Friday, September 24, 2021 05:01 AM

प्रकृति प्रेम ही आपदाओं से बचाव का तरीका

हिमाचल प्रदेश सरकार को जंगलों की सुरक्षा बढ़ाने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे ताकि केरल जैसी प्राकृतिक आपदा से देवभूमि को बचाया जा सके। आज प्रकृति का संरक्षण करना जरूरी  हो गया है। प्रकृति से मानवीय छेड़छाड़ घातक साबित होगी। प्रकृति से प्रेम ही मानव को प्राकृतिक आपदाओं से बचाएगा...

धर्मशाला स्थित भागसूनाग में बादल फटने की वजह से आम जनमानस को बहुत जोखिम उठाना पड़ा है। बरसात की पहली भारी बारिश के चलते नाले, खड्डें पूरे उफान पर बह रही हैं। लोगों की लापरवाही इस कदर बढ़ रही है कि वे नाले, खड्डों और पुलों से दूरी बनाए रखने की बजाय उफनते हुए जल की लहरों को अपने कैमरे में कैद कर रहे हैं। पुलों के नीचे जल रौद्र रूप धारण कर बह रहा है और लोग उन पर खड़े होकर सेल्फियां लेने में मशगूल हैं। कुल मिलाकर कहा जाए तो जनता को अपनी जान की परवाह बिल्कुल नहीं है। हिमाचल प्रदेश एक पहाड़ी राज्य है। इसलिए बरसात के मौसम में कब ऐसी कोई प्राकृतिक घटना घटित होकर सभी के लिए मुसीबत बन जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। प्रत्येक वर्ष बरसात के मौसम में जान-माल की हानि होती है, मगर कोई भी उससे सीख नहीं लेना चाहता है। इनसान ने प्रकृति से जब भी खिलवाड़ करने की कोशिश की है, उसका खामियाजा उल्टा उसे ही भुगतना पड़ा है।

 जंगलों में घटती जा रही पेड़ों की संख्या भविष्य के लिए बहुत बड़ा खतरा बनने वाली है। अगर समय रहते अब भी जंगलों की रक्षा नहीं की गई तो केरल जैसी प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए राज्यों को तैयारी अभी से करनी होगी। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड राज्य में  भूस्खलन की घटनाएं बहुत पहले से घटित हो रही हैं। नवंबर 2015 में चेन्नई में आई बाढ़ में 350 लोग मर गए और लाखों बेघर हो गए। मगर इसके बावजूद कोई सीख नहीं लेना चाहता है। वनों को काटकर प्रोजेक्ट बनाए जा रहे हैं। नदियों के पानी के तेज बहाव वाली जगहों में भवनों का निर्माण किया जाना भी तबाही का कारण माना जा सकता है। हर साल बाढ़ आती है और कई लोगों को मौत के घाट उतारकर चली जा रही है। सरकारें और जनता इस बारे जागरूक नहीं हैं। केरल में आई प्राकृतिक आपदा भी भूस्खलन के कारण कई लोगों को मौत का ग्रास बनाकर  चली गई थी। बरसात  में अक्सर भारी बरिश होती है, मगर इस बार तेज बारिश और बाढ़ के पानी का प्रवाह केरल राज्य में इस तरह की भयावह त्रासदी लेकर आएगा जिसकी वजह से लाखों लोगों को बेघर होना पड़ेगा, किसी ने सोचा नहीं था। केरल में 41  छोटी और बड़ी नदियां हैं, जबकि 81 बांध बनाए गए थे। वर्तमान में नदियां जहां पूरे उफान में बह रही हैं, वहीं बांधों का ओवरफ्लो पानी छोड़ने से इस त्रासदी को और भी ज्यादा बढ़ावा मिला था। इस प्राकृतिक प्रकोप में लाखों लोगों समेत पर्यटक भी फंसकर रह गए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद हेलिकाप्टर से केरल के बाढ़ग्रस्त इलाकों का दौरा करके एनडीआरएफ  और स्वास्थ्य कर्मियों की टीमें वहां तैनात कर दी थीं। सेनाओं के जवान अपनी जान जोखिम में डालकर  केरल के लाखों लोगों के जान-माल की रक्षा करने में दिन-रात अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

 भारत सरकार की ओर से आर्थिक रूप से भी केरल को मदद भेजी गई। प्राकृतिक आपदा में खाड़ी देश भी केरल की हर मदद के लिए आगे आए। विश्व के दूसरे देश भी केरल की मदद करने के लिए आगे आ सकते हैं, इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है। केरल के लोग बिज़नेस करने के मामले में सबसे आगे हैं, यही वजह है कि इनका कारोबार भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैला हुआ है। ऐसे व्यवसायी भी केरल की हर मदद करने को आगे आए थे। कल तक महलों जैसे घरों में रहने वालों को अब खुले आसमान में भटकने के लिए मजबूर होना पड़ा था। हालात ऐसे बने कि लोगों को सोने के लिए सही स्थान तक नहीं मिला। लोगों की आंखों के सामने ही उनके बेशकीमती मकान धराशायी होकर बाढ़ अपने साथ बहाकर ले जाने से उनके सपने बिखर कर रह गए हैं। वहीं खाने-पीने की चीजों के लिए दूसरों का मोहताज़ होना पड़ रहा था। सड़क, बिजली, पानी, खानपान की चीजें, स्वास्थ्य सुविधाएं और यातायात के साधन उपलब्ध होना केरल के लोगों की अब प्रमुख जरूरत है। यह प्राकृतिक आपदा करीब साढ़े तीन सौ लोगों की जिंदगियां लील चुकी थी। केरल में पावर प्रोजेक्ट इतने ज्यादा बनाए गए हैं जिनके डैमों का पानी ओवरफ्लो बनकर बाढ़ का रूप धारण करके लोगों के मकानों, खेत-खलिहानों, पुलों और सड़कों, वाहनों और लोगों तक को अपने साथ बहाकर ले गया है। केंद्र और राज्य सरकारें केरल की आर्थिक मदद के लिए आगे आई थीं। भारत के सभी राज्यों में केरल प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण राज्यों में से एक है। केरल हर क्षेत्र में सबसे अग्रणी राज्य रहा है। शिक्षा, कृषि, बेहतर पुलिस और आयुर्वेदिक दवाइयों का उत्पादन करने के मामलों में हमेशा अव्वल दर्जे का रहा है। केरल कृषि प्रधान राज्य है जो विदेशों में भी फल, सब्जियां और अनाज भेजता रहा है।

 यह प्रकोप ऐसा बरपा कि अब खुद उन्हें ही दाने-दाने के लिए मोहताज़ होना पड़ रहा है। बाढ़ के पानी ने खेतों की फसलों तक को तबाह करके रख दिया है। सड़कें टूटकर नदियों का रूप धारण कर चुकी हैं। केरल में यह कोई दैवीय प्रकोप बरपा, इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है। आज इस जल प्रलय आने के कारणों को जान कर सचेत होना होगा ताकि भविष्य में ऐसी त्रासदी की पुनरावृत्ति न हो। प्राकृतिक आपदा के कारण चाहे कुछ भी रहे हों, मगर आज मुसीबत की घड़ी में केरल का साथ सबको मिलकर देकर मानवता की पहचान करवानी होगी। हिमाचल प्रदेश में भी यह कहर बरपा, मगर जान-माल की इतनी तबाही नहीं हुई है। सड़कों की तबाही के कारण प्रदेश सरकार पर करोड़ों रुपयों का अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ गया है। हिमाचल प्रदेश में भी रिकार्डतोड़ बारिश होने से दो दर्जन से ज्यादा लोग इस आपदा के कारण मारे गए हैं। हिमाचल प्रदेश सरकार को जंगलों की सुरक्षा बढ़ाने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे ताकि केरल जैसी प्राकृतिक आपदा से देवभूमि को बचाया जा सके। आज प्रकृति का संरक्षण करना जरूरी  हो गया है। प्रकृति से मानवीय छेड़छाड़ घातक साबित होगी। प्रकृति से प्रेम ही मानव को प्राकृतिक आपदाओं से बचाएगा। हम जितना जल्दी प्रकृति का संरक्षण करना सीख लेंगे, उतना जल्दी ही मानव प्राकृतिक आपदाओं से मुक्त हो जाएगा।

सुखदेव सिंह

लेखक नूरपुर से हैं