Friday, September 25, 2020 03:41 AM

मैं तो साइंटिस्ट कभी नहीं बनूंगा

विश्व भ्रमण

गतांक से आगे…

आगे बढ़ने से पहले मैं यहां उनके रहन-सहन के बारे में भी बता दूं। डा. ब्लाजेक एक वरिष्ठ वैज्ञानिक थे और मेरे अंदाज से उनका स्टेटस हमारे यहां के यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर के बराबर होना चाहिए था। उनके दो या तीन बेटे थे। सबसे बड़ा बेटा, डेलीबर, 15-16 साल का था। वह थोड़ी इंग्लिश बोल लेता था। वही मुझे खाने के लिए बुलाने भी आया करता था और थोड़ी बात भी कर लेता था। डा. ब्लाजेक का घर अलग था और शायद उनका अपना था। उनके पास अपनी कार नहीं थी। वे साइकिल पर आते-जाते थे। उनका घर वैसे तो ठीक था, पर उनके पास टेलीफोन नहीं था। लगता था कि टेलीफोन उनकी ड्रीम पोजेशन होगी, क्योंकि उन्होंने घर में टेलीफोन रखने का स्थान बनवाया हुआ था, जो तब तक खाली था। उनके पास टेलीविजन नहीं था और कोई म्यूजिक सिस्टम भी नहीं था, हां एक छोटा सा टेसला कंपनी का रेडियो जरूर था।

मेरा यह सब यहां बताने का तात्पर्य यह है कि उस देश के प्रोफेसरों का लिविंग स्टेंडर्ड भारतीय प्रोफेसरों के मुकाबले बहुत ही कम था। असल में वहां का सिस्टम ही कुछ अलग था। वहां वैज्ञानिकों या दूसरे डेस्क वर्क वाले कामों को शारीरिक श्रम करने वाले लोगों से वहां कम मेहनत का काम समझा जाता था और इसलिए इस वर्ग के लोगों की तनख्वाहें भी कम थीं।

मैंने एक दिन बातों-बातों में डेलीबर से पूछा कि क्या वह भी अपने माता-पिता की तरह खूब पढ़ लिख कर वैज्ञानिक बनना चाहेगा। मैं उसका उत्तर सुन कर हैरान रह गया। उसने कहा बिलकुल नहीं, मैं बुलडोजर ड्राइवर बनूंगा क्योंकि बुलडोजर ड्राइवर बनने के लिए पीएचडी तक पढ़ाई नहीं करनी पड़ती। जैसे ही आप 18 साल के हो जाते हैं, केवल छह महीने की ट्रेनिंग के करने पर आपको बुलडोजर चलाने का लाइसेंस मिल जाता है और उच्च डिग्री धारी वैज्ञानिकों से ज्यादा पगार पाते हैं। फिर साल भर में शादी कर के मौज की जिंदगी गुजार सकते हैं।

साइंटिस्ट बनाने के लिए आठ साल पढ़ाई करो और फिर पैसा भी कम। मैंने ब्लाजेक दंपति की ओर देखा। वे कहने लगे कि हमारे इस सामाजवादी सिस्टम में ऐसा ही है। भारी शारीरक काम करने वालों को ज्यादा पैसा मिलता है। उन्होंने फिर यह भी बताया कि रूस समेत सारे समाजवादी देशों में लगभग यही सिस्टम है। इसलिए अब अगली पीढ़ी के युवकों की उच्च शिक्षा में दिलचस्पी समाप्त होती जा रही है।

शायद यहीं कारण हुआ के ये देश साइंस और टेक्नोलॉजी में अन्य देशों से बहुत पिछड़ गए। अंतरिक्ष में रूसी स्पूतनिक पहले पहुंचे थे, पर बाद में अमरीका आगे निकल गया। क्योंकि रूस या रूस जैसे अन्य देशों के वरिष्ठ वैज्ञानिक या तो रिटायर हो गए या फिर दूसरे देशों में चले गए।

वहां के बच्चों ने वह करियर चुना, जिसमें ज्यादा पगार मिलती थी। परिणाम स्वरूप आज वहां उन क्षेत्रों में आदमी नहीं है, जहां उच्च शिक्षा की आवश्यकता होती है।

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