Tuesday, December 07, 2021 06:18 AM

माता गढ़कालिका मंदिर

दक्षिण भारतीय परंपरा में यह मंदिर शक्तिपीठ या देवी पीठ माना गया है। गर्भगृह में माता कालिका की मूर्ति मुखाकृति के रूप में विराजित है। ऐसे भयानक रूप वाली आदि माता हंसती हुई दिखाई देती है। गढ़कालिका की मूर्ति के आसपास माता महालक्ष्मी व माता सरस्वती भी विराजित हैं...

मध्यप्रदेश के उज्जैन के कालीघाट स्थित कालिका माता के प्राचीन मंदिर को गढ़कालिका के नाम से जाना जाता है। देवियों में कालिका को सबसे महत्त्वपूर्ण माना गया है। गढ़कालिका के मंदिर में मां कालिका के दर्शन के लिए रोज हजारों भक्तों की भीड़ जुटती है। तांत्रिकों की देवी कालिका के इस चामत्कारिक मंदिर की प्राचीनता के विषय में कोई नहीं जानता, फिर भी माना जाता है कि इसकी स्थापना महाभारतकाल में हुई थी, लेकिन मूर्ति सतयुग काल की है। बाद में इस प्राचीन मंदिर का जीर्णोद्धार सम्राट हर्षवर्धन द्वारा किए जाने का उल्लेख मिलता है। स्टेटकाल में ग्वालियर के महाराजा ने इसका पुनर्निर्माण कराया। कालिकाजी के इस स्थान पर गोपाल मंदिर से सीधे यहां जाया जा सकता है। गढ़ नामक स्थान पर होने के कारण मंदिर का नाम गढ़कालिका हो गया है। मंदिर के प्रवेश द्वार के आगे ही सिंह वाहन की प्रतिमा बनी हुई है। आसपास दो तरफ  धर्मशालाएं हैं। इसके बीच में देवीजी का मंदिर है।

मंदिर के कुछ अंश का जीर्णोद्धार ई. 606 के लगभग सम्राट श्रीहर्ष ने करवाया था।  दक्षिण भारतीय परंपरा में यह मंदिर शक्तिपीठ या देवी पीठ माना गया है। गर्भगृह में माता कालिका की मूर्ति मुखाकृति के रूप में विराजित है। ऐसे भयानक रूप वाली आदि माता हंसती हुई दिखाई देती है। गढ़कालिका की मूर्ति के आसपास माता महालक्ष्मी व माता सरस्वती भी विराजित हैं। मान्यता है इन्हीं के आशीर्वाद से कालिदास महाकवि हुए थे। गढ़कालिका मंदिर शहर के प्रमुख प्राचीन देवी मंदिरों में से एक है। इन्हें सम्राट विक्रमादित्य के नवरत्नों से एक महाकवि कालिदास की आराध्य देवी भी कहा जाता है। शक्ति संगम तंत्र में भी माता कालिका का अवस्थान बताया गया है। यहां नवरात्रि में लगने वाले मेलों के अलावा विभिन्न मौकों पर उत्सवों और यज्ञों का आयोजन होता रहता है। मां के दर्शनों के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। भक्तों की माता में अटूट श्रद्धा और आस्था है।