Tuesday, December 07, 2021 06:19 AM

मेेडिकल कालेज में उन्माद

नाहन के मेडिकल कालेज में छात्र सियासत का संघर्ष जो भी बटोरता रहा हो, लेकिन इस उन्माद ने साबित कर दिया कि कल के डाक्टरों के हाथ में कितना संयम या विवेक हो सकता है। आश्चर्य यह कि शैक्षणिक गुणवत्ता की कंगाली के बीच हिमाचल का प्रोफेशनल्जिम केवल छात्र राजनीति का उत्पाद ही बन रहा है। नाहन कालेज के चबूतरे पर खड़े एबीवीपी और एसएफआई जैसे छात्र संगठन अगर अपनी सक्रियता का डंका बजाने के लिए किसी पोस्टर या बैनर पर युद्धरत होंगे, तो पढ़ाई का आलम क्या होगा। इससे भी बड़ा प्रश्न यह कि रेवडि़यों की तरह बंटते रहे शैक्षणिक संस्थानों को अब छात्र राजनीति का खाद-पानी इतना रास आने लगा कि आपसी भिड़ंत में कोई न कोई सरगना तो साबित होगा ही। दरअसल शिक्षा में मात्रात्मक उत्थान करते हुए हिमाचल ने यह नहीं सोचा कि छात्र को प्रोफेशनल बनाने के लिए किस तरह का माहौल चाहिए। अगर मेडिकल कालेज केवल सत्ता या सियासत की आपूर्ति में केवल उपलब्धि भर होंगे, तो पढ़ाई के बजाय इनके चश्मदीद गवाह तो विभिन्न छात्र संगठन ही होंगे। जो लड़ मरे, वे कल के डाक्टर होंगे या सरकारी नौकरी के लिए छात्र सियासत की चक्की चलानी ही पड़ेगी। एक हद तक शिक्षण संस्थान और नौकरी के इम्तिहान में छात्र राजनीति हद से ज्यादा घर कर गई है।

 यह हिमाचल की सरकारी कार्यसंस्कृति में भी अंगीकार हो रहा है कि अपनों की हिफाजत में किस तरह अप्रत्यक्ष नियुक्तियों का भंडार सजाया जाता है और सारा कर्मचारी-अधिकारी कॉडर ही विभक्त मानसिकता में राजनीतिक उच्चारण बन चुका है। हर चुनाव से पहले सार्वजनिक क्षेत्र की महत्त्वाकांक्षा में पल रही सियासत चेहरे पेश कर देती है, तो इस प्रक्रिया की सीढि़यां जाहिर तौर पर नाहन मेडिकल कालेज के स्तर तक पहुंचेंगी। आश्चर्य यह भी कि कालेजों के परिसरों में अलग-अलग तरह के अखाड़े बनाए जाते हैं और तमाम गतिविधियों की प्रस्तुति में अहम रिश्ते राजनीति से जुड़ जाते हैं। किसी मेडिकल कालेज में सम्मेलन, सेमिनार या संवाद विशेष का आयोजन तब तक ईमानदार होगा, जब तक विषयों का संबंध चिकित्सा की पढ़ाई से जुड़ेगा, लेकिन अकसर ऐसा नहीं होता। कालेजों की पौध में समर्थक पैदा करने की होड़ ने, राजनीति के पालने वहां भी स्थापित कर दिए हैं। इससे प्रोफेशनल कालेजों का स्तर निरंतर नीचे ही गिरेगा। दूसरी ओर जरूरत से कहीं अधिक मेडिकल कालेज खोलने से छात्र तो मिल रहे हैं, लेकिन भविष्य के डाक्टर नहीं मिलेंगे। प्रदेश में सरकारी, गैरसरकारी, एम्स, पीजीआई सेटेलाइट सेंटर मेडिकल यूनिवर्सिटी को जोड़कर देखंे तो अगले कुछ सालों में कम से कम आठ सौ डाक्टर हर साल निकलेंगे। पढ़ाई की दृष्टि से यह एक बड़ा कारनामा हो सकता है, लेकिन चिकित्सा के उत्कृष्ट ज्ञान के लिए यह इंतजाम भी संदेह दूर नहीं कर पा रहा है।

 जिस तरह प्रदेश में इंजीनियरिंग कालेज, बिजनेस स्कूल तथा निजी विश्वविद्यालय अब केवल डिग्री प्रदान करने के संस्थान बन गए हैं, उसी तरह कल मेडिकल डिग्री तो होगी, लेकिन उसके ऊपर भरोसा नहीं होगा। किसी मेडिकल कालेज में उत्पात की खबरें अमन काचरू प्रकरण की याद को पुख्ता कर देती हैं। करीब बारह साल गुजर गए जब टांडा मेडिकल कालेज की दीवारें रैगिंग में हुई मौत से अभिशप्त हुई थीं, लेकिन इससे सीखा क्या। अमन काचरू ट्रस्ट के जरिए कुछ काम हुआ, लेकिन अनुशासित तहजीब विकसित करने के लिए विभागीय कक्ष और दुरुस्त करने होंगे। सभी मेडिकल कालेजों में अमन काचरू ट्रस्ट अपनी जिम्मेदारी निभा सकता है, लेकिन शिक्षा के वातावरण को उम्दा बनाने के लिए उत्तम फैकल्टी, परिसर का आचरण और प्रोफेशनल एथिक्स सुदृढ़ करने होंगे। चिकित्सा की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए कई अहम पहलू हैं, लेकिन जब डाक्टरी की पढ़ाई ही आवारा हो जाए तो कौन इस खेप पर विश्वास करेगा। डाक्टर बनने की वजह अहम होनी चाहिए। दुर्भाग्यवश हिमाचल में उपाधियां धारण करने की वजह गौण है। यहां से निकल रहे एमबीए अगर घास खोद रहे हैं, तो सोचना यह होगा कि ऐसे पाठ्यक्रम का करेंगे क्या। हिमाचल में हद से ज्यादा इंजीनियर तो निकल रहे, लेकिन काबिलीयत की गुणवत्ता साबित नहीं हो रही। शैक्षणिक माहौल को बचाने के लिए उपाय नहीं किए गए, तो हर शिक्षा परिसर में राजनीतिक कारण बढ़ जाएंगे। यही सब नाहन मेडिकल कालेज में हुआ और अगर परिसर में ऐसा हुजूम बढ़ता गया, तो गिरेगा तो संस्थान ही। कभी हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय का शैक्षणिक स्तर बताता था कि वहां के शिक्षार्थी कितनी क्षमता रखते हैं, लेकिन बुरी संगत में फंस कर यह परिसर भी नाकाम हो गया। नाहन की घटना अभी एक लक्षण बता रही है, लेकिन कल अगर यह बीमारी में बदल गई तो बीमार मेडिकल कालेज से निकले डाक्टरों पर छींटाकशी के साथ-साथ अविश्वास भी पनप जाएगा।