Friday, August 14, 2020 07:08 AM

क्या यह सहमति भरोसेमंद?

दरअसल भारत-चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) परिभाषित नहीं है। दोनों देशों के अपने-अपने दावे हैं। गश्त के दौरान सेनाएं भिड़ जाती हैं, लिहाजा तनाव और टकराव स्वाभाविक हैं। बेशक भारत-चीन एलएसी पर अमन-चैन और सेनाओं को पीछे ले जाने पर सहमत हुए हैं, लेकिन उसका रोड मैप और समय-सीमा अभी तय नहीं हुए हैं। भारत के लेफ्टिनेंट जनरल और चीन के मेजर जनरल स्तर के सैन्य अधिकारियों के बीच बीती छह जून को भी लगभग ऐसी ही सहमति बनी थी। सेनाओं को लौटना था और एलएसी के अपने-अपने पाले तक सीमित रहना था, लेकिन उस सहमति की परिणति हिंसक और हत्यारे टकराव में हुई। यकीनन उससे दोनों पक्षों ने सबक सीखे होंगे और आपसी बचा-खुचा भरोसा भी टूटा होगा! नतीजतन बीती 22 जून को करीब 11 घंटे के विमर्श के बाद जो शुरुआती सहमति बनी है, वह पहले की अपेक्षा ज्यादा परिपक्व और समझ-बूझ वाली होनी चाहिए। इस सहमति से दक्षिण एशिया और खासकर भारत-चीन की अपरिभाषित सीमा के करीब रहने वाले समुदायों को सुखद एहसास होगा। यह भी आभास और आशंका नहीं रहे कि युद्ध अपरिहार्य है। यह लगभग तय है कि दोनों ही पक्ष युद्ध के लिए तैयार नहीं हैं। अब तो राजनयिक स्तर पर भी संवाद शुरू हो गया है। हालांकि जिस तरह गलवान घाटी, पैंगोंग झील वाले इलाकों से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक भारत-चीन की करीब 3500 किलोमीटर लंबी एलएसी के मोर्चों पर सैनिक तैनात हैं, तोपखाने स्थापित हो चुके थे, गोला-बारूद तैयार थे और लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर आसपास के आसमान में गर्जनाएं कर रहे थे, उनके मद्देनजर युद्ध का तनाव और जंग की उत्तेजना मौजूद थी। कमोबेश अब युद्ध के आसार पिघलने लगे हैं, लेकिन माहौल में तनाव और तनातनी बरकरार हैं। अंतिम निर्णय की घोषणा अभी होनी है। उससे पहले कुछ सवाल स्वाभाविक हैं। क्या फिंगर इलाके में चीनी सेना की तैनाती और ढांचागत निर्माणों के बावजूद सहमति बनी है कि चीनी सैनिक पीछे हटेंगे? फिंगर चार से फिंगर आठ तक के इलाके में चीन ने जो ढांचे खड़े किए थे, क्या वे ध्वस्त किए जाएंगे और इलाका भारतीय सेना के लिए मुक्त किया जाएगा? क्या पूर्वी लद्दाख के इलाकों में चीन ने ‘यथास्थिति’ बदलने की कोशिश की थी और इन्हीं हरकतों को भारतीय जमीन पर चीन का अतिक्रमण समझा जाए? भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने एलएसी की व्याख्या करते हुए कहा था-‘लाइन ऑफ  मिलिट्री कंट्रोल!’ यानी जहां सेना मौजूद है, वह उसका इलाका है। शायद इसी सोच के तहत भारत की करीब 43,180 वर्ग किलोमीटर जमीन चीन के कब्जे में दे दी गई होगी! सवाल है कि क्या सहमति के मौजूदा दौर में भारतीय जनरल और राजनयिक इस व्याख्या को स्वीकार करेंगे? सबसे अहम सवाल यह है कि क्या भारत चीन की मौजूदा सहमतियों को भरोसेमंद मानने का जोखिम उठा सकता है? इसी दौरान मास्को में सोवियत संघ की ‘विजय रैली’ के अवसर पर हमारे रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के साथ संवाद के दौरान रूस के मौजूदा नेतृत्व ने एक बार फिर खुलेआम आश्वासन दिया है कि यदि सुधारों के तहत सुरक्षा परिषद का विस्तार हुआ, तो वह भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन करेगा और आग्रह करेगा कि भारत को वीटो पॉवर दी जाए। चीन के लिए इसका संदेश स्पष्ट है और उसके रोकने के आग्रह के बावजूद रूस ने भारत को रक्षा-सौदों की यथासमय आपूर्ति का विश्वास दिलाया है। बहरहाल भारत-चीन के बीच शांति और स्थिरता का भरोसेमंद समझौता होता है और वह विश्वास के साथ लागू भी किया जाता है, तो अरबों लोग राहत महसूस करेंगे। ऐसे ही मंजर के दौरान हमारे सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे फारवर्ड पोस्ट तक गए और सैनिकों को संबोधित कर उनका हौसला बढ़ाया। उसके पहले जनरल नरवणे घायल सैनिकों का हाल-चाल जानने अस्पताल भी गए। दरअसल सेना प्रमुख का यह दौरा इसलिए रखा गया, ताकि मोर्चे के यथार्थ जान सकें और उसके मुताबिक रणनीति तय की जा सके। बहरहाल स्थितियां पांच मई वाली बहाल होती हैं, तो बेशक वह भारतीय सेना की बहुत बड़ी जीत होगी और चीन को एहसास हो जाएगा कि भारत से लड़ना इतना आसान नहीं है।

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