किसान की अनदेखी अकल्याणकारी है: कृष्ण चंद्र महादेविया, वरिष्ठ साहित्यकार

कृष्ण चंद्र महादेविया

वरिष्ठ साहित्यकार

अपने उत्पादन को मंडी तक ले जाने में कठिनाइयों का सामना करने वाले किसानों के सब्र का बांध कभी भी टूट सकता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कृषि, पशुपालन, बागबानी, सब्जी उत्पादन, मौन-मत्स्य पालन, लघु ग्राम उद्योग, लघु औषधि उत्पादन, परंपरागत अन्न तिलहन आदि उत्पादन बेरोजगारी दूर करने के कारगर अस्त्र हैं। सूअर, बंदरों, आवारा गायों की नस्लों के प्रकोपों की तरह अदूरदर्शी राजनीति का प्रकोप किसान हित में नहीं है। अन्नदाता के पक्ष में चिंतन-मंथन करके नवीन नीति बनाने की समयबद्ध जरूरत है…

हिमाचल प्रदेश का कठोर श्रमशील किसान भारत के अन्य राज्यों की अपेक्षा अधिक सहनशील और संवेदना से भरा व्यक्ति है। पुराने समय से लेकर आज तक बिना किसी हुल्लड़बाजी के चुपचाप अपनी मेहनत में रत रह कर कृषि, बागबानी, सब्जी और अनेक फल उत्पादन में लगा हुआ है। उसने कांटों, कृषि को बर्बाद करने वाले घासों, चट्टानों-पत्थरों से भरे खंडहरों को अन्न उत्पादक खेतों में परिणत किया। हिमाचली किसान ने ऐेसे-ऐसे अन्न-दालों का उत्पादन किया जो स्वास्थ्य की दृष्टि से अति उत्तम-पौष्टिक रहीं। अन्न के बीजों को सहेज कर रखा।

यह बीज कभी पुराना नहीं पड़ा और न ही उसकी उत्पादकता में अंतर आया, बल्कि बैलों से बिजाई किया वह अन्न उत्तरोत्तर पैदावार बढ़ाता गया। यहां तक कि राजाओं के जमाने के धूर्त और चालाक लोगों की लोकोक्ति कि ‘उत्तम खेती मध्यम व्यापार, नौकरी-चाकरी तो करे गंवार’ को वह भोला व्यक्ति आजीवन अच्छी मान कर मन में बसाए रहा। हिमाचल का किसान जानता था कि कृषि और पशुपालन का अटूट संबंध है। फलतः पूरे हिमाचल प्रदेश में कृषि के साथ बैल, गाय, भेड़-बकरियां और भैंस पालन होता था। पानी को बचाए रखने के लिए बांवड़ी, तालाब बनाए और बान, बीयूंस, झाडि़यां उगाईं। प्रत्येक परिवार बैलों की जोड़ी के साथ गाय, भैंस व भेड़-बकरियां अवश्य पालता था। कृषि के मामले में हजारों वर्षों के अनुभव को पीढ़ी दर पीढ़ी अपनाने और नए-नए प्रयोग करने वाले हिमाचली कृषक को अयोग्य और मूर्ख समझा गया। जिस प्रकार की जैविक खेती की तथाकथित विशेषज्ञ आज बात करने लगे हैं, हिमाचल का कृषक उसे पच्चासों वर्ष पहले से करता आ रहा है। भेड़-बकरियों तथा अन्य पशुओं के मिंगनों-गोबर व गौशाला के बिछावन से वह केंचुओं के सहयोग से तैयार भरभरी देशी खाद की मलोढि़यों से खेतों को उर्वर बनाने की कला से भली-भांति परिचित रहा है।

यही नहीं, पशुओं को स्वस्थ बनाए रखने तथा खेतों को निरोग बनाए रखने के लिए बसूटी, गंधेलू, बणहा, तिरमिर पत्ते व अन्य झाडि़यों से तैयार बिछावन सभी तरह का कार्य करता था। गौशाला, पशु, खेतों को बिना रासायनिक छिड़काव के निरोग रखने की कला हिमाचली किसान जानता था। किंतु राजनीतिक नेतृत्व की अदूरदर्शिता, कृषि कर्म से उदासीनता, कृषि को सर्वोपरि न मानना एवं अन्नदाता की अवहेलना ने किसान को कुंठित और निराश करके रख दिया है। किसानों की अनदेखी के चलते आज कोदा, कुंदी, भ्रेस, तिल काले, तिल सफेद, टोर, चीणा, काऊणी, जौ, भरठ, सुहडू (मटरी), अलसी, तारामीरा, जीहरी, जांधरा, झीणू, रांघड़ू, नीलकंठ, साठू व धाम्मड़ मक्की, मुंदली गेहूं, माह के दर्शन दुर्लभ हो गए हैं।

जो किसान अपने चूली-साढ़े (खुमानी का एक प्रकार) की गुठलियों का तेल, तिल, सरसों, तारेमिरे, मूंगफली, अलसी के तेल व देशी घी का प्रयोग करता था, आज वह इतना मजबूर बना दिया गया है कि वह बाजार से तौलिक पदार्थ लेता है। बीज जो कभी हिमाचल के किसानों के पेडू-पटारियों-कोठडि़यों से गायब नहीं होता था, आज वे लाइनों में लगने को मजबूर बना दिए गए हैं। अधिक उत्पादन के नाम पर शंकर नस्ली बीज अब क्रय करके बीजने को मजबूर हैं। प्रशासन और राजनीति की लापरवाही ने किसानों द्वारा आदिकाल से बनाए बड़े-बड़े सरोवर, ताल, बांवडि़यों को नष्ट होने को मजबूर कर दिया है। किसानों के खेतों को समय पर पानी नहीं तो कथित उत्तम नस्ल का बीज किस काम का? फिर कोलकाता या महाराष्ट्र-उड़ीसा की कंपनी का वहां पैदा किया बीज क्या हिमाचल की भौगोलिक स्थिति के अनुरूप होगा? राजतंत्र में किसानों की अनदेखी तो मानी जा सकती है, किंतु आजादी के बाद लोकतंत्र में उनकी अनदेखी बर्दाश्त की जानी चाहिए क्या?

जल-जंगल, जमीन, जंतु-जानवर किसान के लिए प्राण हैं, किंतु सीमेंट के लिए पहाड़ों का महाविनाश क्या जायज है? दरअसल मुफ्त कारें, बंगले, टेलीफोन, ड्राइवर पाने वाले जनसेवक हिमाचल के किसान के लिए सोचने की फुरसत ही नहीं रखते। हर वक्त कुर्सी के लिए फिक्रमंद लोग किसान की फिक्र क्यों करने लगे? मंडी जिले की दो पूर्व रियासतों सुकेत और मंडी के राजा बल्ह घाटी के लिए लड़ते रहे हैं। मिनी पंजाब माने जाने वाला यह क्षेत्र पंजाब की उर्वर भूमि के अतिरिक्त भी बहुत कुछ है। यहां बसने वाले किसानों ने सन् 1909 में डोयढ़ा विद्रोह मंडी रियासत व सन् 1924-25 में सुकेत विद्रोह में सहभागी हुए थे। फलतः उन्हें सामाजिक-आर्थिक प्रताड़नाओं के साथ अन्य अनेक प्रताड़नाएं आज तक झेलनी पड़ रही हैं। बल्ह घाटी के नाचन व बल्ह में सब्जी उत्पादन व अन्न उत्पादन करने वाले किसान आज भी सड़कों-पुलों के अभाव में घाटा उठाने को मजबूर हैं। इस घाटी के किसानों का दुर्भाग्य रहा है कि अयोग्य और अदूरदर्शी नेतृत्व आज तक उनकी पक्की सड़क, पुल, रास्तों तक की जरूरतें पूरी करने में जैसे नाकाम ही रहा।

अपने उत्पादन को मंडी तक ले जाने में कठिनाइयों का सामना करने वाले किसानों के सब्र का बांध कभी भी टूट सकता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कृषि, पशुपालन, बागबानी, सब्जी उत्पादन, मौन-मत्स्य पालन, लघु ग्राम उद्योग, लघु औषधि उत्पादन, परंपरागत अन्न तिलहन आदि उत्पादन बेरोजगारी दूर करने के कारगर अस्त्र हैं। सूअर, बंदरों, आवारा गायों की नस्लों के प्रकोपों की तरह अदूरदर्शी राजनीति का प्रकोप किसान हित में नहीं है। अन्नदाता के पक्ष में चिंतन-मंथन करके नवीन नीति बनाने की समयबद्ध जरूरत है। वरना रियासत काल, अंगे्रजों, मुगलों से टक्कर लेने वाले किसानों के सब्र का पैमाना छलक गया तो क्या होगा? इधर वैश्विक महामारी कोरोना ने दिखा दिया कि गांव और खेती ही जीवन-रक्षक हैं। बेरोजगार हुए लोग अब कृषि की ओर अग्रसर हो रहे हैं। उन्हें आशा है कि कृषि से वे अपने परिवारों का पेट पालने में समर्थ हो जाएंगे।

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