Monday, October 18, 2021 04:58 PM

एमएसपी को कानूनी दर्जा!

यह भारत सरकार के भरोसेमंद सूत्रों की ख़बर है। मीडिया के प्रमुख हिस्से में भी प्रकाशित हुई है, लिहाजा उसी आधार पर हम विश्लेषण कर रहे हैं। अलबत्ता कृषि और किसानों के संदर्भ में यह बेहद महत्त्वपूर्ण विषय है। किसानों की 23 फसलों के लिए सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की घोषणा करती रही है। बीती 8 सितंबर को भी एमएसपी की दरें बढ़ाई गई हैं। ख़बर यह है कि भारत सरकार एमएसपी को कानूनी दर्जा देने पर गंभीर विचार कर रही है। स्पष्ट कारण है कि फरवरी, 2022 से लेकर साल के अंत तक महत्त्वपूर्ण राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं। उप्र, उत्तराखंड, गुजरात और हिमाचल आदि राज्यों में भाजपा की ही सरकारें हैं। सबसे महत्त्वपूर्ण चुनाव उप्र का है, जहां किसान और जाट समुदाय भाजपा से बेहद नाराज़ हैं, जबकि 2019 के लोकसभा चुनाव में इसी समुदाय के करीब 91 फीसदी वोट भाजपा के पक्ष में आए थे। किसान चुनाव के तमाम समीकरणों को बदल सकते हैं। चूंकि दिल्ली की सीमाओं पर आंदोलित किसानों के धरने-प्रदर्शन को करीब 10 माह बीत चुके हैं, लिहाजा सरकार के नीतिकारों का मानना है कि यदि एमएसपी को कानूनी दर्जा देने की घोषणा कर दी जाती है और उसे तुरंत प्रभाव से लागू कर दिया जाता है, तो कमोबेश आंदोलन शांत हो सकता है। किसानों के एक तबके का मानना है कि एमएसपी का कानूनी दर्जा उनकी समस्याओं का बुनियादी समाधान है।

 विवादास्पद कानूनांे में उचित संशोधनों के लिए भारत सरकार के साथ बातचीत की जा सकती है। किसानों का दूसरा तबका एमएसपी कानून का सम्यक अध्ययन करने के बाद कोई फैसला लेने का पक्षधर है। तीसरा तबका कुछ आक्रामक है और एमएसपी के कानूनी दर्जे को भी ‘भ्रामक’ और ‘धोखा’ करार दे रहा है, क्योंकि उससे सरकारी खरीद का दायरा नहीं बढ़ेगा, लिहाजा वह विवादित कानूनों को रद्द करने तक आंदोलन को वापस लेने के बिल्कुल भी पक्ष में नहीं है। उन्होंने ऐसी घोषणा भी कर दी है। सर्वोच्च न्यायालय ने तीन विशेषज्ञों की जो समिति बनाई थी और उसने जितने भी किसान संगठनों या निजी तौर पर किसानों से बातचीत की थी, उनमें 100 फीसदी का यह आग्रह था कि सरकार एमएसपी को कानूनी दर्जा दे। बेशक उनमें से ज्यादातर किसान आंदोलित नहीं हैं। यह तथ्य भी बेहद गौरतलब है, हालांकि अधिकृत तौर पर सार्वजनिक नहीं किया गया है। बहरहाल सरकार का नया सिरदर्द यह है कि आरएसएस के सहयोगी संगठन-भारतीय किसान संघ-के किसान भी आंदोलन के रास्ते पर उतर आए हैं और अपनी भावी रणनीति पर विचार कर रहे हैं। वे 500 से अधिक जिलों में धरने-प्रदर्शन कर चुके हैं। उनकी बुनियादी मांगें हैं कि सरकार फसलों के लाभकारी मूल्य में बढ़ोतरी करे और सरकारी खरीद का दायरा भी बढ़ाए। इस संदर्भ में केंद्र की शांता कुमार समिति का निष्कर्ष था कि एमएसपी का फायदा सिर्फ  छह फीसदी किसानों को ही मिलता है। वे ऐसे किसान हैं, जो व्यापक स्तर पर मंडियों में अपनी फसल बेचते हैं।

 उनमें छोटे किसान शामिल नहीं हैं। समिति ने भारतीय खाद्य निगम के पुनर्गठन की भी सिफारिश की थी। आज करीब 10 फीसदी किसान एमएसपी से लाभान्वित होंगे। यानी करीब 90 फीसदी किसानों को उनकी फसलों पर एमएसपी नसीब नहीं है, लिहाजा एमएसपी का कानूनी दर्जा उन किसानों के लिए बहुत फायदेमंद साबित हो सकता है। दूसरी तरफ नौकरशाही और सरकार में ऐसी नीतियां बनाई जा रही हैं, ताकि गांवों में बसे किसान शहरों की ओर आएं। बेशक शहर में वे रिक्शा चलाएं अथवा मजदूरी करें। सरकार का एक वर्ग खेती को सिकोड़ना चाहता है। न जाने इसके पीछे क्या दर्शन है? सरकारी खरीद में गेहूं और धान की 40 फीसदी फसल तो एमएसपी पर सरकार ले लेती है, लेकिन सरकारी आंकड़े ही खुलासा कर रहे हैं कि ज्यादातर दालों की सरकारी खरीद ‘शून्य’ है। कुछ दालें खरीदी जाती हैं, वे भी एक फीसदी से कम ही होती हैं, लिहाजा सवाल है कि यदि एमएसपी को कानूनी दर्जा दिया जाता है, तो क्या सरकार अपनी व्यवस्था में बदलाव करेगी? आयात-निर्यात नीतियों में भी संशोधन किया जाएगा और दालों की खरीद भी पर्याप्त की जाएगी? क्या एमएसपी का कानूनी दस्तावेज तैयार करने से पहले किसान संगठनों की भी राय ली जाएगी? बहरहाल एमएसपी का गठन 1967-68 में किया गया था, जो आज तक अव्यावहारिक है। नतीजतन किसान गरीब हैं। क्या अब कानूनी दर्जा देते हुए भी राजकोषीय घाटे सरीखे बहाने तो नहीं बनाए जाएंगे? एमएसपी को कानूनी दर्जा देश हित में ही होगा।