नए कृषि कानूनों की अहमियत: डा. जयंतीलाल भंडारी, विख्यात अर्थशास्त्री

डा. जयंतीलाल भंडारी

विख्यात अर्थशास्त्री

निःसंदेह देश में कृषि एवं ग्रामीण विकास की जो नई संभावनाएं उभरकर दिखाई दे रही हैं, उनमें नए कृषि कानून और अधिक सार्थक भूमिका निभाते हुए दिखाई दे सकेंगे। रिजर्व बैंक ऑफ  इंडिया और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष सहित विभिन्न आर्थिक संगठनों की नई रिपोर्टों के मुताबिक कोविड-19 की चुनौतियों के बीच भारत के लिए कृषि एवं ग्रामीण विकास की अहमियत बढ़ गई है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल-जून 2020 की तिमाही में देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 23.9 फीसदी की भारी बड़ी गिरावट आई है। इस बड़ी गिरावट के बीच कृषि ही ऐसा सेक्टर है जिसमें 3-4 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है…

इन दिनों पूरे देश में हाल ही में संसद द्वारा पारित तीन कृषि सुधार विधेयकों पर जोरदार विचार-मंथन हो रहा है। यद्यपि अब राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद ये विधेयक कानून का रूप लेंगे, लेकिन इस समय जहां सरकार के द्वारा नए कृषि सुधार विधेयकों को ऐतिहासिक एवं क्रांतिकारी बताया जा रहा है, वहीं विपक्षी दलों के द्वारा इसका विरोध भी किया जा रहा है। हाल ही में 21 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि संसद से पारित कृषि सुधार विधेयक कानून बनने के बाद किसानों के उज्ज्वल भविष्य के लिए लाभप्रद सिद्ध होंगे। नए कृषि कानून 21वीं सदी के भारत की जरूरत हैं। इससे न तो न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) और न ही कृषि मंडियां समाप्त होंगी, बल्कि इससे किसानों के हितों की रक्षा होगी। लेकिन विपक्षी दलों ने नए कृषि सुधारों के माध्यम से सरकार पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) प्रणाली की व्यवस्था समाप्त करने का आरोप लगाया है। विपक्षी दलों ने कहा कि कृषि सुधार के नए कानून से छोटे किसानों को कोई लाभ नहीं मिलेगा और बड़ी कंपनियां अपनी शर्तों पर उनसे कृषि उत्पाद खरीदेंगी। कुछ किसान समूहों ने भी इसका विरोध किया है। 25 सितंबर को इसी परिप्रेक्ष्य में भारत बंद का आह्वान भी किया गया और यह कहा गया है कि सरकार एमएसपी आधारित खरीद प्रणाली खत्म करने के लिए यह नया कृषि कानून लेकर आ रही है।

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के मुताबिक नए कृषि सुधारों से खासतौर से देश में जो 86 प्रतिशत छोटे किसान हैं, वे अधिक लाभान्वित होंगे। कृषि से संबंधित नए कानून के बाद कृषि उपज खुली प्रतिस्पर्धा के माध्यम से बिकेगी। व्यापक प्लेटफार्म होने से बड़ी संख्या में खरीददार रहेंगे और इससे किसानों को फायदा होगा, क्योंकि वे अपनी पसंद के अनुरूप उपज बेचेंगे। किसानों पर कोई दबाव नहीं रहेगा कि वे उपज तुरंत या कम दाम पर बेच दें। जब किसान अपनी फसल को तकनीक एवं वितरण नेटवर्क के सहारे देश और दुनिया भर में कहीं भी बेचने की स्थिति में होंगे, तो इससे निश्चित रूप से किसानों को उपज का बेहतर मूल्य मिलेगा। निश्चित रूप से नए कृषि कानूनों के बाद प्रतिस्पर्धात्मक माहौल के चलते मंडियों में इंफ्रास्ट्रक्चर सहित अन्य सुविधाएं बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा। जितने विकल्प खुले होंगे, उतनी ही प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। इससे किसान को वाजिब दाम मिलेगा। मंडी की परिधि में किसान अब तक बंधा था, नए कानून किसान को आजादी दिलाने वाले होंगे। इससे मंडियां खत्म नहीं होंगी।

राज्य मंडियों में आय बढ़ाने योग्य प्रतिस्पर्धा व सुविधाजनक इंफ्रास्ट्रक्चर बनाएंगे तो मंडियों की आय बनी रहेगी। चूंकि नए कृषि सुधार कानून स्वतंत्र व खुले कारोबार से संबंधित होंगे, अतएव इसका न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। एमएसपी के लाभ मिलते रहेंगे। यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि सरकार स्वामीनाथन समिति की सिफारिशों के अनुरूप जो लागत किसान को आती है, उस पर 50 फीसदी मुनाफा जोड़कर एमएसपी घोषित कर रही है। मोटे अनाज, दलहन एवं खाद्य तेलों की एमएसपी उच्चतर स्तर पर निर्धारित की गई है ताकि किसानों को इनके और अधिक उत्पादन के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। इसमें कोई दो मत नहीं कि नए कृषि कानूनों का एक बड़ा फायदा यह भी होगा कि जब किसान अपने छोटे-छोटे खेतों से निकली फसल को कहीं भी बेचने के लिए स्वतंत्र होंगे, तो इससे जहां एक ओर बंपर फसल होने पर भी फसल की बर्बादी या फसल की कम कीमत मिलने की आशंका नहीं होगी, वहीं दूसरी ओर फसल के निर्यात की संभावना भी बढ़ेगी। इसी तरह किसानों को अनुबंध पर खेती की अनुमति मिलने से किसान बड़े रिटेल कारोबारियों, थोक विक्रेताओं तथा निर्यातकों के साथ समन्वय करके अधिकतम और लाभप्रद फसल उत्पादित करते हुए दिखाई दे सकेंगे। निःसंदेह देश में कृषि एवं ग्रामीण विकास की जो नई संभावनाएं उभरकर दिखाई दे रही हैं, उनमें नए कृषि कानून और अधिक सार्थक भूमिका निभाते हुए दिखाई दे सकेंगे।

 रिजर्व बैंक ऑफ  इंडिया और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष सहित विभिन्न आर्थिक संगठनों की नई रिपोर्टों के मुताबिक कोविड-19 की चुनौतियों के बीच भारत के लिए कृषि एवं ग्रामीण विकास की अहमियत बढ़ गई है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल-जून 2020 की तिमाही में देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 23.9 फीसदी की भारी बड़ी गिरावट आई है। इस बड़ी गिरावट के बीच कृषि ही एकमात्र ऐसा सेक्टर है जिसमें 3-4 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है। कृषि सेक्टर की विकास दर बढ़ाने में रबी फसलों के उत्पादन, खासतौर से गेहूं की भारी पैदावार ने प्रभावी भूमिका निभाई है। ज्ञातव्य है कि केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने आगामी खरीफ  फसल का जो पहला अग्रिम अनुमान 23 सितंबर को घोषित किया है, उसमें वर्ष 2020-21 में देश में खरीफ सीजन में खाद्यान्नों के रिकॉर्ड 14.4 करोड़ टन से अधिक उत्पादन की संभावना बताई है। इस समय जब पंजाब और हरियाणा सहित देश के कुछ हिस्सों में किसान सरकार के कृषि विधेयकों का विरोध कर रहे हैं, तब केंद्र सरकार ने आगामी कृषि वर्ष के लिए छह रबी फसलों- गेहूं, चना, मसूर, सरसों, जौ और कुसुम का एमएसपी बढ़ा दिया है। गेहूं का एमएसपी 50 रुपए प्रति क्विंटल बढ़ाकर 1975 रुपए कर दिया गया है।

 इससे सरकार ने यह साबित कर दिया है कि एमएसपी की व्यवस्था खत्म नहीं होगी। लेकिन नए कृषि कानूनों के बाद भी हमें ग्रामीण भारत और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजूबत बनाने के लिए कई बातों पर विशेष ध्यान देना होगा। ग्रामीण क्षेत्र के छोटे और कुटीर उद्योगों को सरल ऋण मिलना भी सुनिश्चित किया जाना होगा। खराब होने वाले कृषि उत्पादों जैसे फलों और सब्जियों के लिए लॉजिस्टिक्स सुदृढ़ किया जाना होगा, जिससे किसानों को बेहतर मुनाफा दिया जा सके। खाद्य प्रसंस्करणकर्ताओं के लिए अतिरिक्त कार्यशील पूंजी ऋण मुहैया कराया जाना होगा, जिससे वे कच्चे माल की खरीद कर सकें। हम उम्मीद करें कि संसद से स्वीकृत कृषि सुधारों से संबंधित तीन विधेयकों के राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से कानून बनने के बाद किसान अवश्य लाभान्वित होंगे। नए कृषि सुधार किसानों को उद्यमिता के लिए प्रेरित करेंगे। हम उम्मीद करें कि सरकार देश के किसानों के लिए आधुनिक सोच के साथ नई व्यवस्थाओं का निर्माण करेगी। साथ ही सरकार देश के किसान को, देश की खेती को और आत्मनिर्भर बनाने के लिए और अधिक प्रयास करने की डगर पर आगे बढे़गी।

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