मैं तो साइंटिस्ट कभी नहीं बनूंगा

विश्व भ्रमण

– डा. चिरंजीत परमार,

 186/3 जेल रोड, मंडी

1987 में मुझे चेकोस्लोवाकिया जाने का अवसर मिला। तब यह एक समाजवादी या साम्यवादी (मुझे दोनों वादों में अंतर मालूम नहीं) देश हुआ करता था और इसका विभाजन भी नहीं हुआ था। वहां के एक शहर हृडेश क्रैलोव में, यूरोपियन एसोसियेशन फॉर रिसर्च ऑन प्लांट ब्रीडिंग के फ्रूट ब्रीडिंग ग्रुप की मीटिंग थी। वैसे तो यूरोपियनो की संस्था है, पर इस मीटिंग में 4-5 वैज्ञानिक यूरोप से बाहर से भी भाग ले रहे थे, जिनमें एक मैं भी था। मैंने इस मीटिंग में सिरमौर में पाए जाने वाले जंगली आड़ू कतेडू, जो नवंबर में पकता है, पर अपना शोधपत्र पढ़ा और लोगों को इस अपनी तरह के एकमात्र आड़ू के बारे में बताया था।

मीटिंग के स्थानीय आयोजक डा. जान ब्लाजेक थे, जो एक विश्वविख्यात एपल ब्रीडर हैं। ये चेकोस्लोवाकिया के विश्व प्रसिद्ध सेंटर फॉर फ्रूट ब्रीडिंग में कार्यरत थे। यह सेंटर हृडेश क्रैलोव से कोई 15-20 किलोमीटर पर एक गांव होलोवाउसी में स्थित है। हृडेश क्रैलोव लगभग एक लाख आबादी का शहर है और अब चेक रिपब्लिक में है। हमारी मीटिंग हृडेश क्रैलोव के एक होटल में थी। सभी आमंत्रित वैज्ञानिक उसी होटल में रुके थे। केवल मुझे ही होलोवाउसी रिसर्च सेंटर के गेस्ट हाउस में ठहराया गया था।

मीटिंग में बहुत से नए लोगों से परिचय हुआ। असल में इसी मीटिंग से मुझे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिमालयी वण्य फलों के विशेषज्ञ के रूप में पहचान मिली। इस मीटिंग में एक वरिष्ठ ब्रिटिश फल वैज्ञानिक डा. रे वाटकिन भी आए हुए थे और वे ही मीटिंग की अध्यक्षता कर रहे थे। डा. वाटकिन हिमाचल से परिचित थे, क्योंकि कभी इनको हिमाचल सरकार ने प्रदेश में हॉर्टिकल्चर के विकास के लिए परामर्शदाता के तौर पर बुलाया था। कहा जाता है कि हिमाचल में अलग हॉर्टिकल्चर यूनिवर्सिटी की स्थापना करने का सुझाव भी इन्हीं की ओर से आया था।

डा. वाटकिन को जब पता लगा कि कोई हिमाचल प्रदेश से भी आया है, तो वे बहुत प्रसन्न हुए विशेष कर इस बात को जान कर कि हिमाचल में हॉर्टिकल्चर यूनिवर्सिटी की स्थापना हो चुकी है। उन्होंने मेरा विशेष पोस्ट डिनर लेक्चर रखवाया, जिसमें मैंने मध्य हिमालय में पाए जाने वाले जंगली फलों के उपयोग और उनकी व्यावसायिक बागबानी की संभावनाओं के बारे में बताया। मेरा यह लेक्चर सबने बहुत दिलचस्पी से सुना क्योंकि इन फलों के बारे में वे लोग पहली बार जान रहे थे। यहीं से मुझे जंगली फलों के विशेषज्ञ के रूप में भारत से बाहर पहचान मिलनी शुरू हुई थी।

मैं मीटिंग के बाद भी कुछ दिन होलोवाउसी में रुका रहा। मैं रिसर्च सेंटर के गेस्ट हाउस में रहता था। दिन का भोजन सेंटर के मैस में होता था। यह भोजन सेंटर में काम करने वाले सभी वर्गों के कार्यकर्ताओं के लिए होता था। रात का खाना मैं डा. ब्लाजेक के घर में उनके परिवार के साथ खाया करता था। खाने के समय हम इधर उधर की बातें भी किया करते थे। दो तीन दिन में मैं उनके परिवार में घुलमिल गया था।

— क्रमशः 

The post मैं तो साइंटिस्ट कभी नहीं बनूंगा appeared first on Himachal news - Hindi news - latest Himachal news.