Tuesday, June 15, 2021 12:46 PM

लोक संस्कृति व साहित्य में मंडी का योगदान

लोकसाहित्य की दृष्टि से हिमाचल कितना संपन्न है, यह हमारी इस नई शृंखला का विषय है। यह शृांखला हिमाचली लोकसाहित्य के विविध आयामों से परिचित करवाती है। प्रस्तुत है इसकी दसवीं किस्त…

मो.- 9418130860

विमर्श के  बिंदु

अतिथि संपादक : डा. गौतम शर्मा व्यथित

हिमाचली लोक साहित्य एवं सांस्कृतिक विवेचन -10

-लोक साहित्य की हिमाचली परंपरा

-साहित्य से दूर होता हिमाचली लोक

-हिमाचली लोक साहित्य का स्वरूप

-हिमाचली बोलियों के बंद दरवाजे

-हिमाचली बोलियों में साहित्यिक उर्वरता

-हिमाचली बोलियों में सामाजिक-सांस्कृतिक नेतृत्व

-सांस्कृतिक विरासत के लेखकीय सरोकार

-हिमाचली इतिहास से लोक परंपराओं का ताल्लुक

-लोक कलाओं का ऐतिहासिक परिदृश्य

-हिमाचल के जनपदीय साहित्य का अवलोकन

-लोक गायन में प्रतिबिंबित साहित्य

-हिमाचली लोक साहित्य का विधा होना

-लोक साहित्य में शोध व नए प्रयोग

-लोक परंपराओं के सेतु पर हिमाचली भाषा का आंदोलन

डा. राकेश कपूर

मो.-9418495128

व्यक्ति, स्थान व समय समाज के सरोकारों में विभिन्नता संजोए हुए हैं। इसी विभिन्नता में एकता इसे एक सूत्र में पिरोती है। हिमाचल प्रदेश के जनपदों में भी इसकी झलक देखने को मिलती है। उदाहरणतया लोक गाथा, लोकगीत, लोक वाद्य, लोक नृत्य, चित्रकला, मूर्ति कला, वास्तुकला और इन सबके अलावा जीवन शैली में खान-पान, वेशभूषा, रहन-सहन इत्यादि संस्कृति व परंपरा का अहम हिस्सा हैं। इन सभी विधाओं का संप्रेषण करने में भाषा व बोलियों की सबसे अहम भूमिका है। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार मंडी जनपद का इतिहास लगभग पांच सौ वर्ष पुराना है तथा इसका क्षेत्रफल 1200 वर्ग मील में फैला था। अब यह 3951 वर्ग किलोमीटर यानी 1525 वर्ग मील है। इसे छोटी काशी व हिमाचल प्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में जाना जाता है। इस समय के अंतराल में यहां बहुत सी विधाओं ने जन्म लिया व अब भी फल-फूल रही हैं व उपेक्षित भी हो रही हैं। सर्वप्रथम यदि भाषा की बात की जाए तो मंडयाली कब बनी व विकासित हुई, इस बात का निश्चित उत्तर शायद ही कोई दे पाए। परंतु इसका उद्भव शौरसेनी अपभ्रंश की उत्तर शाखा की पश्चिमी पहाड़ी से माना जाता है। मंडयाली का वर्गीकरण तीन वर्गों सुकेती, मंडयाली व सराजी के रूप में किया जाता है। मंडयाली की लिपि को टांकरी के रूप में माना जाता है। परंतु आज जो मंडयाली में साहित्यिक रचनाएं रची जा रही हैं, उन्हें देवनागरी लिपि में संप्रेषित किया जा रहा है।

मई 2018 में ‘मंडयाली टांकरी’ नाम से श्री जगदीश कपूर द्वारा रचित पुस्तक प्रकाशित हुई है जिसे उन्होंने आज की व आने वाली पीढ़ी को अवगत करवाने के आशय से लिखा है। इसके अतिरिक्त डा. जगत पाल शर्मा का मंडयाली का भाषा शास्त्रीय अध्ययन, शब्द और शब्द, आगरा द्वारा प्रकाशित किया गया है तथा यह मंडयाली भाषा को प्रमाणित करने के लिए उनका एक अनूठा प्रयास है। मंडी जनपद में भी विभिन्न कलाओं की झलक उसकी सभ्यता और संस्कृति में गूढ़ रूप में मिलती है तथा लोक संस्कृति व साहित्य की परंपराओं को सहेजने में समयपरक विभिन्न विभूतियों का अपना-अपना योगदान है। संगीत एवं काव्य कला में जन्म, संस्कार गीत, भ्याइयां, छिंज-छिंजोटियां, टप्पे, भ्यागड़े, बाल्लो, बारहमासा, झेह्ड़े, लोकगीत व वर्तमान में कविताएं गायन व काव्य के अनूठे उदाहरण हैं। इसके अतिरिक्त साहित्य चूड़ामणि पंडित भवानी दत्त शास्त्री ने संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी व मंडयाली में साहित्य की रचनाएं रच कर इस जनपद में अभूतपूर्व कार्य किया है। लेरां धारां री, पहाड़ी गीत व कविताएं जो उन्होंने 1953 से 1984 तक लिखी, का संकलन 1984 में डायमंड प्रिंटिंग प्रेस मंडी द्वारा प्रकाशित किया गया। श्रीमदभगवद्गीता का पहाड़ी अनुवाद अपने आप में उनकी एक उत्कृष्ट रचना है। श्री मोती लाल हांडा जी ने मंडयाली में कविताएं रची। सुश्री हरिप्रिया द्वारा रचित यादा रा हयूं, काव्य, मंडयाली में, 2017 में देवभूमि प्रिंटिंग प्रेस मंडी द्वारा प्रकाशित किया गया। श्रीमती रूपेश्वरी शर्मा जी ने दादी-नानी की लोक कथाएं विषय पर मंडयाली व हिंदी में अनुवादित विभिन्न कहानियां संकलित की हैं जो 2018 में पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुई हैं। श्री कृष्ण चंद्र महादेविया ने हिमाचल के लोक साहित्य में लोक लघु कथाएं सन् 2017 में प्रकाशित की हैं। श्री प्रकाश चंद धीमान ने जहां  झेह्ड़ों पर गहन कार्य किया है तथा इसके अलावा  मंडयाली में भी इनका उपन्यास छह चार नाम से सन् 1988 में  प्रकाशित हुआ है। इस प्रकार गद्य व पद्य में साहित्यिक सृजन जारी है।

नाट्य कला में बांठड़ा मंडी व सुकेत रियासत में मुख्य लोकनाट्य माना जाता रहा है। बांठड़ा के गढ़ों के रूप में देवधार, मझवाड़, कीपड़, मलवाणा, बड़सू, मौवीसेरी, जै देवी, पांगणां व करसोग को जाना जाता है। बांठड़ा में विभिन्न प्रकार का समावेश हरि-रंग, चंद्रौली, सूत्रधार, लोक वाद्य एवं संगीत, बोल-संवाद, स्वांगी के रूप में रहता है, जो इस नाट्य कला को अधिक रुचिकर बनाते हैं। इसके अलावा बुढड़ा, भगत, हरण व मडयाल़ा भी लोक नाट्य हैं जिन्हें मंडी जनपद में इकट्ठे होकर ग्रामीणों द्वारा किया जाता है। श्री मुरारी शर्मा ने सन् 2004 में बांठड़ा नाम से ही पुस्तक लिखी है जिसे कृतिका प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया है। श्री कृष्ण चंद्र महादेविया द्वारा दो लोकनाट्य ढेका नगाड़ा, स्यों ध्याड़े गए क्रमशः 1990 वह 2008 में प्रकाशित हुए हैं। मंडी जनपद में मेलों, त्योहारों उत्सवों के अवसरों पर विभिन्न प्रकार के नृत्यों की परंपरा है। लोक नृत्य में विभिन्नता पाई जाती है। जैसे धार्मिक व सामाजिक तथा रीति-रिवाजपरक नृत्य। देवी-देवता का नृत्य, जाग होम के अवसरों पर गुरों व छरनाटों के नृत्य धार्मिक परंपरा में आते हैं। नाटी ढिल्ली, फेटी, दोहरी इत्यादि सराज क्षेत्र व नाचन क्षेत्र में होती है तथा सनोर बदार व चुहार की नाटियां इनसे भिन्न हैं। लुड्डी, हरी-रंग, चन्द्रौल़ी, थुन्डरु तथा तलवार, परात, रुमाल इत्यादि के साथ नृत्य सामाजिक परिवेश के नृत्य हैं।

इसके अतिरिक्त जन्मदिन, विवाह व अन्य संस्कारों के अवसरों पर भी नृत्यों की परंपरा है जो आज भी कायम है और जिसका निर्वहन आज भी पूरे जनपद में विभिन्न रूपों में किया जाता है। मांडव्य कला मंच ने लुड्डी नृत्य, जिसे वर्तमान में नागरीय नृत्य की संज्ञा दी गई है, को देश व विदेशों में पहचान दिलवाई है।

-क्रमशः

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