Saturday, November 28, 2020 01:35 AM

किसानों पर छिछली सियासत

केंद्र के विवादास्पद कृषि कानूनों के समानांतर पंजाब विधानसभा ने तीन विधेयक पारित किए हैं। पंजाब में कांग्रेस की सरकार है। यही कवायद राजस्थान और छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकारें कर सकती हैं। हालांकि इस तरह प्रस्ताव या बिल पारित करना असंवैधानिक नहीं है। संविधान का अनुच्छेद 254 (2) राज्य सरकारों को विशेषाधिकार देता है कि वे समानांतर बिल पारित कर सकती हैं। बशर्ते वह विषय समवर्ती सूची का हो। हमारे संविधान निर्माताओं को ऐसे विवाद और विभाजन का पूर्वाभास था, लिहाजा उन्होंने 47 विषयों को समवर्ती सूची में डाल दिया था, लेकिन अंतिम समाधान यह नहीं है। पंजाब सरकार ने पारित बिलों में यह व्यवस्था की है कि जो भी न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से कम दाम पर किसान की फसल खरीदेगा, उसे तीन साल तक की जेल की सजा दी जा सकती है और जुर्माना अतिरिक्त होगा। फोकस किसानों पर है और उनका प्रथम हमदर्द बनने की होड़ मची है। खरीफ  की फसलें मंडियों में बिक रही हैं। यदि उन मंडियों का अध्ययन किया जाए, तो एक औसत यथार्थ सामने आया है कि करीब 30 फीसदी फसलें ही एमएसपी पर या उससे अधिक दामों पर बिकी हैं।

 शेष 70 फीसदी फसलों के हिस्से एमएसपी नसीब नहीं हुआ है। बेशक प्रतीकात्मक जीत पंजाब की कैप्टन अमरिंदर सिंह सरकार की दिख रही है, लेकिन पारित विधेयक फिलहाल बेमानी हैं। बिलों में किए गए दावे भी छिछले और सतही हैं कि किसानों को कॉरपोरेट घरानों और निजी बड़े व्यापारियों से बचाने के मद्देनजर बिल लाए गए हैं। यह बुनियादी तौर पर गलत प्रचार है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि बीते वर्ष 90-95 फीसदी गेहूं और अधिकतर गैर-बासमती धान की खरीद सरकारी एजेंसियों ने ही की थी। निजी खरीददार पंजाब और हरियाणा की मंडियों से फसल खरीद करना ही नहीं चाहते, क्योंकि मंडियों की फीस और अनाप-शनाप उपकर देने पड़ते हैं। लिहाजा कमोबेश पंजाब का किसान तो इस मामले में सुरक्षित है, क्योंकि सरकारी खरीद एमएसपी अथवा ज्यादा दामों पर ही की जाती है। बहरहाल बिलों की स्थिति अभी यह है कि उन पर राज्यपाल की सहमति और अंततः राष्ट्रपति की हस्ताक्षरयुक्त स्वीकृति अनिवार्य है। उसके बाद ही कानून का रूप धारण कर सकेंगे। केंद्रीय कानूनों को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद स्वीकृति दे चुके हैं और उन कानूनों को अधिसूचित भी किया जा चुका है। बेशक उन कानूनों में एमएसपी को कानूनी अधिकार नहीं बनाया गया है, अलबत्ता केंद्र सरकार ने आश्वस्त किया है कि किसानों की फसलें एमएसपी पर या उससे ज्यादा तय दामों पर खरीदनी होंगी। ऐसी सहमति न बनने पर किसान देशभर में कहीं भी फसल बेचने को स्वतंत्र है। औसत किसान की यही मजबूरी है। वह साधन-संपन्न नहीं है। वह इंटरनेट, ऑनलाइन मार्केटिंग की भाषा नहीं जानता। पूरा विश्व उसका बाजार नहीं हो सकता। उसे यथाशीघ्र फसल की कीमत चाहिए, क्योंकि कर्ज और खर्च के बोझ उस पर पहले से ही सवार होते हैं।

 कर्ज के कारण वह मंडी के आढ़तियों से भी बंधा  होता है। हमारा किसान व्यापारिक मानस का भी नहीं है, लिहाजा शुरू से ही बहस का केंद्र यही रहा है कि केंद्र सरकार एमएसपी को अनिवार्य कानूनी वैधता दे, ताकि उससे कम दामों पर फसलों की खरीददारी ही संभव न हो सके। न जाने क्यों मोदी सरकार इसे टालती रही है? दूसरी तरफ  पंजाब से जो कोशिश की गई है, वह भरपूर और एक छिछली सियासत है। ऐसी लोकलुभावन राजनीति किसानों का भविष्य संवार नहीं सकती। यह एक बड़े व्यापार का तकनीकी मामला है कि फसलें एमएसपी से कम दाम पर न बिकें, लेकिन इसी मौसम में किसान शिकायतें कर रहे हैं कि मक्का और कच्ची कपास एमएसपी से बहुत कम दाम पर बेचनी पड़ रही हैं। किसान ने लाखों हेक्टेयर में इस साल ये फसलें बोई हैं। बासमती धान भी बड़े स्तर पर बोया गया है। उसका तो एमएसपी कागज पर भी सरकार ने तय नहीं कर रखा है। ऐसे हालात में पंजाब सरकार क्या कर सकती है? एमएसपी से कम दामों पर फसलें बेचनी पड़ रही हैं, इस पर सरकार क्या कहना चाहेगी? मुख्यमंत्री कैप्टन अच्छी तरह जानते हैं कि पहले तो राज्यपाल ही सहमति नहीं देंगे। यदि पारित विधेयक राष्ट्रपति तक भेजे जाते हैं, तो वह उन पर हस्ताक्षर क्यों करेंगे? वह पहले ही संसद द्वारा पारित बिलों पर हस्ताक्षर कर उन्हें कानून बनाने की सहमति दे चुके हैं। उस संवैधानिक स्तर पर दोगला व्यवहार संभव नहीं है। पंजाब सरकार के लिए सर्वोच्च न्यायालय का रास्ता भी बेहद संकरा है, लिहाजा बिलों की नियति समझी जा सकती है।

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