Sunday, July 25, 2021 08:28 AM

इम्युनिटी की मॉडलिंग

होटल, रेस्टोरेंट, छोटे ढाबों के मालिक पूरी तरह से बेरोजगार और प्रभावित हो चुके हैं। आज अगर एक अनुमान लगाया जाए तो हिमाचल प्रदेश का पर्यटन पूर्णतः ठप हो चुका है। कोरोना महामारी के कारण पर्यटकों के साथ प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए होटलों, ट्रैवल एजेंटों, टैक्सी कैब, ग्रुप पर टूर ऑपरेटर, मनोरंजन पार्क, एडवेंचर स्पोर्ट्स, फोटोग्राफी, टूरिस्ट गाइड, बिलिंग पैराग्लाइडिंग तथा इससे जुड़े लोगों का जीवन पटरी से उतर गया है। हिमाचल प्रदेश सरकार को पर्यटन उद्योग से जुड़े ऐसे अनेक लोगों की सहायता करनी चाहिए ताकि इससे जुड़े लाखों लोग अपना और अपने परिवार का पेट पाल सकें...

कोरोना, कोरोना और कोरोना...। यही वो शब्द है जो आज हर किसी की जुबां पर सुनने और समाचारों में देखने व पढ़ने को मिलता है क्योंकि बाकि सब कुछ को तो कोरोना ने अपनी जीवन सुरक्षा व अस्तित्व बचाने में लगा दिया है। चाहे वो स्वास्थ्य हो, शिक्षा हो, रोजगार हो, व्यवसाय हो या पर्यटन हो, सभी तरफ एक ही आस टिकाए सभी लोग बैठे हैं कि कहीं से कोई बस, संजीवनी मिल जाए। लेकिन संजीवनी कहां से मिलेगी? अब तो सब कुछ अपनी साख बचाने के लिए दांव पर लग गया है। कोरोना मानो लोगों के जीवन के साथ बार-बार लहरों के रूप में आकर खेल रहा हो। एक लहर समाप्त नहीं होती तो दूसरी लहर आ जाती है। हिमाचल प्रदेश जिसे पर्यटन नगरी व राजधानी कहें तो कहीं गलत नहीं होगा। लेकिन इस पर्यटन नाम की चिडि़या के ‘पर’ तो इस कोरोना ने कुतर ही दिए हैं। अब तो लगता है नजर पैरों पर है, मानो चलने लायक भी नही छोड़ेगा ये कोरोना, पर्यटन नाम की इस चिडि़या को। आज के समय में पहले हिमाचल के पर्यटक स्थल पर्यटकों से गुलजार रहते थे। वहां आज मायूसी का सन्नाटा पसरा है। पर्यटन पर निर्भर लोगों के परिवारों पर संकट आन पड़ा है। आज का संकट इतना है मानो लगता है कल आएगा भी या नहीं। हिमाचल के पर्यटक स्थलों पर अधिकांश लोगों का जीवन सैलानियों पर निर्भर करता है, लेकिन हिमाचल प्रदेश में कोरोना की पहली लहर में टूरिज्म सेक्टर की कमर टूट ही गई थी। कहीं बीच में जब मामले कम हुए तो सितंबर 2020 में हिमाचल का टूरिज्म सेक्टर खुला था और मामले कम होने पर फिर से टूरिस्ट प्रदेश की ओर रुख करने लगे थे। लेकिन कोरोना कहां मानने वाला था, अब कोरोना की दूसरी लहर में फिर से हिमाचल की टूरिज्म इंडस्ट्री बेपटरी हो गई है।

 अब तो मानो न पटरी का पता है, न रेल का और न पहियों का। हिमाचल प्रदेश देवी-देवताओं व साहसिक स्थलों व पर्यटक स्थलों की अतुल्य धरती मानी जाती है। पर्यटन की दृष्टि से यह प्रदेश भारत के साथ-साथ पूरे वैश्विक मानचित्र पर बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। लेकिन गत वर्ष से जब से यह महामारी फैली हुई है, तब से लेकर आज दिन तक अब यह कैद दम सा तोड़ने लगती है। आज अगर नजर प्रदेश के पर्यटन सेक्टर की ओर घुमाएं तो देखने को सभी तरफ  केवल संकट ही नजर आता है। पर्यटक स्थलों पर चाहे वो ढाबे वाले लोग हों, टूरिस्ट गाइड हों, होटल इंडस्ट्री हो या घुड़सवार हो या फिर पर्यटकों को गंतव्य तक पहुंचाने वाले टैक्सी चालक हों, इन सबके रोजगार पर ताला लग गया है जिससे इनके परिवार को संकट उत्पन्न हो गया है। चाहे हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला हो, सोलन हो, मनाली हो, धर्मशाला हो, कांगड़ा, डलहौजी, खजियार या फिर छोटी काशी मंडी ही क्यों न हो, सब पर्यटक स्थलों पर सन्नाटा पसरा हुआ है। इनसे भी अधिक छोटे-मोटे और अनेक पर्यटक स्थल हैं, लेकिन यह प्रतीक स्थल सैलानियों के न आने से पूर्णतः दम तोड़ रहे हैं। होटल, रेस्टोरेंट, छोटे ढाबों के मालिक पूरी तरह से बेरोजगार और प्रभावित हो चुके हैं। आज अगर एक अनुमान लगाया जाए तो हिमाचल प्रदेश का पर्यटन पूर्णतः ठप हो चुका है। कोरोना महामारी के कारण पर्यटकों के साथ प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए होटलों, ट्रैवल एजेंटों, टैक्सी कैब, ग्रुप पर टूर ऑपरेटर, मनोरंजन पार्क, एडवेंचर स्पोर्ट्स, फोटोग्राफी, टूरिस्ट गाइड, बिलिंग पैराग्लाइडिंग तथा इससे जुड़े लोगों का जीवन पटरी से उतर गया है। हिमाचल प्रदेश सरकार को पर्यटन उद्योग से जुड़े ऐसे अनेक लोगों की सहायता करनी चाहिए ताकि इससे जुड़े लाखों लोग अपना और अपने परिवार का पेट पाल सकें।

 पर्यटन उद्योग से जुड़े लोगों की वित्तीय सहायता सरकार को आगे आकर ऋणों के माध्यम से करनी चाहिए, क्योंकि पर्यटन की ये सब ही रीढ़ हैं। अगर ये ही टूट जाएगी तो कहां से पर्यटन फल-फूल पाएगा, इस बात को सोचने पर चिंता सताने लग जाती है। पर्यटन विभाग को भी ऐसे लोगों को टेंडर इत्यादि में रियायतें प्रदान करनी चाहिए, ताकि हिमाचल प्रदेश का समस्त पर्यटन क्षेत्र परिवार मानसिक व आर्थिक तौर पर स्वयं को मजबूत रख सके और सुरक्षित भी रहे। होटल मालिक, रेस्टोरैंट मालिक, ढाबे वाले, टैक्सी आपरेटर, ट्रैवल एजेंट, फोटोग्राफर, स्थानीय उत्पादों के बाजार, यानी सभी वर्ग कोरोना के कारण बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। यहां तक कि सरकारी होटलों को भी आय में कमी का सामना करना पड़ रहा है। पर्यटन गतिविधियों के कारण सरकार को जो आय होती थी, वह भी उससे वंचित हो गई है। कई होटल मालिक, जिन्होंने लीज पर होटल ले रखे थे, वे लीज को बीच में ही तुड़वाने के लिए विवश हो गए हैं। होटल वालों को कर्मचारियों का वेतन, बिजली-पानी का बिल, रखरखाव का खर्च तथा कई अन्य खर्च पूरे करने मुश्किल हो गए हैं। वे घाटे पर ही अपने होटल बेच देने के लिए विवश हैं। दिक्कत यह भी है कि कोरोना कब खत्म होगा और पर्यटन व्यवसाय फिर से कब चमकेगा, इसकी कोई संभावनाएं दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही हैं। भविष्य में इस क्षेत्र में निवेश से लोग कतराएंगे।

प्रो. मनोज डोगरा

लेखक हमीरपुर से हैं

सवाल देश की इम्युनिटी का है, इसलिए हर भारतवासी इसकी मॉडलिंग करने को तैयार होने लगा है। दरअसल मॉडलिंग की ट्रेनिंग तो तब से शुरू हो गई है जब से प्रधानमंत्री के नाम से जुड़ी तमाम योजनाएं हर चुनाव में इम्युनिटी पैदा कर रही हैं। उज्ज्वला योजना के तहत जिन्होंने रसोई गैस की मॉडलिंग होते देखी है, उन्हें विश्वास है कि इसी तरह एक दिन वैक्सीन की भी हो जाएगी। अगर कोविड काल न होता, तो विश्व अब तक हमारी ही मॉडलिंग देख रहा होता। हद तो यह कि पिछले चौदह महीनों में हम चाह कर भी अमरीका सहित अन्य कई देशों में जाकर मॉडलिंग नहीं कर पाए। सूत्र बताते हैं कि हमारी मॉडलिंग के दीवाने कई सभागार-स्टेडियम भी इम्युनिटी देखने को उतावले हैं। वे चाहते हैं कि भारत के लोग गंगा में बहने के बजाय पुराने रंग में आएं और विश्व गुरु बनें। उन्हें मालूम है कि चाहे हमें वैक्सीन की डोज मिले या न मिले, हर भारतीय के भीतर विश्व गुरु बनने की अद्भुत इम्युनिटी है।

 हमने बिना डोज वैक्सीन के विश्व गुरु बनने का खिताब हासिल किया है, तो यह हमारी क्षमता है। हमने ठेठ कोरोना काल में महाकुंभ इसीलिए किया ताकि वहां पहुंच कर हर भारतीय ‘विश्व गुरु’ साबित हो। जो काम विज्ञान न कर पाए या जिससे पूरा संसार भयभीत हो, वह हम कर दिखाते हैं। हम हर काम इम्युनिटी निरीक्षण के तहत करते हैं, इसलिए बंगाल चुनाव में असली जीत तो उस मॉडलिंग की है जिसने पूरे विश्व को हैरान किया। हैरानी पैदा करना ही हमारी इम्युनिटी है। पूरा विश्व चकित था, लेकिन हमने अपने लोगों के हिस्से की वैक्सीन बाहर भेज कर साबित किया कि है कोई माई का लाल जो दूसरे देश में तालियां बजाने के लिए भूखा-प्यासा रह सकता है। दरअसल भूख-प्यास हमारी इम्युनिटी के बूस्टर हैं और इसलिए हम कोशिश करते रहेंगे कि कहीं किसान की आय दुगनी न हो जाए। अब तो लॉकडाउन व कर्फ्यू भी हमारे लिए टॉनिक से कम नहीं।

 हमें मालूम है कि इससे बेहतर आर्थिकी में इम्युनिटी पैदा नहीं हो सकती। जो कोरोना से बचेंगे, वे तमाम भारतीय, हमारी इम्युनिटी के मॉडल ही तो साबित होंगे और इसी तरह कर्फ्यू-लॉकडाउन लगा-लगा कर हम अपनी पिछड़ी आर्थिकी के बावजूद ऐसे लौह पुरुष पैदा करेंगे, जो बार-बार सदमे सहकर भी भारतीय भावना का झंडा बुलंद करते रहेंगे। इसी कोरोना काल ने बता दिया कि देश की सबसे अधिक आर्थिक इम्युनिटी अंबानी और अडानी के पास है तो यह करिश्मा भारत ही कर सकता है, बल्कि कल इसी तर्ज पर हर व्यापारी को कोशिश करते हुए याद रखना होगा, ‘वह है, तो मुमकिन है।’ विश्व की सबसे बड़ी इम्युनिटी प्रयोगशाला स्वयं भारतवर्ष रहा है और आइंदा भी भयभीत होने वाले प्रश्नों का हल होने से पहले, यह घोषणा कर सकते हैं कि आएगा तो भारत ही। देश के लिए इम्युनिटी पैदा करने का मंत्र हमसे कोई चुरा न ले, इसलिए हम कई बार बिना कुछ किए भी मॉडलिंग कर सकते हैं। हमारी इम्युनिटी का टेस्ट किसी भी प्रयोगशाला को अवैध बना सकता है, क्योंकि हम हर चुनाव को जीतने के लिए खुद से भी अप्रभावित और असंवेदनशील रह कर बच जाते हैं और देश को बचा लेते हैं। ट्रंप ने अमरीका को भारतीय इम्युनिटी सिखाने की कोशिश की, लेकिन खुद हमारी जैसी मॉडलिंग न कर पाने की वजह से मुंह की खानी पड़ी। हम लोकतंत्र की ऐसी इम्युनिटी पैदा कर चुके हैं, जहां जो सबसे अधिक या बेहतरीन मॉडलिंग करेगा, वही हमारा नेता, मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री होगा।

निर्मल असो

स्वतंत्र लेखक