयान आ रहे हैं, जिन्हें सुरक्षा डराती रही है और वे अपने लोगों के दरमियान नहीं जा पा रहे हैं।

बेशक सुरक्षित घेरों वाले नेताओं को भी मारा जा चुका है, फिर भी सुरक्षा एक अहम सरोकार और खामी है। यह बंदोबस्त सरकार को करना ही पड़ेगा। सबसे अहम यह है कि केंद्र में भाजपा सरकार के 7 लंबे साल बीत चुके हैं। उसने अनुच्छेद 370 की ऐतिहासिक गलती को सुधारा है, उसके लिए धन्यवादी हैं हम। जम्मू-कश्मीर में भी उपराज्यपाल के जरिए भाजपा ही हुकूमत में है। कश्मीरी पंडितों की वापसी और उन्हें दोबारा बसाने के आश्वासनों का क्या हुआ? अलगाववादी ताकतों को कोने में धकेल कर खत्म करने के संकल्प का क्या हुआ? अब इन सवालों के साथ पंडितों के प्रतिनिधियों की हत्याओं के जवाब देने ही होंगे।