Friday, September 25, 2020 03:21 AM

माता कोटे वाली मंदिर

राजा का तालाब कस्बे से चार किलोमीटर की दूरी पर स्थित प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण पहाडि़यों पर माता कोटे वाली का भव्य मंदिर विराजमान है। माता कोटे वाली मंदिर के प्रति लोगों की विशेष आस्था होने की वजह से माता के भक्त वर्ष भर दर्शन के लिए आते हैं। स्कूली छात्र परीक्षाओं के समय माता से मन्नत मांगते हैं कि वह उत्तीर्ण होने पर माता के दरबार में हाजरी लगाने जरूर आएंगे। नव विवाहित जोड़े भी अपनी जिंदगी की नई शुरुआत करने से पहले माता कोटे वाली मंदिर में माथा टेकना कभी नहीं भूलते हैं। अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति पर मीठा प्रसाद चढ़ाकर माता से अपने भविष्य की मंगल कामना करते हैं। श्रद्धालुओं की आमद मंदिर में सदैव चली ही रहती है, जिसकी वजह से इस मंदिर के प्रति लोगों का अटूट विश्वास है।

मंदिर में विशेषकर चार हल्कों के लोग अपनी हाजिरी लगाने अत्यधिक आते हैं। किसी भी व्यक्ति की जब कोई मनोकामना पूरी होती है, तो लोग बैंड, बाजों साथ मंदिर तक पहुंचते हैं। माता कोटे वाली मंदिर में कोई भी व्यक्ति रात को ठहर नहीं सकता है। अष्टभुजा माता रात को साक्षात प्रकट होकर यहां विभिन्न लीलाएं करती हैं। अगर गलती से रात को मंदिर में ठहरने की कोई कोशिश करता, तो सुबह तक वह जीवित नहीं रहता ऐसी भी मान्यता है। 12वीं शताब्दी में दिल्ली के शासक आनंदपाल तोमर ने दिल्ली का सिंहासन अपने दोहते पृथ्वीराज राज चौहान को सौंपा। आनंद पाल तोमर के सगे संबंधियों ने दिल्ली में आखिर विद्रोह का बिगुल बजा दिया। इस विद्रोह का लाभ उठाते हुए राजस्थान कोटा और बूंदी में पृथ्वीराज राज चौहान के संबंधियों ने भी उसके खिलाफ  विद्रोह की आवाज मुखर कर डाली थी। पृथ्वीराज राज चौहान ने अपने सगे संबंधियों के विद्रोह को कुचलकर अपनी वीरता का लोहा मनवाया था। विद्रोही पृथ्वीराज राज चौहान से अपनी जान बचाने के लिए उत्तर के घने जंगलों की तरफ भागना शुरू हो गए।

भागते समय यह लोग अपने साथ अपनी कुल देवी को भी ले आए तथा कोटे वाले जंगल में स्थापित कर दिया। कोटे वाली माता के नाम से मंदिर आज नूरपुर ही नहीं अपितु हिमाचल से सटे पंजाब और जम्मू- कश्मीर में भी प्रसिद्ध है। मां कोटे वाली हर असंभव कार्य को संभव बनाकर श्रद्धालुओं के दिलों में अपनी विशेष आस्था रखती है। यहां इस संबध में एक चमत्कारी घटना का उल्लेख किया जाना अति आवश्यक बन जाता है।

एक सदी पूर्व निकटवर्ती गांव की एक नन्हीं बच्ची यकायक गायब हो गई। हर जगह ढूढ़ने पर भी उसका कहीं कोई पता नहीं चला। बहुत ढूढ़ने के बाद बच्ची के माता-पिता को ध्यान आया कि कोटे वाली माता से उन्होंने संतान प्राप्ति के लिए मन्नत मांगी थी, पर उसे पूरा करना वह भूल गए थे। माता की मन्नत चढ़ाने और क्षमा मांगने के तीन दिन बाद बच्ची सुरक्षित अविभावकों को मिल गई। पूछने पर बच्ची ने बताया कि वह दादी मां के पास रहती थी और वह उसे हलवा, पूरी खिलाया करती थी। इस अपूर्व घटना को सुनकर बच्ची के परिजन और गांववासी हतप्रभ रह गए। ऐसी अनेक अलौकिक और चामत्कारिक घटनाएं कोटे वाली माता के साथ जुड़ी हुई हैं।

मंदिर 300 सीढि़या चढ़कर अत्यंत रमणीक एव आकर्षक पहाडि़यों पर स्थित है। यहां 25 दुकानें और कई अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां सुसज्जित हैं। श्रद्धालुओं के लिए प्रसाद, चायपान और विश्राम करने की पूरी व्यवस्था मंदिर कमेटी की और से की गई है। वर्ष भर मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता मंदिर में लगा रहता, परंतु नवरात्रों दौरान यह भीड़ कई गुणा बढ़ जाती है। इस दौरान राजा का तालाब बाजार की कमेटी मंदिर कमेटी के सहयोग से यहां भंडारे का आयोजन करके मानवता की सेवा करती आ रही है। माता कोटे वाली मंदिर की देखरेख 1971 से गुरियाल गांव की एक कमेटी कर रही है। कमेटी की ओर से मंदिर का भव्य निर्माण करवाकर श्रद्धालुओं को हर सुविधा पहुंचाई जाती है। गुरियाल गांव से मंदिर तक लगभग दो किलोमीटर का दुर्गम पहाड़ी रास्ता है। राजा का तालाब डक रोड पर माता कोटे वाली मंदिर के नाम से एक भव्य द्वार बनाया गया है। इस चौक से माता के भक्त चार पहिया वाहनों से सवार होकर माता के चरणों तक पहुंचते हैं।

इस बीच लॉकडॉउन से पूर्व सड़क निर्माण का कार्य शुरू किया गया था ताकि यात्रियों को कोई समस्या का सामना न करना पड़े। मंदिर के प्रति लोगों की विशेष आस्था को देखते हुए और गुरियाल, तलाड़ा, डक और दाहव गांवों के लोगों की सुविधा के लिए अब हिमाचल पथ परिवहन निगम की बस चलाने को प्रदेश सरकार को तरजीह देनी चाहिए। इन गांवों के लोग मीलों चलकर स्थानीय बाजार में खरीददारी के लिए पहुंचते हैं।    – सुखदेव सिंह, नूरपुर

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