Tuesday, December 07, 2021 06:09 AM

मुद्दों के प्रयोग की मंडी

हिमाचल के उपचुनावों की सतह मंडी संसदीय क्षेत्र में तय होगी, तो बार-बार सियासी शब्द अपना शृंगार कर रहे हैं। विरासत के मूल्यों पर भूचाल की स्थिति पैदा करके भाजपा ने वीरभद्र सिंह के परिवार को सुरक्षात्मक तौर तरीकों तक पहुंचा दिया है, तो यहां चुनावी शैली का घमासान नए प्रयोग कर रहा है। भाजपा यह बताने में कामयाब रही कि न तो कारगिल युद्ध का योद्धा छोटा पड़ रहा है और न ही चुनावी जंग में उनके उम्मीदवार को छोटा आंका जा सकता है। यहां मुकाबला भले ही कांग्रेस की पिच पर नहीं है, फिर भी पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की विरासत पर प्रतिभा सिंह और विक्रमादित्य सिंह की आक्रामकता पर स्वयं मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने मोर्चा जमा लिया है। यह चुनाव उनकी व्यक्तिगत राजनीतिक उपलब्धि का सबसे बड़ा गणित और पार्टी के भीतर अजेय होने का सबूत बन सकता है। यह वह भी जानते हैं कि वर्तमान उपचुनावों का सबसे बड़ा कुरुक्षेत्र उनका कुशलक्षेम पूछ रहा है। पार्टी में अपनी स्थिति सुदृढ़ करने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के लिए भी सबसे बड़ी परीक्षा वीरभद्र सिंह के ही मायाजाल से हुई थी। तब सामंतवाद का प्रश्न उठाकर धूमल ने वीरभद्र सिंह की परिपाटी से ‘राजा’ छीन लिया था। वीरभद्र सिंह के सियासी इतिहास के साथ धूमल ने अपनी राजनीतिक हिस्ट्री खड़ी की, तो यह जन नायक बनने के क्रम में निचले क्षेत्रों का आगाज था जिसे पूर्व मुख्यमंत्री ने हासिल किया।

लोकसभा चुनावों में धूमल की शक्ति को परखते हुए जब भाजपा ने उन्हें पुनः खड़ा किया, तो वह तत्कालीन बमसन विधानसभा क्षेत्र से पच्चीस हजार की लीड लेकर आगे बढ़े थे। इससे पहले ऐसा करिश्मा केवल वीरभद्र बार-बार करते थे और यह जलवा ऊपरी शिमला उनके नाम कर देता था। ऐसे में क्या स्वर्गीय वीरभद्र सिंह के प्रति जनता की राजनीतिक श्रद्धांजलि मंडी उपचुनाव में फिर से लिखी जाएगी या मंडी जिला उपचुनाव की इबारत में जयराम ठाकुर को जननायक बनाने का सबसे बड़ा दांव खेलते हुए एकतरफा बढ़त बना देगा। मंडी संसदीय क्षेत्र का उपचुनाव जितना मंडी का है, उतना ही शिमला व अन्य क्षेत्रों का भी है, लेकिन इसके हुलिए में जनता की परंपराएं और क्षेत्रीय सम्मान की पैरवी रहेगी। पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की मौत का मातम आज भी शिमला की विरासत का खालीपन देख रहा है, तो कांग्रेस की आशाएं गांठ बांधकर यह कयास लगा रही हैं कि उपचुनाव के बहाने जनता वीरभद्र सिंह के ही परिवार को आजमाना चाहेगी। राजनीति में इस तरह का हस्तांतरण कोई न कोई वजह ढूंढता है और उपचुनाव के दौरान यही मूल्यांकन होगा कि कौन और कितने लोग प्रतिभा सिंह और विक्रमादित्य के पीछे चलना चाहते हैं। क्या यह कमोबेश वैसी ही लड़ाई है, जो वीरभद्र के राजनीतिक-काल में चलती थी या यहां जनता के भरोसे पर भी उतरना होगा। उस समय कोई अन्य मुख्यमंत्री मंडी संसदीय क्षेत्र को अलंकृत नहीं कर पाया था, लेकिन अब जयराम की कटोरी में घी कहीं अधिक दिखाई देता है। वीरभद्र सिंह की करामात ही थी कि पंडित सुखराम अपनी भूमिका में मंडी का कंेद्र विकसित नहीं कर पाए। हालांकि हिमाचल विकास कांग्रेस का उदय व इसकी सफलता का दायरा मंडी की महत्त्वाकांक्षा व जनापेक्षाओं का सियासी गणित पैदा कर पाया था, लेकिन बाद में निजी मिलकीयत बनाते-बनाते पंडित परिवार का तंबू उखड़ गया। आज पंडित परिवार अगर अप्रासंगिक दिखाई दे रहा है, तो यह मुख्यमंत्री के राजनीतिक कौशल से ही जुड़ेगा। हिमाचल में प्रायः चुनाव अपने अंडर करंट की व्याख्या करते रहे हैं, लेकिन राज्य की सत्ता के सामने ये कैसे खड़े होते हैं, इसके ऊपर किंतु-परंतु हैं। उपचुनाव अपनी हर वजह, सत्ता के अनुमानों और सरकार के कारनामों की वजह से उत्साही दिखाई देते हैं। विकास का एक मॉडल मंडी संसदीय क्षेत्र के भीतर मंडी, कुल्लू, चंबा, किन्नौर, लाहुल-स्पीति और शिमला जिला की समीक्षा करेगा। जाहिर है कुछ उपलब्धियां रही होंगी या विकास की अंगुली पकड़ कर बजट चला होगा, लेकिन यह जांच परख भी होगी कि सरकार का संतुलन, मुख्यमंत्री की अभिलाषा के अनुरूप रहा या सत्ता की चाबी केवल मंडी के ही ताले खोलती रही। विकास बनाम विकास अगर वीरभद्र सिंह को नजरअंदाज नहीं कर पाया, तो इसके अलग मायने होंगे, लेकिन अगर जयराम यह साबित कर पाए कि वह ही मंडी के वास्तविक शिल्पकार हैं, तो चुनावी महा आयोजन उन्हें जननायक होने के सारे सबूत सौंप देगा।