नीलकंठ महादेव मंदिर

अमृतपान के लिए जहां देवताओं और दानवों में संघर्ष शुरू हुआ, वहीं कालकूट हलाहल (विष) की अग्नि से पूरा ब्रह्मांड धधक उठा। देवताओं की विनती पर जगत के कल्याण हेतु भगवान शिव ने कालकूट विष अपने कंठ में धारण कर लिया। विष के कारण उनका कंठ नीला पड़ गया…

गढ़वाल, उत्तरांचल में हिमालय पर्वतों के तल में बसे ऋषिकेश के पंकजा और मधुमती नदियों के संगम स्थल पर स्थित नीलकंठ महादेव मंदिर एक प्रसिद्ध धार्मिक केंद्र है। नीलकंठ महादेव मंदिर ऋषिकेश के सबसे पूज्य मंदिरों में से एक है।

पावन नगर हरिद्वार से लगभग 45 किलोमीटर की दूरी पर विष्णुकूट, मणिकूट और ब्रह्मकूट नामक पर्वतों से घिरा यह रोमांचक, मनोहारी मंदिर समुद्रतल से 1330 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। भगवान शिव यहां पर पिंडी (शिवलिंग) के रूप में नीलकंठ महादेव के नाम से विराजमान हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार देवताओं और असुरों ने मिलकर क्षीर सागर का मंथन किया। अमृतपान के लिए जहां देवताओं और दानवों में संघर्ष शुरू हुआ, वहीं कालकूट हलाहल (विष) की अग्नि से पूरा ब्रह्मांड धधक उठा। देवताओं की विनती पर जगत के कल्याण हेतु भगवान शिव ने कालकूट विष अपने कंठ में धारण कर लिया। विष के कारण उनका कंठ नीला पड़ गया।

विष के प्रभाव से निकली नकारात्मक ऊर्जा के दमन के लिए उन्होंने शिवालिक पर्वत शृंखलाओं की तरफ प्रस्थान किया और यहीं कई वर्षों तक ध्यानस्थ होकर अपने चित्त को शांत किया। इसके बाद भगवान शिव पिंडी व नीलकंठ महादेव के रूप में मणिकूट पर्वत पर ही अधिष्ठित हो गए। पुराणों के अनुसार भगवान शिव ने श्रावण मास में ही हलाहल को अपने कंठ में धारण किया था। श्रावण मास भगवान शिव को इसलिए भी प्रिय है क्योंकि 12 महीनों में एकमात्र यही मास नीलकंठ महादेव के गर्म कंठ को शीतलता प्रदान करने में सक्षम हुआ। जैसे ही सूर्य कर्क राशि में प्रवेश करता है, वैसे ही श्रावण झमाझम बारिश से भगवान शिव का प्रथम जलाभिषेक करता है।उसके बाद इस मास में शिव भक्त हर सोमवार को उपवास रखकर विधिवत रूप से भगवान का गंगा जल से अभिषेक करते हैं। श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को इसी उपलक्ष्य में शिवरात्रि महोत्सव मनाया जाता है।

कैसे पहुंचें- हरिद्वार रेलवे स्टेशन व बस स्टैंड से नीलकंठ महादेव मंदिर तक जाने-आने के कई साधन उपलब्ध हैं। हरिद्वार से ऋषिकेश तक बस से आ सकते हैं। वहां से लक्ष्मण व राम झूला से नीलकंठ महादेव मंदिर लगभग 30-32 किलोमीटर की दूरी पर है। यहां से टैक्सी किराए पर मिल जाती है। नीलकंठ महादेव मंदिर की यात्रा तब और भी रोमांचकारी हो जाती है, जब आप घुमावदार, संकरे, पर्वतीय रास्ते से गुजर रहे होते हैं और आपके ठीक पास सड़क किनारे कलकल करती नदी बड़े वेग से बह रही होती है।

यह गर्मी में भी आपको सर्द मौसम का एहसास करवाती है। नीलकंठ महादेव मंदिर के दोनों ओर से पर्वतों से मधुमती व पंकजा नाम की दो जलधाराएं निकलती हैं, जो आगे चलकर गंगा में समाहित हो जाती हैं। श्रावण मास में प्रकृति अपने यौवन पर होती है, जो श्रद्धालुओं व सैलानियों का मन मोह लेती है।

ऋषिकेश से नीलकंठ महादेव मंदिर तक पैदल मार्ग 11 किलोमीटर के लगभग है। बहुत से श्रद्धालु, खासकर कांवडि़ए इसी मार्ग को प्राथमिकता देते हैं और नंगे पांव गंगा जल लेकर शिवरात्रि के दिन भगवान का जलाभिषेक करते हैं। नीलकंठ महादेव मंदिर से करीब एक किमी. दूर पर्वत शिखर पर मां पावर्ती मां भुवनेश्वरी के रूप में अधिष्ठित हैं।

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