Tuesday, June 15, 2021 12:43 PM

नकाब में नैतिकता

कोरोना का भी अंत भारत से ही होगा, ऐसा प्रतीत होता है। लेकिन इसके लिए आवश्यकता है तो मात्र यह कि देशवासी ऐसा संयुक्त दृढ़ संकल्प करें कि कोरोना हार जाए। साथ ही मजबूत इच्छा शक्ति व संयम के साथ धैर्य रखकर विवेक से काम करते हुए स्वयं व अपनों के लिए सुरक्षा मानकों को अपनाने की भी जरूरत है। राज्य व केंद्र सरकारें मुसीबत पडऩे पर तो व्यवस्था कर रही हैं, मगर यही व्यवस्थाएं अगर पिछले एक वर्ष से सुचारू हो जाती तो आज स्थिति ऐसी नहीं होती। राजनेता खुद रैलियां व कार्यक्रम करते रहें और जनता सख्ती का पालन करे, यह भी ठीक नहीं है...

कोरोना, कोरोना, कोरोना। वर्तमान समय में यही एक ऐसा शब्द है जो हर किसी की जुबां से सुनने को मिल रहा है और आखिर मिले भी क्यों नहीं! कोरोना इस कदर अपना वर्चस्व बनाने की फिराक में है मानो इससे बड़ी ताकत विश्व में कोई है ही नहीं। कोरोना लोगों के अरमानों से इस कदर खेल रहा है कि मानो प्राण बलिदान ही अंत होगा। होने को तो आज कोरोना महामारी को फैले लगभग डेढ़-दो वर्ष हो रहे हैं, लेकिन इसने पूरे विश्व को कई दशक पीछे धकेल दिया है। पूरा विश्व, खासकर अपना देश सभी कार्य छोडक़र प्राण रक्षा में लगा हुआ है। इस वर्ष के आरंभ में रंग थोड़ा भले ही फीका पड़ा था, लोगों ने सोचा भी कि अब तो कोरोना महामारी चली गई, अब तो हम बच गए और लापरवाही शुरू हो गई, लेकिन कोरोना ने जब पुन: प्रहार किया तो कोई भी इससे संभल नहीं पाया क्योंकि प्रहार इतना भयंकर था कि संभलने को वक्त ही नहीं लगा। अपनी इस दूसरी लहर के सैलाब में कोरोना ने कइयों के परिवार तबाह कर दिए। एक बार फिर मजदूरों को रोजी-रोटी न मिलने के डर से घरों की ओर मुश्किल परिस्थितियों में पलायन का रास्ता अपनाना पड़ा क्योंकि कोरोना से तो बच जाते, मगर भुखमरी काल बनकर सामने खड़ी दिखने लग जाती है। मजदूर आखिरकार मजबूर था।

आज कहीं रात्रि कफ्र्यू लगाया जा रहा है तो कहीं वीकेंड लॉकडाउन, तो कहीं संपूर्ण लॉकडाउन। आखिर सख्ती से ही, मगर जान तो बचानी है। आज पूरा देश कोरोना से किसी न किसी तरह बच कर जीवन जीने की उम्मीद देख रहा है। शासन-प्रशासन, सरकार, जनता, सबके हाथ-पांव फूल चुके हैं। मानो देश में सांसों का आपातकाल सा आ गया हो। यह पहले से ही स्पष्ट था क्योंकि जब सावधानी हटेगी तो हादसा व दुर्घटना तो घटेगी ही। यहां भी ऐसा ही हुआ। जब कोरोना धीरे-धीरे समाप्ति की ओर जा रहा था तो लोगों ने सुरक्षा मानकों व मास्क को इस कदर खुद से दूर कर लिया मानो अमृत प्राप्ति हो गई हो। आयोजन ऐसे होने लगे मानो कई दशकों से कुछ हुआ ही न हो। बाजारों में भीड़ ऐसी उमड़ी कि न जाने बाजार में जिंदगी से कीमती क्या चीज बिक रही होगी? और तो और, राजनीतिक दलों ने दनादन ऐसी रैलियां व विशाल कार्यक्रम करने शुरू किए, मानो इसके बाद मौका ही नही मिलेगा। इस आग में घी का काम शादियों व चुनावों के मुहूर्तों ने किया।

और यहीं से जा रही कोरोना महामारी ने अपने पांव एक बार फिर पसारे और इस कदर फैला कि स्थिति सभी के सामने है। कोई भी इस भयावह स्थिति से अनजान नहीं है। अब तो मानो ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे भारत में मौत व जीवन के बीच का ‘जीत सको तो जीतो’ का खेल सिलसिला लग गया हो। लेकिन दुख होता है कि इस खेल में कइयों ने अपनों को खो दिया है और कइयों के साथियों का जीवन दांव पर लगा है। भारत के लोगों को अभी भी वक्त है, उन्हें संभल जाना चाहिए अन्यथा स्थिति इससे भी भयंकर व भयावह होते समय नहीं लगेगा। फिर न मास्क काम आएगा और न ही ‘दो गज की दूरी, है जरूरी’ जैसी बातें। भारत देश व यहां के लोगों ने विभिन्न कालखंडों में अनेक महामारियों का मुकाबला किया है। कोरोना का भी अंत भारत से ही होगा, ऐसा प्रतीत होता है। लेकिन इसके लिए आवश्यकता है तो मात्र यह कि देशवासी ऐसा संयुक्त दृढ़ संकल्प करें कि कोरोना हार जाए। साथ ही मजबूत इच्छा शक्ति व संयम के साथ धैर्य रखकर विवेक से काम करते हुए स्वयं व अपनों के लिए सुरक्षा मानकों को अपनाने की भी जरूरत है। राज्य व केंद्र सरकारें मुसीबत पडऩे पर तो व्यवस्था कर रही हैं, मगर यही व्यवस्थाएं अगर पिछले एक वर्ष से सुचारू हो जाती तो आज स्थिति ऐसी नहीं होती। हिमाचल में हाल ही में चार जिलों में रात्रि कफ्र्यू भले ही लगा दिया हो, लेकिन ये केवल आदेश ही नहीं होने चाहिए, बल्कि जनता-शासन-प्रसाशन में एकरूपता होनी आवश्यक है, तभी इनकी पालना निश्चित हो सकती है।

हिमाचल प्रदेश आने वालों के लिए आरटी-पीसीआर रिपोर्ट लाने के आदेश जारी हुए हैं, लेकिन ये आदेश ही न रहें, बल्कि व्यावहारिकता में भी क्रियान्वयन हो, तभी कुछ होगा। राजनेता खुद रैलियां व कार्यक्रम करते रहें और जनता सख्ती का पालन करे, यह भी ठीक नहीं है। आदेश सभी के लिए एकरूप होने चाहिएं। इसमें आम व खास का फॉर्मूला नहीं लगना चाहिए। और रही लोगों में कोरोना के प्रति मानसिक संक्रमण की बात, तो लोगों को समझना होगा कि बुरे से बुरा वक्त आता है तथा चला जाता है क्योंकि यह वक्त है, यह न कभी रुका है, न ही किसी के लिए कभी झुका है। सब्र रखकर थोड़ी सख्ती झेलकर इस कोरोना नामक विपदा से भी पार पाया जा सकता है। मौतों के आंकड़े देख व सुनकर कोरोना का लोगों में खौफ फैल चुका है, लेकिन डरने की बात नहीं है। भारत में एक दिन में लगभग दो लाख से अधिक लोग कोरोना पर विजय भी पा रहे हैं। कोरोना के भय को अपने मन से निकालकर एक बार पुन: नई शुरुआत के लिए, राष्ट्र व समाज के विकास के लिए रचनात्मक कार्य करते हुए देश को एक आदर्श शीर्ष स्थान पर पहुंचाना है, यह तभी संभव हो सकता है जब कोरोना पर विजय मिलेगी।

प्रो. मनोज डोगरा

लेखक हमीरपुर से हैं

देश की नैतिकता को आजादी के 74 साल गुजारने के बाद यह समझ आ गया कि अब उसे किसके साथ चलना है। आजादी से आज तक सदा कुंआरी रही नैतिकता के लिए यह जरूरी हो गया था कि उसे स्थायी छत मिले, सो उसने अब तय कर लिया है कि देश का मध्यम-बुद्धिजीवी वर्ग ही उसका साथी हो सकता है। नैतिकता खुद बुद्धिजीवी मध्यम वर्ग को चाहने लगी है, इसलिए खूंटे से बंधा समाज सोचने लगा है कि देश की इज्जत उसके कारण बच रही है। वैसे नैतिकता को यह मालूम है कि उसकी चिंता में आज तक चली तमाम सत्ताओं का साथ रहा है और यही वजह रही कि विधानसभा से लोकसभा के सदन तक उसकी खातिर विशेषाधिकार बनाए गए। गिरते चरित्र के बावजूद जनप्रतिनिधियों ने हमेशा उसकी बात की और जब पद छोडऩा पड़ा तो उसी की दुहाई में इतना त्याग किया गया।

कुछ दिन पहले नैतिकता के लिए इससे बड़ी गर्व की बात और क्या होती कि सदा चुनावी रैलियों के नायक रहे प्रधानमंत्री ने महज उसकी रक्षा के कारण पश्चिम बंगाल को यह सुना दिया कि वह अब भीड़ के सामने सीधे नहीं आएंगे। नैतिकता की अब काटो तो खून की स्थिति इसलिए हो चुकी है क्योंकि जैसे ही प्रधानमंत्री ने रैली को मना किया, वैसे ही चुनाव आयोग ने नैतिकता का कन्यापूजन करते ही पश्चिम बंगाल को रैलीविहीन कर दिया। नैतिकता इतनी प्रसन्न हो गई कि उसने अदालतों तक में झाड़ू लगाना शुरू कर दिया और इसी के नतीजे में पिछले दिनों देश की बड़ी अदालत ने छह हाई कोर्टों में चल रहे कोरोना हालात की सुनवाई को अपने दरबार में खींच लिया। नैतिकता को अब भरोसा हो गया कि देश भी, ‘एक देश-एक नैतिकता’ के सिद्धांत पर चलने लगा है। ऐसा कदापि नहीं होगा कि सत्ता पक्ष और विपक्ष अलग-अलग तरह से नैतिकता को पसंद करें, बल्कि सारे राजनेता इस मामले में ‘एक देश-एक मर्यादा’ के सिद्धांत पर खरे उतरते नजर आते हैं। कई बार नैतिकता खुद को देश की गठरी जैसे देखती है, हर कोई उसकी टोह लेता है। नैतिकता के कोमल बदन पर कितनी ही पार्टियों के निशान चस्पां हो गए हैं। यह दीगर है कि अब उसे मीडिया से डर नहीं लगता। दरअसल मीडिया ने उसे देखना ही छोड़ दिया है। वह खुद को अति सेफ महसूस कर रही है, वरना आजादी के आरंभिक दिनों में ही मीडिया ने उसे घूंघट पहनने को मजबूर कर दिया था। मीडिया सारी व्यवस्था को घूरता था और इसके एवज में नैतिकता को पूरा तन ढांपना पड़ता था।

अब नैतिकता भी सनी लियोनी की तरह जीना सीख गई है। वह आधुनिक ख्यालों में पूरी तरह स्वतंत्र विचारधारा की है। सारा देश उसके नंगे बदन को देखकर भी विचलित नहीं होता, फिर भी आम लोग या फटे कपड़ों से ढके भूखे लोग कोशिश करते हैं कि देश की नैतिकता किसी तरह पूरी तरह ढक जाए। कई महीनों से आंदोलन कर रहे किसान देश की नैतिकता को ढूंढते-ढूंढते दिल्ली पहुंच गए, लेकिन वह पश्चिम बंगाल निकल गई थी। हद तो तब हो गई जब नैतिकता ने भी अपने पाप धोने के लिए हरिद्वार महाकुंभ की ओर प्रस्थान कर दिया। गंगा में नहाते तमाम महापुरुषों के बीच नैतिकता ने भी डुबकी लगा दी। उसे भरोसा था कि जिस तरह देश धार्मिक मान्यताओं के पालन से पवित्र हो रहा है, वह भी हो जाएगी। गंगा के भीतर नैतिकता और नैतिकता के भीतर गंगा का यह मिलन देख कर सारे देश की आंखों में आंसू आ गए, क्योंकि इन दोनों का पहली बार सभी के सामने अस्थि-विसर्जन हो रहा था।

निर्मल असो

स्वतंत्र लेखक