Friday, November 27, 2020 05:42 PM

कौशल व आत्मनिर्भरता की परिकल्पना : डा. राजेश चौहान, लेखक शिमला से हैं

संक्षेप में नई शिक्षा नीति सिर्फ ज्ञान नहीं वरन् कौशल, रोजगार और आत्मनिर्भरता की परिकल्पना है। मातृभाषा में विद्यार्थी सरलता से ज्ञान अर्जित कर सकता है। भारतीय भाषाओं के माध्यम से शिक्षित होना छात्रों के शैक्षिक, सामाजिक और तकनीकी विकास के लिए बाधक नहीं होगा। आधारभूत विषयों और कौशलों का शिक्षाक्रमीय एकीकरण नई शिक्षा नीति की वैज्ञानिकता दर्शाता है। ललित कलाओं, शारीरिक शिक्षा, भारतीय भाषाओं और खेलों पर विशेष बल देना वास्तव में ही सराहनीय है…

हमारे शास्त्र साहित्य, संगीत और कला विहीन मनुष्य को पूंछ तथा सींग रहित पशु की संज्ञा देते हैं। भारतीय संस्कृति चिरकाल से विश्व पटल पर अपनी विशेष छाप छोड़ती चली आ रही है। एक दौर था जब हमें विश्वगुरु होने का गौरव प्राप्त था। दुर्भाग्यवश विदेशी आक्रमणकारियों और अन्य ताकतों ने भारत पर बार-बार आक्रमण कर यहां की सुप्राचीन संस्कृति और ज्ञान को नष्ट करने की पुरजोर कोशिश की। इस क्रम में हमारे बहुत सारे ग्रंथों का लोप हो गया था या उन्हें नष्ट-भ्रष्ट कर दिया गया था। उल्लेखनीय है कि यह प्रक्रिया पूर्व मध्यकाल में महमूद गजनवी के काल से लेकर मध्य काल में दिल्ली और मुगल शासकों तक जारी रही। कालांतर में ब्रिटिश शासकों ने अंग्रेजी के माध्यम से तत्कालीन ब्रिटिश भारत को शिक्षित करने का प्रयास अवश्य किया, परंतु उनका प्रयास स्वार्थ से भरा हुआ था क्योंकि वह एक ऐसा वर्ग तैयार करना चाहते थे जो रूप-रंग से तो भारतीय हो, परंतु मस्तिष्क से ब्रिटिश मानसिकता का प्रतिनिधित्व करता हो। तब से लेकर आज तक कुछ संशोधनों के साथ यह शिक्षा प्रक्रिया चली आ रही है जिसमें आज आमूलचूल परिवर्तनों की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। इसी बात को ध्यान में रखते हुए वर्तमान सरकार ने एक नवीन शिक्षा नीति-2020 को प्रतिपादित किया है। कला और संस्कृति को उचित स्थान प्रदान करने वाली नई शिक्षा नीति 34 वर्ष बाद लागू की गई है। इस दिशा में 21वीं सदी की शिक्षा के लक्ष्यों के अनुरूप नई प्रणाली बनाने के लिए शिक्षा के स्वरूप, विनिमयन और गवर्नेंस के सभी पहलुओं में संशोधन किया गया है। यह नीति तीन से छह वर्ष की उम्र के समस्त बच्चों के लिए मुफ्त, सुरक्षित उच्च गुणवत्तापूर्ण, विकासात्मक स्तर के अनुरूप देखभाल और शिक्षा की पहुंच को सुनिश्चित करती है। यह नीति पांचवीं कक्षा और उससे ऊपर के सभी विद्यार्थियों की बुनियादी साक्षरता और सांख्य ज्ञान अर्जन की वकालत करती है।

इसका एक पहलू ड्रॉपआउट विद्यार्थियों को फिर से शिक्षा से जोड़ना तथा प्रत्येक तक शिक्षा की पहुंच को सुनिश्चित करना भी है। नई शिक्षा नीति में अब तक उपेक्षित रही समस्त भारतीय कलाओं को शिक्षा के सभी स्तरों पर स्थापित करने का खाका तैयार किया गया है। विद्यार्थी अब किसी भी भारतीय ललित कला, भाषा एवं शारीरिक कला को मुख्य विषय के रूप में चुन सकेंगे। इन व्यावसायिक विषयों की उच्च शिक्षा देना कहीं न कहीं आत्मनिर्भर भारत की दिशा में सकारात्मक पहल है। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में कला, विज्ञान, अकादमिक, शैक्षणिक, सहशैक्षणिक और व्यावसायिक शिक्षा में बंटी हुई है, जबकि नई शिक्षा व्यवस्था कला-विज्ञान आदि विषयों के बीच विभेद को समाप्त करती है। यह व्यवस्था सबको एक समग्र शिक्षा प्राप्त करने का विकल्प प्रदान करती है। वर्तमान शिक्षा नीति 1986 में लागू की गई थी। मौजूदा शिक्षा नीति के तहत विद्यार्थी भौतिक विज्ञान ऑनर्स के साथ रसायन विज्ञान, गणित आदि विषय तो पढ़ सकते हैं, लेकिन संगीत, पेंटिंग, फैशन डिजाइनिंग आदि विषयों का अध्ययन नहीं कर सकते हैं।

नई व्यवस्था में विज्ञान का विद्यार्थी भी संगीत, पेंटिंग, फैशन डिजाइनिंग आदि विषयों का अध्ययन कर सकेगा। नई शिक्षा नीति के अनुसार मेजर और माइनर की व्यवस्था होगी। मेजर विषय के साथ माइनर विषयों को भी पढ़ा जा सकेगा। 10 जमा दो के प्रारूप को समाप्त कर इसे 5 प्लस 3 प्लस 3 प्लस 4 के फॉर्मेट में तबदील कर दिया गया है। नई शिक्षा व्यवस्था में पहले 5 साल में प्री-प्राइमरी स्कूल के 3 साल तथा कक्षा एक और दो सहित फाउंडेशन स्टेज शामिल है। अगले 3 साल कक्षा 3 से 5 को तैयारी के चरण में विभाजित किया गया है। इसके बाद के 3 साल कक्षा 6 से 8 तक मध्य चरण तथा कक्षा 9 से 12 तक के 4 साल माध्यमिक चरण में शामिल किए गए हैं। इस व्यवस्था में कला, वाणिज्य और विज्ञान स्ट्रीम का कठोर नियम नहीं होगा। छात्र अब मनवांछित विषय का चुनाव कर सकेंगे। महाविद्यालय स्तर पर नई शिक्षा व्यवस्था के अंतर्गत 4 वर्षीय शिक्षा प्रणाली को अपनाने की बात कही गई है, जो विभिन्न निकास विकल्पों के साथ विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध होगी। नई शिक्षा नीति के अंतर्गत अब ऐसी व्यवस्था की गई है कि यदि कोई विद्यार्थी पढ़ाई बीच में ही छोड़ता है तो उसे एक साल के बाद सर्टिफिकेट, 2 साल के बाद डिप्लोमा तथा तीन या चार साल बाद डिग्री मिल सकेगी।

इतना ही नहीं, बैंक ऑफ क्रेडिट के तहत विद्यार्थी के प्रथम, द्वितीय वर्ष के क्रेडिट डिजीलॉकर के माध्यम से क्रेडिट रहेंगे। इस व्यवस्था से यदि किसी विद्यार्थी को किसी कारणवश अपनी पढ़ाई को बीच में ही छोड़ना पड़े और पुनः एक नियमित अवधि के बाद वह वापस आना चाहे तो उसे प्रथम और द्वितीय वर्ष दोबारा पढ़ने की आवश्यकता नहीं होगी क्योंकि क्रेडिट बैंक की व्यवस्था के अनुसार उसके क्रेडिट एकेडमिक क्रेडिट बैंक में मौजूद रहेंगे। विद्यार्थी इन क्रेडिट्स का उपयोग आगे की पढ़ाई करने के लिए कर सकेगा। संक्षेप में नई शिक्षा नीति सिर्फ ज्ञान नहीं वरन् कौशल, रोजगार और आत्मनिर्भरता की परिकल्पना है। मातृभाषा में विद्यार्थी सरलता से ज्ञान अर्जित कर सकता है। भारतीय भाषाओं के माध्यम से शिक्षित होना छात्रों के शैक्षिक, सामाजिक और तकनीकी विकास के लिए बाधक नहीं होगा। आधारभूत विषयों और कौशलों का शिक्षाक्रमीय एकीकरण नई शिक्षा नीति की वैज्ञानिकता दर्शाता है। ललित कलाओं, शारीरिक शिक्षा, भारतीय भाषाओं और खेलों पर विशेष बल देना वास्तव में ही सराहनीय है।

The post कौशल व आत्मनिर्भरता की परिकल्पना : डा. राजेश चौहान, लेखक शिमला से हैं appeared first on Divya Himachal.