Monday, October 18, 2021 04:17 PM

किशन कपूर ने कितना कहा

सांसद किशन कपूर के सार्वजनिक कथन पर उबलते पंचायत सचिवों की पीड़ा समझी जाए या उस यथार्थ को याद किया जाए जिसे देखते हुए 73वां संविधान संशोधन 1992 में हुआ था। यहां मसला सांसद बनाम पंचायत सचिव हो जाए, तो जनता को न्याय नहीं मिलेगा और न ही राष्ट्रीय संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल हो पाएगा। संशोधन से पहले राष्ट्रीय धन का ग्रामीण सूर्य केवल विधायक या सांसद की इच्छा से ही निकलता था, लेकिन अब परंपरा, प्रक्रिया और पांत बदल गई है। यह सब इसलिए किया गया ताकि जवाबदेह योजनाओं के पक्ष में वातावरण बने और पारदर्शिता को बढ़ाने के लिए जनभागीदारी बढ़े। यह दीगर है कि इतने सालों बाद भी ग्रामीण उत्थान को लगा घुन खत्म नहीं हो रहा, बल्कि भ्रष्टाचार की गलबहियों में कई नए चेहरे आ गए। गांव स्तर में भ्रष्टाचार का तंत्र और संगठित एजेंट ही आधे से ज्यादा संसाधन चट कर रहे हैं, इसकी विवेचना शुुरू हुई है। कर्नाटक राज्य का एक विस्तृत अध्ययन सामने आया है और जहां पाया गया कि पंचायती राज चुनाव में कमीशनखोरी से कमाई गई दौलत किस तरह असर डाल रही है। इधर हिमाचल में भी पंचायती चुनावों में उम्मीदवारों के खर्च का हिसाब और जीत के जश्न में बंटती धाम की अदा, आखिर किन उद्देश्यों को छू रही है।

राजनीति के मंच जिन घोषणाओं से सुसज्जित रहते हैं या जनमंच के संबोधन जहां मुखर होते हैं, वे सभी पंचायती साम्राज्य की शक्तियां ही तो हैं। हिमाचल में मनरेगा, स्वच्छ भारत ग्रामीण मिशन, वाटर शैड प्रबंधन कार्यक्रम, इंदिरा आवास और ग्राम स्वरोजगार जैसे कार्यक्रमों की ताकत में प्रदर्शित राष्ट्रीय संसाधन ही तो राजनीतिक बखेड़े की वजह हैं। आश्चर्य यह कि कर्नाटक और केरल जैसे राज्यों ने 29 विषयों को ग्रामीण सुशासन से जोड़ दिया है, लेकिन हिमाचल की बस्ती में कई लक्ष्मण रेखाएं हैं। द्वंद्व भी यही है कि सियासत का अगुआ कौन बने। भले ही पंचायत का रुतबा अब सीधे राष्ट्रीय संसाधनों तक है, लेकिन लोकतांत्रिक करवटों में भरा राजनीतिक मसाला चैन से नहीं बैठता। ग्राम सभा के केंद्र बिंदु में पंचायत सचिव का दायित्व इसके संचालन तक ही नहीं, बल्कि आयोजन से पूर्व और बाद तक की प्रक्रिया है। ग्राम सभा बैठकों के आयोजन, उनका विवरण, प्रस्तावों की प्रस्तुति और एजेंडा की लिखावट में पारंगता दर्शाते माहौल के बीच पंचायत सचिव का दायित्व तब तक पूरा नहीं होता, जब तक वह गांव की संवेदना, पार्षदों की प्राथमिकता तथा जनता की उम्मीदों की रपट बनाकर उच्चाधिकारियों तक नहीं पहुंचता। पंचायती राज व्यवस्था में कई खामियां दिखाई देती हैं और इस लिहाज से बदलाव होने चाहिएं।

किशन कपूर ने शायद इन्हीं खामियों की वजह ढूंढते हुए प्र्रक्रिया को पदचालन से बचाने की तरफ इशारा किया होगा या आज की हवाओं में इतना घर्षण है कि प्रश्न पूछना भी गुस्ताखी हो जाता है। यह एक प्रमाणिक तथ्य है कि ग्राम सभा की नियमित बैठकों के अभाव में सर्वस्वीकृत योजनाएं नहीं बन पातीं। गांव स्तर पर सामूहिक विचार-विमर्श के अभाव के लिए जनता भी कम जिम्मेदार नहीं। प्रशासन के विकेंद्रीकृत स्वरूप में जनता को अपना शासन खुद चलाना होगा, वरना योजनाओं का पुलिंदा पंचायती राज की निरक्षरता ही साबित करेगा। सांसद किशन कपूर की भावना अगर पंचायती राज में सुशासन लाना है, तो इसके लिए वैधानिक स्तर पर हस्तक्षेप करना होगा। दूसरी ओर यह मसला किशन कपूर बनाम पंचायत सचिव नहीं होना चाहिए। पूरी प्रक्रियाओं के संदर्भ कई बार खोखले साबित होते हैं, लेकिन इनकी वजह व जिरह केवल बहानेबाजी बन जाती है। राष्ट्र निर्माण की सही पहचान में पंचायती राज की गर्दन ऊंची उठनी चाहिए, लेकिन नागरिक जिम्मेदारी के साथ।