Tuesday, June 15, 2021 11:57 AM

लोकसाहित्य अनुसंधान संभावना एवं अपेक्षाएं  

डा. सुशील कुमार फुल्ल

मो.-7018816326

लोकसाहित्य लोक संस्कृति एवं लोक रंग किसी भी देश-प्रदेश की धड़कनों के परिचायक होते हैं। लोक मानस सैकड़ों वर्षों के अनुभवों, आचार-व्यवहार की अंतरंग सम्पृक्ति, काल के निकष पर प्रतीति से निर्मित एवं संचालित होता है। लोक कथा हो, लोक गीत हों, लोक गाथाएं हों, कहावतें एवं लोकोक्तियां हों, या लोक रंग के अन्य क्रियाकलाप हों, धार्मिक विश्वास या आस्थाएं हों, सभी लोकसाहित्य की जीती-जागती धाराएं होती हैं। प्रसिद्ध लोक तत्त्व मनीषी जान ड्ंिकवाटर ने तो यह स्वीकार किया है कि मानव की प्रवृत्तियां सार्वभौमिक होती हैं, भले ही स्थान, देश, परिवेश के कारण उनके रंगों में किंचित परिवर्तन आ जाए। हिमाचल भी इसका अपवाद नहीं है। भारत के अनेक प्रदेशों ने अपने-अपने लोकसाहित्य की सम्पदा को संरक्षित रखने के प्रयास किए हैं। राजस्थान में जैसे किसी समय में डा. सत्येंद्र शर्मा ने, पंजाब में देवेंद्र सत्यार्थी, संतोख सिंह धीर ने तथा और बहुत से विद्वानों ने लोकसाहित्य को समेटने-संरक्षित करने का काम किया, उसी प्रकार हिमाचल में भी मौलूराम ठाकुर, डा. गौतम शर्मा व्यथित, डा. बंशी राम शर्मा, डा. खुशीराम गौतम, प्रो. नरेंद्र अरुण व डा. श्रीराम शर्मा आदि ने भी हिमाचल के लोकसाहित्य को संग्रहित, संपादित एवं सहेजने का काम किया।

फिर जैसे लहर आती है, हिमाचल के विश्वविद्यालयों में पीएचडी उपाधि के लिए बहुत से छात्रों ने लोकसाहित्य पर शोध कार्य करके उपाधियां अर्जित कीं। स्वाभाविक है कि अधिकांश थीसिस विभिन्न जिलों के लोक गीतों पर थे, यथा मंडयाली के लोकगीतों का अध्ययन एवं विश्लेषण, लाहुल-स्पीति के लोक गीतों का अध्ययन एवं विश्लेषण, सिरमौर के लोक गीत व चंबा के लोक गीत आदि। और बहुत अच्छा शोध भी सम्पन्न हुआ। लेकिन आज इंटरनेट के युग में सुविधाओं का दुरुपयोग भी हो रहा है। कट एंड पेस्ट की प्रवृत्ति के कारण मौलिकता कहीं गायब हो गई है। वास्तव में लोकसाहित्य की किसी भी विधा पर अनुसंधान के लिए वर्षों तपस्या करनी पड़ती है, सामग्री का सार संग्रहण वैज्ञानिक ढंग से करना पड़ता है। मौखिक परंपराओं को कलमबद्ध या रिकार्ड करना पड़ता है और फिर उसका विश्लेषण। विश्लेषण भी ऐसा कि हर जिले की स्थितियां, परिवेश एवं परंपराएं किंचित भिन्न और बोली एवं भाषा का संस्कार भी कतिपय अलग होने के कारण तुलनात्मक स्तर पर जाकर अध्ययन एवं उसका परीक्षण-निरीक्षण करना पड़ता है। आधुनिक सुख-सुविधाओं के युग में मौखिक परंपराएं सिमट रही हैं और इन मौखिक ज्ञानकोषों के संवाहक सिकुड़ चुके हैं। ऐसी स्थिति में अधिकांश लोग यहां-वहां से जो भी मिले, उसे लेकर अपना ही समझते हुए उसे अपने ढंग से प्रचारित-प्रसारित कर देते हैं। इससे बहुत हानि होती है क्योंकि किसी का गीत किसी के नाम, कोई कॉपीराइट थोड़े है न।

यही कारण है कि आपको बहुत से ऐसे लेखक या गीतकार मिल जाएंगे जो कहते हैं कि अमुक-अमुक लोकगीत तो मैंने लिखा-गाया था, परंतु प्रकाशित नहीं हुआ था और पहले ही किसी दूसरे ने उसे अपना कह कर गाना, प्रचारित करना शुरू कर दिया। यह अन्याय है और इसका समाधान इतना सहज नहीं। एक और घातक प्रवृत्ति देखने में आती है कि लोगों ने अपने-अपने ढंग से लोक कथाओं का संकलन एवं संपादन प्रस्तुत कर दिया है, परंतु समग्र रूप से हिमाचल की लोक कथाओं का संग्रह फिलहाल तो मार्किट में दिखाई नहीं देता। सन् 1962 में संतराम वत्स्य जी ने ‘हिमाचल की लोक कथाएं’ शीर्षक से एक संग्रह आत्मा राम एंड संस से प्रकाशित करवाया था, परंतु उसमें भी लोक कथाएं अधिकांशतः कांगड़ा की ही थीं। वह प्रारंभिक प्रयास था, लेकिन एक मार्गदर्शक था। आज एक और प्रवृत्ति घर कर गई है कि मार्किटिंग प्रमुख हो गई है। जैसे कुछ वर्ष पूर्व पेड न्यूज का सिलसिला चला था, उसी प्रकार प्रकाशन में भी भ्रम पैदा करके साहित्यिक चीजों को बेचने की प्रवृत्ति दिखाई देती है लोक साहित्य में भी। मुझे हिमाचल के लोक गीतों पर कोई पुस्तक आलोचनार्थ मिली। मैं बड़ा प्रसन्न हुआ कि एक ही स्थान पर पूरे हिमाचल के लोक गीत मिल जाएं तो इससे बढि़या बात क्या हो सकती है, परंतु जब मैंने अनुक्रमणिका देखी तो उसमें मात्र कांगड़ा और ऊना के लोक गीत थे। कोई भी अनुसंधान तब तक पूरा नहीं होता जब तक आप स्रोत तक नहीं पहुंचते और लोकसाहित्य में तो इसका होना और भी महत्त्वपूर्ण है।

 सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में उसे देखना-परखना आवश्यक होता है। पका-पकाया माल हज़म करने की अपेक्षा लोक अवधारणाओं की जड़ तक पहुंचना और उसके समकक्ष उपलब्ध सामग्री को तुलनात्मक रूप से तोलना लाभदायक हो सकता है। शोध में पिष्टपेषण के लिए भी कोई स्थान नहीं। आप कुछ नया नहीं ढूंढ सकते तो सारी प्रक्रिया बेकार हो जाती है। दूसरे प्रदेशों के लोकसाहित्य की धाराओं को तुलनात्मक अध्ययन के रूप में लिया जा सकता है। जैसे अभी बीकानेर विश्वविद्यालय से बड़सर कालेज में हिंदी की सहायक आचार्य डा. शकुंतला राणा ने राजस्थान एवं हिमाचल के लोक गीतों का तुलनात्मक अध्ययन कर पीएचडी की उपाधि अर्जित की है। हिमाचल के लोकसाहित्य में खोज खबर की अभी भी बहुत संभावनाएं हैं और लोकसाहित्य के समुद्र में बहुत से सीप-मोती विद्यमान हैं जिन्हें वे ही लोग ढूंढ सकते हैं जो प्राणपण से लोकसाहित्य को समर्पित हैं।

विमर्श के बिंदु

अतिथि संपादक : डा. गौतम शर्मा व्यथित

हिमाचली लोक साहित्य एवं सांस्कृतिक विवेचन -8

-लोक साहित्य की हिमाचली परंपरा

-साहित्य से दूर होता हिमाचली लोक

-हिमाचली लोक साहित्य का स्वरूप

-हिमाचली बोलियों के बंद दरवाजे

-हिमाचली बोलियों में साहित्यिक उर्वरता

-हिमाचली बोलियों में सामाजिक-सांस्कृतिक नेतृत्व

-सांस्कृतिक विरासत के लेखकीय सरोकार

-हिमाचली इतिहास से लोक परंपराओं का ताल्लुक

-लोक कलाओं का ऐतिहासिक परिदृश्य

-हिमाचल के जनपदीय साहित्य का अवलोकन

-लोक गायन में प्रतिबिंबित साहित्य

-हिमाचली लोक साहित्य का विधा होना

-लोक साहित्य में शोध व नए प्रयोग

-लोक परंपराओं के सेतु पर हिमाचली भाषा का आंदोलन

लोकसाहित्य के बंद दरवाजों को कौन खोलेगा

जयदेव ‘विद्रोही’

मो.-9318599987

वास्तव में लोक संस्कृति ही भारतीय संस्कृति की जननी है। इस स्तंभ के लेखकों ने ‘लोकसाहित्य के दरवाजे बंद हैं’ विषय को बड़ी संजीदगी से चर्चा का विषय बनाया है। उन्होंने एक ऐसा प्रश्न खड़ा किया है जो आज हर लेखक की जुबान पर है। लोक के लेखन को लेकर अभी कुछ ही दशक हुए हैं, जिसके चलन पर भिन्न-भिन्न दिशाओं के लेखकों ने अपने-अपने आंचलिक परिवेश पर कुछ न कुछ कहना आरंभ किया है।

किन्नौर, लाहुल-स्पीति से लेकर कुल्लू, मंडी, चंबा, पंगवाली, कांगड़ी, कहलूरी, महासुवी, सिरमौरी में कोई ऐसा विषय नहीं जिस पर वहां की बोलियों में रचनात्मक सृजन न हुआ हो। परंतु विकास के सर्वांगीण दौर में इतना सब काफी कुछ भी तो नहीं। समय, परिस्थितियों तथा राजनीतिक उदासीनता के कारण हिमाचल के लेखक को वह प्रोत्साहन नहीं मिल पाया जिसका वह अधिकारी है। जो कुछ किसी ने अर्जित किया भी है, वह इने-गिने अपने कुछ लोगों को चिंतन से जुड़े अधिकारियों की मेहरबानी का प्रतिफल है अन्यथा पड़ोसी राज्यों के अनुपात में हिमाचली पहाड़ी प्रतिभा का दम घुटता ही चला जा रहा है और न जाने सृजनशील लेखन को इस घुटन से कब निजात मिलेगी। साहित्य एवं लोकसाहित्य संबंधी समस्याओं को उजागर करने का जो संवाद ‘दिव्य हिमाचल’ ने शुरू किया है, उसका सर्वत्र स्वागत हो रहा है।

विशेषकर नवोदित लेखकों के लिए यह संवाद उत्साहवर्धक ही नहीं, प्रकाशन से जुड़े अन्य संस्थानों के लिए भी अनुकरणीय है। लोक को लेकर प्रदेश कला संस्कृति अकादमी हिम भारती के वर्ष में केवल दो संस्करण निकालती है। वर्तमान में इसके साहित्यिक स्तर को समृद्ध करने हेतु और कुछ करने की आवश्यकता है, जबकि बिपाशा की तरह इसे भी द्विमासिक पत्रिका करने की मांग जोर पकड़ रही है।

प्रदेश के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग द्वारा गिरिराज में लोकसाहित्य और भाषा के लिए मात्र एक पृष्ठ नाकाफी है, इसे कम से कम दो पृष्ठ तक बढ़ाना समय की मांग है। लेखक को यदि प्रकाशन की सुविधा ही नहीं मिली तो कोई लिखेगा क्यों? केवल अलमारियों में पांडुलिपियों को भरते जाना कोई समाज या लेखन सेवा तो नहीं।

हिमाचली संस्कृति से जुड़ा हर हिमाचली चाहता है कि लोक भाषा और लोक संस्कृति का विशद स्वरूप सामने आए। आज तो यह मामूली सी बात है। हर वर्ष एक नवंबर को पहाड़ी हिमाचली भाषा दिवस का आयोजन नए रंग-ढंग से होना चाहिए। इसमें दो दिन के सत्र बुलाकर भिन्न-भिन्न विषयों पर चर्चा होनी चाहिए और ये विषय हर वर्ष नए होने चाहिए, न कि एक ही विषय की बार-बार पुनरावृत्ति हो। इसमें नए युवा लेखकों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए ताकि उनमें अपनी भाषा और लोकसाहित्य के प्रति जिज्ञासा और सम्मान बढ़े। युवा लेखकों को प्रोत्साहन दिए बिना साहित्य सृजन के सकारात्मक परिणाम हासिल करना मुश्किल है, अतः युवा साहित्यकारों को प्रोत्साहन मिलना ही चाहिए।

इस आयोजन में इस लोक से जुड़ा हर विद्वान चाहे वह एचएएस है या आईएएस, सचिव सरकार, महाविद्यालय का प्रोफेसर है या विश्वविद्यालय का, खुलकर विचार प्रस्तुत करे और 1 या 2 नवंबर को यह कार्यक्रम चार-चार सत्र का होना अनिवार्य हो। इनमें वे सभी सेवानिवृत्त अधिकारी भी शामिल किए जाएं जो भाषा विभाग में निदेशक या सचिव पद पर रहे हों।

हर तीन माह में राज्य स्तर पर आयोजन हो जो लोक कलाकारों और लोक साहित्यकारों के लिए हितकर रहे। बात ध्यान देने योग्य है कि ऐसे आयोजन ही नए प्रभात की नई किरण बनकर नवचेतना प्रदान करते हैं। एक ऐसी सूची तैयार हो जो हिमभारती तथा सोमसी में प्रकाशनार्थ सामग्री की काट-छांट करने में जिनकी जवाबदेही हो। वे सकारात्मक सोच के धनी हों और उन्हें अपने प्रदेश की भाषा, संस्कृति और लोकसाहित्य का विशद ज्ञान हो।

जिस नगर में विभाग या साहित्यिक अकादमी के कोई आयोजन हों, उनमें हिमाचल के इतिहास, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों को लेकर हर आयोजन में विहंगम दृष्टिपात की आवश्यकता है ताकि हर किसी को उस क्षेत्र की जानकारी मिल पाए। यदि प्रदेश भाषा संस्कृति अकादमी और प्रदेश भाषा संस्कृति विभाग ऐसे ढंग से सकारात्मक सोच लेकर आयोजन और प्रकाशन करें तो निश्चित रूप से ही लोकसाहित्य के बंद दरवाजे खुल सकते हैं।

पुस्तक समीक्षा

हिमाचल का बाल साहित्य अब लिखित रूप में

हिमाचल का बाल साहित्य अब लिखित रूप में (किताब) उपलब्ध है, यह प्रदेश के लिए गौरव की बात है। इस दुश्कर कार्य को अंजाम दिया है मंडी जिला से संबद्ध प्रदेश के प्रसिद्ध साहित्यकार और बाल साहित्य के अध्येयता पवन चौहान ने। प्रकाशक डायमंड बुक्स द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘हिमाचल का बाल साहित्य’ पहाड़ी बाल साहित्य पर एक संपूर्ण किताब है। 183 पृष्ठों पर आधारित इस पुस्तक का मूल्य मात्र 250 रुपए है। यह हिमाचल के बाल साहित्य पर अब तक की पहली पुस्तक है। लेखक पवन चौहान ‘अपनी बात’ में कहते हैं कि हिमाचल में भी बाल साहित्य की हर विधा यथा बाल कहानी, कविता, गीत, उपन्यास, नाटक, एकांकी, पहेलियों आदि में बेहतरी से सृजन हुआ है। इस बात की गवाह इन साहित्यकारों द्वारा अपने-अपने समय अंतराल में लिखी गई रचनाएं हैं। इस सृजन के बावजूद हिमाचल का बाल साहित्य पूर्ण रूप से पाठकों की नजर में नहीं आ सका है।

इसका एक कारण मीडिया का उस समय का सीमित विस्तार और किसी भी ऐसी पुस्तक का न होना रहा है जो इन साहित्यकारों की रचनाशीलता को पाठकों, शोधार्थियों तक ले जाती। हिमाचल के बाल साहित्य के लिए यह सबसे दुखद पहलू था। हिमाचल के बाल साहित्य पर जब भी चर्चा होती थी, तो जैसे चुप्पी-सी पसर जाती थी। इसी से प्रेरित होकर पवन चौहान ने यह किताब अनेक कठिनाइयों के बावजूद रच डाली है। हिमाचल के बाल साहित्य की विकास यात्रा को लेखक ने तीन भागों में बांटा है। प्रारंभिक काल में सन् 1950 से 1975 तक का साहित्य है। 1975 से 2000 के मध्य के कालखंड को हिमाचल के बाल साहित्य का स्वर्णिम काल कहा गया है। इसी तरह उत्तर स्वर्णिम काल में 21वीं सदी का साहित्य लिया गया है। किताब का मुख्य भाग गद्य खंड व पद्य खंड में विभाजित है। गद्य खंड में 29 साहित्यकारों के परिचय के साथ-साथ उनकी प्रमुख रचनाएं दी गई हैं। इसी तरह पद्य खंड में 13 साहित्यकारों के परिचय के साथ उनकी कृतियों को लिया गया है।

हिमाचल के बाल साहित्य में योगदान करने वाले करीब-करीब सभी साहित्यकारों से पाठक रूबरू हो सकता है। जिन साहित्यकारों ने हिमाचली बाल साहित्य में योगदान किया है, उनमें अदिति गुलेरी, अमर सिंह शौल, अमरदेव अंगिरस, अनंत आलोक, आशा शैली, गंगाराम राजी, गिरीश हरनोट, गुरमीत बेदी, हरदेव सिंह धीमान, हेमकांत कात्यायन, कंचन शर्मा, कृष्णचंद्र महादेविया, गिरीधर योगेश्वर, मनोहर लाल, मस्तराम कपूर, पवन चौहान, प्रभात कुमार, प्रतिभा शर्मा, प्रत्यूष गुलेरी, प्रेमलता, राममूर्ति वासुदेव प्रशांत, रूपेश्वरी शर्मा, सैन्नी अशेष, संतोष शैलजा, संतराम वत्स्य, शेर सिंह, सुदर्शन वशिष्ठ, सुशील कुमार फुल्ल तथा त्रिलोक मेहरा शामिल हैं। इसी तरह गौतम शर्मा व्यथित, कृष्णा अवस्थी, कृष्णा ठाकुर, मामराज शर्मा, मोतीलाल घई, नलिनी विभा नाजली, पीयूष गुलेरी, राजीव कुमार त्रिगर्ती, राजेंद्र पालमपुरी, रामप्रसाद शर्मा, रमेश चंद्र शर्मा, रतन चंद रत्नेश तथा अन्य बाल रचनाकारों ने भी बाल साहित्य का सृजन किया है। यह पुस्तक बड़े परिश्रम से लिखी गई है। पाठकों तथा शोधार्थियों के लिए यह पुस्तक निश्चित रूप से ही उपयोगी है। लेखक को इस पुस्तक के लिए बहुत-बहुत बधाई।

-राजेंद्र ठाकुर

सहज भावों को अभिव्यक्त करती कविताएं

कविता संग्रहों के प्रकाशन क्रम में ‘एटीएम के अंदर औरत’ कवि विक्रम गथानिया का पांचवां काव्य संग्रह है। हिमाचल प्रदेश से संबद्ध इस कवि की रचनाधर्मिता दो दशकों तक फैली हुई है। समकालीन कविता में इनके इस संग्रह का प्रकाशन महत्त्व का विषय है। इन कविताओं में समसामयिक जीवन के विभिन्न विषयों पर अभिव्यक्ति ही नहीं है, बल्कि विभिन्न प्रकार की विसंगतियों पर कटाक्ष भी है। इन कविताओं में मानव जीवन के प्रति सदाशयता के भाव का प्रकटीकरण हुआ है। सामाजिक ही नहीं, सांस्कृतिक विषयों पर कवि के भाव उद्धृत हुए हैं। ‘सनातन स्थापना’ कविता में कवि सती प्रसंग को एक सही रूपक में प्रस्तुत करता है। कवि स्त्री के अधिकारों के लिए, उनके समुचित सदुपयोग के लिए एक सही दृष्टिकोण प्रस्तुत करता कविता ‘अपने इसी समय में’ कहता है ः पीढ़ी दर पीढ़ी/घसीट कर भी/क्या स्त्री को पुरुष हो जाना है/प्यार से ही/हर स्त्री को पुरुष होना है/अपने इसी समय में।

कवि ने भूख को भी अपनी कविता का विषय बनाया है। वह मानता है कि धरती पर भूख कभी भी रहती ही है। इसलिए वह उसे व्यवस्थित कर भूख को समाप्त करने की सोचता है। वह अपनी कविता ‘भूख व्यवस्थित हो जाती है’ में कहता है : भूख के लिए रोटी/और रोटी के लिए अन्न/अन्न होना ही चाहिए। संग्रह की शीर्षक कविता ‘एटीएम के अंदर औरत’ स्त्रियों के लिए समर्पित कविता है। इस कविता में एक घरेलू स्त्री की मनोदशा का चित्रण हुआ है। यथा ः औरत की ख्वाहिशें/होती छोटी छोटी हैं/सजने संवरने की/और वे/यूं ही सोच लेती हैं/कि उनकी जिंदगी ऐसे ही है/ऐसे ही निकलनी है बिना फुर्सत के। संग्रह की कविताओं की भाषा सहज और सरल है। कविताएं अपने शिल्प से सम्मोहित करती हैं और संप्रेषणीयता में समृद्ध हैं।

-फीचर डेस्क

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