Saturday, September 26, 2020 01:52 PM

कौन खरा, कौन मंदा

हिमाचल मंत्रिमंडल में ‘कौन खरा-कौन मंदा’, इसको लेकर मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने अपने इरादे साफ कर दिए हैं। मंत्रिमंडल विस्तार वास्तव में उन्हें अपना रिपोर्ट कार्ड पेश करने का साहस और सरकार के अगले कदमों का सामर्थ्य देता है और इस लिहाज से वह काफी हद तक अपने हिसाब से चल पाए, लेकिन पुराने और नए के बीच जो लुढ़के उसकी खटास शायद ही कम होगी। कुछ लोग इस तरह भी पढ़ सकते हैं कि सरकार में अपने और परायों की टुकडि़यां खड़ी हो रही हैं और यह भी कि अब शेष बचे दो साल का समय नए आधार पर लिखा जाएगा। मंत्रिमंडल विस्तार से सबसे अधिक चोटिल सरवीण चौधरी हुई हैं, क्योंकि अपनी वरिष्ठता के बावजूद वह अंतिम पायदान पर पहुंच गइर्ं।

रामलाल मार्कंडेय व गोविंद सिंह ठाकुर ने भी अपने रुतबे के जलबों को कम होते देखा होगा। दूसरी ओर अपने प्रदर्शन के दम पर कोई मंत्री सबसे अधिक पदोन्नत हुआ, तो यह श्रेय वीरेंद्र कंवर को जाता है। बेशक मंत्रिमंडल विस्तार की परिस्थितियों ने राजीव सहजल का महत्त्व बढ़ा दिया या गोविंद ठाकुर की भरपाई हो गई, लेकिन बिक्रम ठाकुर ने निवेश का सिपाही बनकर मुख्यमंत्री से एक अतिरिक्त ओहदा पा लिया। एक बार फिर घूम फिर कर परिवहन महकमा कांगड़ा के पल्ले पड़ा है, तो बिक्रम ठाकुर के लिए घाटे की एचआरटीसी को संवारने का जिम्मा और निजी बस मालिकों को अपने साथ जोड़ने का अवसर मिला है।

निजी बस आपरेटरों का पूर्व परिवहन मंत्री जीएस बाली के साथ छत्तीस का आंकड़ा कांगड़ा की राजनीति में असरदार रहा है और इसलिए बिक्रम सिंह के माध्यम से राजनीतिक तौर पर नए मायने पैदा किए जा सकते हैं। सुरेश भारद्वाज के मन की मुराद पूरी करता शहरी विकास महकमा शिमला स्मार्ट सिटी के इर्द-गिर्द घूम रहा है, लेकिन यह उन आशंकाओं का निवारण भी कर पाएगा जो कभी राजनीति के द्वंद्व में धर्मशाला के स्मार्ट सिटी घोषित होने पर उन्होंने शुरू किया था। पिछली सरकार के कार्यकाल में सुरेश भारद्वाज से प्रेरित व संचालित यह विरोध अदालत तक पहुंचा था, इसलिए उनकी नई जिम्मेदारी का खुलासा कांगड़ा में ही होगा। बतौर शिक्षा मंत्री सुरेश भारद्वाज की अध्यापक स्थानांतरण नीति का क्या होगा या इस विरासत को गोविंद सिंह ठाकुर आगे खींच पाएंगे, यह कहना मुश्किल है। मंत्रिमंडल के साथ नई उम्मीदों का संसार भी गूंथा गया है, लिहाजा तीन नए मंत्रियों की विभागीय क्षमता का श्रीगणेश होगा। ऊर्जा व खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति के महकमे मुख्यमंत्री के स्पर्श को सुखराम चौधरी व राजिंद्र गर्ग के नाम कर रहे हैं, तो राकेश पठानिया अब तक निष्क्रिय रहे वन व खेल महकमे के सरदार बने हैं।

राजीव सहजल के करीब कोरोना काल से बाहर निकलने का रास्ता अगर चिकित्सा सेवाओं की नई समीक्षा रहेगी, तो यह विभाग सरकार की सबसे अहम प्राथमिकता भी होगा। मंत्रिमंडल विस्तार की अपनी अहमियत में सबसे ऊपर महेंद्र सिंह का फलक दिखाई दे रहा है। मुख्यमंत्री के बाद सबसे अधिक सत्ता का शिखर उनके वजूद में चस्पां है, तो राजस्व को उनके साथ जोड़ने का अर्थ एक तरह से उन्हें उपमुख्यमंत्री की हैसियत में पहुंचाना है या वह अपने प्रभाव से जयराम ठाकुर को प्रभावित करने में सबसे अव्वल हैं। ऐसे में मंत्रिमंडल के सामूहिक नेतृत्व में क्षेत्रीय असंतुलन को खारिज नहीं किया जा सकता और इसके मायने बजटीय दृष्टि से भी देखे जाएंगे कि विकास के रथ किस-किस मंत्री को मिले हैं। विभागीय आबंटन पर गौर करें, तो महेंद्र सिंह, सुरेश भारद्वाज, वीरेंद्र कंवर, राजीव सहजल, गोविंद सिंह व सुखराम चौधरी की क्षमता में आगामी बजट खुल कर शिरकत कर सकते हैं, जबकि बाकी मंत्रियों के पास राज्य के उद्देश्य, योजनाओं के संकल्प और परिवर्तन के इरादे बड़े हो सकते हैं।

जाहिर है मंत्रियों के केंद्र में जनता की क्षेत्रीय अभिलाषा भी उड़ान लेती है और जो राज्य हमेशा से शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पानी, बागबानी और पर्यटन की ओर मुखातिब रहा हो, उसके लिए मुख्यमंत्री के अलावा महेंद्र सिंह, गोविंद सिंह तथा राजीव सहजल के दायित्व मजबूत हुए हैं। सरकार के वर्तमान प्रारूप में राज्य की चिंताएं और चिंतन की गवाही में अगर ये मंत्री खड़े हैं, तो पार्टी के भीतर कुछ क्षमतावान चेहरे अभी भी अंधेरे में रह गए हैं। आधे से ज्यादा कार्यकाल गुजार चुकी जयराम सरकार ने मंत्रिमंडल विस्तार से यह पुष्टि तो कर दी कि सियासी सिक्के कैसे चलते हैं, अब देखना यह बाकी है कि यह बदलाव कितना कारगर सिद्ध होता है। तीन नए मंत्रियों की पहली पारी से जुड़ी आशाएं वास्तव में उनकी राजनीतिक माटी की गंध लिए हैं और इस तरह राजेंद्र गर्ग, सुखराम चौधरी व राकेश पठानिया के लिए समय केवल आगाज नहीं, खुद को साबित करने का अवसर भी है।

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