Thursday, September 24, 2020 02:34 PM

मनुष्य का शरीर

बाबा हरदेव

स्थूल शरीर- मनुष्य के शरीर में तीन शरीरों का समाहार माना गया है। इनमें एक शरीर तो वह है जो हमें दिखाई दे रहा है। यह ऊपर का वस्त्र है, पौदगालिक है, अतः यह स्थूल शरीर कहलाता है। यह वजन रखता है, इसलिए इसका बोध आसानी से हो जाता है और इसके लिए किसी ध्यान या कला की जरूरत नहीं। मनुष्य को स्थूल शरीर मिलता है माता-पिता से और यह पांच तत्त्वों से (धरती, जल, अग्नि, वायु और आकाश) से मिलकर बनता है और इन तत्त्वों का मनुष्य के शरीर में अपना -अपना उपयोग और महत्त्व है। अतः इनमें से प्रत्येक तत्त्व अपनी एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। भूख, प्यास, बीमारी, सेहत, सर्दी-गर्मी का एहसास ये सब स्थूल शरीर का गुण धर्म है। यह सब स्थूल शरीर की तरंगे हैं। मनुष्य का स्थूल शरीर बर्फ की भांति जमा अथवा जड़ है। इस शरीर के पास अपनी कार्यक्षमता है तथा इसकी अपनी कुछ सीमाएं हैं और यह शरीर अपने  निर्धारित समय तक चलता है फिर समाप्त हो जाता है। यह जन्म के साथ शुरू होता है और फिर मृत्यु के साथ समाप्त हो जाता है। इस स्थूल शरीर में बाल्यवस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था है। स्थूल शरीर हर क्षण परिवर्तनशील है। यह इंद्रियों का विषय है।

सूक्ष्म शरीर- अब बाकी के दो शरीरों में से एक शरीर है जो भीतर पहने हुए वस्त्र के समान है, अध्यात्म में इसे सूक्ष्म शरीर के नाम से संबोधित किया जाता है। यह सूक्ष्म शरीर विद्युत कणों से निर्मित होता है और जीव के साथ-साथ जन्मों-जन्मों तक विचरण करता रहता है और स्थूल शरीर को भी इस शरीर के साथ-साथ यात्रा करनी पड़ती है। मानो यह एक प्रकार का सूक्ष्म यंत्र है और यह सूक्ष्म शरीर रूपी यंत्र जिन चीजों से बना है वह हैं हमारी इच्छाएं, वासनाएं, कामनाएं, अकांक्षाएं, अपेक्षाएं और हमारे किए गए कर्म, हमारे द्वारा न किए गए कर्म, चाहे-अनचाहे कर्म, हमारे विचार, हम जो भी कर रहे हैं, हमने जो सोचा है, विचारा है, अनुभव किया है और जो भावना रखी है, इस प्रकार हमारे सभी प्रकार के मिलेजुले प्रभावों से निर्मित हमारा सूक्ष्म शरीर है।

अतः तत्त्वदर्शी महात्माओं ने अनुसंधान द्वारा इस रहस्य को भली प्रकार से अनुभव किया है कि यह सूक्ष्म शरीर गर्भ में प्रवेश कर सकता है और इस सूक्ष्म शरीर का प्रवेश वैसे ही स्वचालित है जैसे पानी पहाड़ से उतरता है और फिर नदियों में चला जाता है। जैसे पानी का नीचे की ओर बहना प्राकृतिक क्रिया है ऐसे ही सूक्ष्म शरीर का अपने योग्य और अनुकूल स्थूल शरीर में प्रवाहित होना एकदम प्राकृतिक घटना है। उदाहरण के तौर पर जैसे एक ट्राम होती है, जिसके ऊपर एक विद्युत तार होता है और उस तार से ट्राम में लगे यंत्र को विद्युत मिलती है और उस विद्युत से ट्राम चलती है। परंतु ट्राम  के साथ-साथ विद्युत यात्रा नहीं करती, क्योंकि जहां भी ट्राम जाती है उसे ऊपर के तार से विद्युत मिलती रहती है और ट्राम दौड़ती रहती है।

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