Tuesday, September 29, 2020 09:38 PM

निचले हिमाचल में बागबानी के नए आयाम

निचला हिमाचल अब बागबानी में अप्पर हिमाचल को टक्कर देने की पूरी तैयारी में है। सेब की बागबानी के लिए देश भर में अलग पहचान बना चुके शिमला, किन्नौर, कुल्लू-मनाली के अलावा अब कांगड़ा-चंबा, ऊना, हमीरपुर, बिलासपुर, सोलन और मंडी में भी लो-चिलिंग वैरायटी के सेब का उत्पादन बड़ी मात्रा में होने लगा है। निचले हिमाचल के छोटे-छोटे बागबान भी अब शुरुआती दौर में ही लाखों कमाने लगे हैं। बागबानी में क्या कुछ नया कर रहे हैं लोअर हिमाचल के बागबान…अहम पहलुओं के साथ पेश है यह दखल

सूत्रधार

पवन कुमार शर्मा, नीलकांत भारद्वाज वि.कौंडल, अनिल पटियाल, नरेन कुमार संजय सोनी, कुलदीप सोनी

लोअर हिमाचल में सेब ही नहीं, कीवी, अमरूद, सीट्रस फल, कटहल, बेर, करोंदा गरना, पपीता, अनार प्रचूर मात्रा में उगाया जा सकता है। ये पौधे थोड़े समय में फल देकर बागबान की आर्थिकी को मजबूत कर सकते हैं। विभाग अपने स्तर पर बागबानों को कई योजनाओं को 80 फीसदी तक सबसिडी देकर तमाम तरह के औजार और सुरक्षा सहित सिंचाई की सुविधा मुहैया करवाने में मदद कर रहा है। इसके अलावा अधिकारी स्वयं ग्राउंड में जाकर पौधे लगाने से पहले लेआउट देने से लेकर बागीचा लगने के बाद तक खेत तक जाते हैं

—दौलत राम वर्मा, उपनिदेशक, बागबानी विभाग

पहाड़ पर अब नए-नए प्रयोग

निचला हिमाचल अब बागबानी में अप्पर हिमाचल को टक्कर देने की तैयारी में है। सेब की बागबानी के लिए देश भर में अलग पहचान बना चुके शिमला, किन्नौर, कुल्लू-मनाली के अलावा अब कांगड़ा-चंबा, ऊना, हमीरपुर, बिलासपुर, सोलन और मंडी में भी लो चिलिंग वैरायटी के सेबों का उत्पादन बड़ी मात्रा में होने लगा है। अब निचले हिमाचल के छोटे-छोटे बागबान भी शुरुआती दौर में ही लाखों कमाने लगे हैं। अप्पर हिमाचल का सेब जुलाई 15 के बाद बाजार में आने शुरू होता है, तो निचले हिमाचल में तैयार होने वाला अन्ना, डोरसेट, गोल्डन किस्मों का सेब जून के शुरुआत में ही तैयार हो जाता है, जिससे निचले हिमाचल के सेब को ही बाजार में ही 100 से 150 रुपए तक के अच्छे दाम मिल रहे हैं, जिसके चलते अब निचले हिमाचल के किसान परंपरागत खेती से हटकर बागबानी की ओर मुड़ने लगे हैं। हालांकि अभी यहां शुरुआती दौर है, लेकिन आने वाले एक दशक के बाद निचला हिमाचल बागबानी का बड़ा क्षेत्र बनकर उभरेगा। निचले हिमाचल में सेब ही नहीं आम, लीची, कीवी, अनार, अमरूद, केला, नींबू, मौसमी, माल्टा, संतरा, किन्नू, पल्लम, नाशपति, कंरोदा, बेर, जामून, अंजीर, पपीता, कलमी आंवला सहित दर्जनों प्रकार के फल तैयार होने लगे हैं। बागबानी के क्षेत्र में नए-नए प्रयोग निचले हिमाचल में हो रहे हैं। बागबानी स्वरोजगार का बड़़ा साधन बन गई है। बागबानी विभाग केवल पौधे लगाने ही नहीं, इसके अलावा भी कई नए प्रयोग कर रहा है। मौन पालन की दिशा में आधुनिक तकनीकी से नए काम हुए हैं। खुंभ उत्पादन की खेती करने को युवा आगे आ रहे हैं। यह कमाई का अच्छा जरिया बनता जा रहा है। पुष्प उत्पादन पहाड़ में बड़े स्तर पर हो रहा है। बागबानी विभाग ने नए प्रयोगों से इस दिशा में युवाओं को प्रेरित करने का बड़ा काम किया है। फल प्रौद्योगिकी को भी पिछले कुछ वर्षों से बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके लिए उपदान भी दिया जा रहा है।

धीरे-धीरे कल्चर बनने लगा शौक

पहाड़ी प्रदेश की खासियत यह है कि यहां फलों की पैदावार ही नहीं बादाम, खुमानी, अखरोट सहित अन्य कई तरह के ड्राई फू्रट्स की वैरायटी भी प्रचूर मात्रा में पाई जाती है। अपनी संस्कृति को संजोए हिमाचल के लोग अब एग्रीकल्चर और हॉर्टिकल्चर को भी अपना कल्चर मानते हुए अपनाने लगे हैं। अभी तक जिला कांगड़ा-चंबा, मंडी, हमीरपुर, बिलासपुर व ऊना सीमित क्षेत्रों को छोड़कर बागबानी का कार्य शौकिया तौर पर करते रहे हैं, लेकिन अब इन जिलों में शिमला, किन्नौर, लाहुल-स्पिति की तर्ज पर बागबानी से कारोबार, रोजगार व स्वरोजगार का अब बड़ा साधन तैयार करने लगे हैं। इसी सोच के साथ अब निचले हिमाचल में कार्य हो रहा है। कांगड़ा, ऊना, हमीरपुर, बिलासपुर जिलों में सैकड़ों बागबान प्रगतिशील बन गए हैं। यह सब नई तकनीक के कारण संभव हो पाया है। जो भी व्यक्ति नई तकनीक से काम कर रहा है, वह स्वयं ही अपने परिवार के साथ अन्य लोगों को स्वरोजगार से जोड़ रहा है।

आधुनिक तकनीक ने बहुत कुछ बदला

नए दौर में बागबानी भी आधुनिक तकनीक से होने लगी है। पहले पौधे से फल लेने को पांच से दस साल इंतजार करना पड़ता था, लेकिन अब नई तकनीक से सेब और कीवी भी दूसरे वर्ष में ही फल दे रहे हैं, जिससे कम खर्च में बागबान को लाभ मिल रहा है। कम वर्षों में अधिक उत्पादन देने वाली खेती पर अधिक प्रयास किए जा रहे हैं। ज्यादा पौधे कम भूमि में लग रहे हैं। विभाग भी सहयोग कर रहा है। खेतीबाड़ी बागबानी की तकनीक में बड़ा बदलाव आया है। कनेक्टिविटी और बाहरी देशों की किस्मों के आने में से बागबानों को बड़ा लाभ हुआ है।

लीची का रूझान क्यों घटा

तीन दशक पूर्व कांगड़ा में लीची की प्लांटेशन ने जोर पकड़ा था और बहुत से क्षेत्रों में लीची की बेहतरीन पैदावार ने अन्य लोगों को भी प्लांटेशन के लिए उत्साहित किया। सामान्यतः लीची अच्छे भाव भी देती रही है, पर आज किसान, बागबान लीची के अलावा सेब व कीवी को प्राथमिकता दे रहे हैं।  ऐसा समय के साथ व कम समय व कम भूमि में अधिक पौधे लगाने की तकनीक के कारण हो रहा है। दूसरा किसान व बागबान समय के साथ नई वैरायटी को भी तरजीह देने लगे हैं। विभाग का दावा है कि इस वर्ष भी करीब 150 हेक्टेयर भूमि पर लीची लगाने को पौधे दिए जा रहे हैं। लोगों की ओर से मांग भी की गई है।

राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने लगे थे नूरपुर के फल, पर…

कांगड़ा जिला के नूरपुर का आम, किन्नू और नींबू एक समय में राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने लगा था, पर जिस रफ्तार से काम शुरू हुआ था, उस तरह से बढ़ नहीं पाया। ऐसे ही हाल सेब व अन्य फलदारों फसलों का न हो, इसके लिए भी सरकार को सोचना होगा।

ऊना में ड्रैगन फ्रूट बेर-कीवी डिमांड में

बागबानी विभाग ऊना के उपनिदेशक सुभाषचंद बताते हैं कि बागबानों को प्रोत्साहित करने के लिए विभाग हर प्रकार से उनकी सहायता करता है, चाहे वह अनुदान हो या फील्ड विजिट। अगर बागबानों को कोई समस्या आती है, तो फील्ड में तैनात कर्मचारी उनके बागीचों का निरीक्षण करके उचित हल बताते हैं। बागबानों को प्रशिक्षण भी विभाग द्वारा दिया जाता है, ताकि वे अच्छी तरह प्रशिक्षित हो सकें।

नकदी फसल के तौर पर देखा जाए, तो ऊना जिला में सेब की खेती न के बराबर है, लेकिन शौकिया तौर पर कई बागबानों ने सेब अपने बागीचे में लगाया है। इसके तहत जिलाभर में करीब चार हेक्टेयर क्षेत्र में सेब की खेती किचन गार्डन के रूप में की जा रही है, जिसमें सेब की अन्ना, माइकल, हरमन-99 व गोल्डन डोरसेट किस्म शामिल हैं। हरोली के गांव सलोह और अंब में बागबानों ने 20 से 25 पौधों का एक-एक बागीचा तैयार किया है, जिसमें फल भी लगते हैं, लेकिन ये फल ज्यादा समय तक टिकते नहीं हैं और इनके स्वाद में भी काफी अंतर होता है। ऊना के बागबान सियाकत अली ड्रैगन फू्रट की खेती कर रहे हैं, जो कि जिला में एक नया प्रयोग है। अंब के आदर्श नगर के रहने वाले सियाकत अली ने एक हजार पौधा ड्रैगन फ्रूट का लगाया है। इसके अलावा कुछ किसानों ने बेर व कीवी की खेती करने में भी रूझान दिखाया है।

नेबा प्लांटेशन में टिश्यू कल्चर से तैयार हो रहे सेब के पौधे

कांगड़ा जिला के तहत भवारना की गोपालपुर पंचायत में स्थित नेबा प्लांटेशन में टिश्यू कल्चर से सेब के पौधों की नर्सरी तैयार हो रही है। लैब से नर्सरी तक लगभग अढ़ाई वर्ष तक इन पौधों की देखभाल करने के बाद नेबा प्लांटेशन पौधे बागबानों को बेच देता है। एक से दो वर्ष के भीतर यह पौधा फल देने लगता है। हिमाचल प्रदेश में कुल्लू, किन्नौर, शिमला, सोलन, सिरमौर में लगभग अठारह प्रकार की प्रजातियों पिक लेडी, ग्रेनी स्मिथ, गेल गाला, रेड लम गाला, रेड चीफ, सुपर चीफ, स्कॉलेट स्पर-2, रेड बिलोक्स, ज़ेरोमाइन, ओरेगन स्पर-2, टॉप रेड, वांस डलियस, स्कॉलेट गाला, रेड फ्यूजी, अर्ली फ्यूजी, मौलिस और वाशिंगटन का ठंडे इलाकों के बागबान लाभ उठा रहे हैं। गर्म इलाकों कांगड़ा, ऊना, हमीरपुर, बिलासपुर, मंडी, चंबा के बागबान अन्ना और डोरसेट गोल्ड प्रजातियों का लाभ उठा रहे हैं।

सेब भर रहा अच्छी खासी जेब

निचले हिमाचल में उत्तम किस्म के सेब तैयार किए जा रहे हैं, जिसमें अन्ना, डोरसेट, गोल्डन किस्मों का सेब जून के शुरुआत में ही तैयार हो जाता है, जिससे निचले हिमाचल के सेब को बाजार में ही सौ से 150 रुपए तक के अच्छे दाम मिल रहे हैं। इतना ही नहीं यहां के ग्रामीण क्षेत्रों में तैयार होने वाले सेबों को उसी समय खरीददार भी मिल जा रहे हैं, जबकि स्थानीय मार्केट में पहुंचकर भी बागबानों को अच्छे दाम मिल रहे हैं।

ऐसे आएगा बड़ा बदलाव

निचले हिमाचल के किसानों ने जिस तरह बागबानी के क्षेत्र में रुचि दिखाने शुरू की है, उस लिहाज से सरकार व बागबानी विभाग बागबान के खेत तक पहुंचे और बड़ी व महत्त्वपूर्ण योजनाओं को धरातल तक पहुंचाए, तो एक दशक में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। इतना ही नहीं, निचला हिमाचल फलों व उनसे तैयार होने वाले जूस व अन्य उत्पादों को भी देश भर में पहुंचाने वाला बड़ा केंद्र बन सकता है।

अपने और अपनों के लिए रोजगार

पढ़े-लिखे युवा भी बागबानी में दिलचस्पी दिखा रहे हैं। वर्षों से बंजर ज़मीनों पर भी बड़े स्तर पर बागबानी करने के लिए बागीचे तैयार किए जा रहे हैं, जिससे उनका स्वरोजगार चले, साथ ही वे गांव सहित आसपास के क्षेत्रों के युवाओं व लोगों के लिए रोजगार भी तैयार कर रहे हैं, जिससे अब निचले हिमाचल में बागबानी के क्षेत्र में बड़े कारोबार की संभावना देखने को मिल रही है, जिसे प्रगतिशील बागबान अब खुशी-खुशी अपनाने लगे हैं।

बागबानी में पूर्व सैनिक कर रहे कमाल

निचले हिमाचल में बागबानी को बढ़ाने के लिए वीरभूमि कहे जाने वाले हिमाचल के पूर्व सैनिक भी अहम भूमिका निभा रहे हैं। आर्मी से सेवानिवृत्ति के बाद बड़ी संख्या में कांगड़ा, हमीरपुर, ऊना व चंबा के फौजी भाई अपने ग्रामीण क्षेत्रों में नए उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। बड़े स्तर पर बागबानी करते हुए वे अपने व अपने परिवार के लिए कारोबार तैयार कर रहे हैं, जिससे गांव के अन्य युवा व लोग भी प्रेरित हो रहे हैं।

कुछ हटकर कर रहे बागबान

हिमाचल के बागबान अब कुछ हटकर कार्य कर रहे हैं। लो चिलिंग वैरायटी को मैदानी व अधिक गर्मी वाले क्षेत्रों में सुचारू और व्यवस्थित तरीके से किया जा रहा है। इसी कड़ी में यहां के बागबान अंग्रेजी खाद का प्रयोग करने की बजाय जैविक खाद तैयार करने की अनूठी मुहिम चला रहे हैं। इसमें प्राकृतिक पदार्थों व देसी गाय के गोबर व गोमुत्र से ही खाद तैयार की जा रही है। उसी खाद को सेब, कीवी व अन्य फलों की पैदावार तैयार करने से की जा रही है।  कांगड़ा, ऊना, हमीरपुर, बिलासपुर आदि निचले जिलों में सैकड़ों कनाल भूमि पर सेब के बागीचे तैयार किए जा रहे हैं। दिसंबर से फरवरी के बीच लगाए जाने वाले पौधों के लिए अभी से बागबानी विभाग के ब्लॉक अधिकारियों के पास डिमांड शुरू हो गई है। वर्ष 2020 की बात करें, तो निचले हिमाचल में सेब की अच्छी फसल हुई है और दाम भी 120 से 150 रुपए तक मिले हैं। अब सेब के बागबान बागीचे के साथ-साथ नर्सरी भी तैयार करने लगे हैं। बागबान दिलचस्पी दिखाकर सेब, कीवी सहित अन्य बागबानी कर रहे हैं। इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यहां के लोग अपनी जैविक खाद भी तैयार कर रहे हैं।

गर्म इलाके में सेब उगाने के लिए बागबानी विभाग और विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों के प्रयास सराहनीय हैं। वैज्ञानिकों के नए प्रयोगों के कारण ही यह काम बढ़ा है। बिलासपुर के हरिमन को भी सेब उत्पादन का श्रेय न देना बेईमानी होगा, उनके प्रयास सराहनीय हैं। बागबानी का काम मोटिवेशन से भी अधिक होता है               —संजय गुप्ता, जिला उद्यान अधिकारी, कांगड़ा

ऐसा करे सरकार

कोरोना काल में पहाड़ी राज्य हिमाचल के हजारों युवा बेरोजगार हो चुके हैं। रोजगार की राह ताक रहे हैं। ऐसे हालात में प्रदेश सरकार को चाहिए कि वह  बागबानी व कृषि विभाग को भी आईपीएच व पीडब्ल्यूडी विभाग की तरह ही देखे। विभाग में फील्ड अधिकारियों एवं कर्मचारियों की संख्या बढ़ाकर इसका स्टे्रंथन किया जाए। मात्र एक उद्यान अधिकारी के पास 50 से 74 पंचायातें होती हैं। ऐसे में वह कहां और किस बागबान के बागीचे तक पहुंच पाएगा, यह बड़ा सवाल है।

स्टोन फ्रूट के लिए अच्छा है हमीरपुर का टेंप्रेचर

ज्यादातर ऊंचाई वाले और ठंडे क्षेत्रों में तैयार होने वाला सेब अब हमीरपुर जैसे गर्म इलाकों में भी नजर आने लगा है। लोगों द्वारा शौकिया तौर पर तैयार किए जा रहे इस फल की सक्सेस रेट तो अभी फिलहाल ज्यादा नहीं है, लेकिन फिर भी काफी जगह लोग इसे अपने घरों के आसपास लगाने लगे हैं। सेब की जो वैरायटी हमीरपुर में तैयार की जा रही है बागबानी विभाग उसे अन्ना वैरायटी बता रहा है। स्वाद और मिठास में यह वैरायटी ठंडे क्षेत्रों में तैयार होने वाले सेब की अपेक्षा काफी भिन्न है। जिला हमीरपुर में वैसे तो पांच से सात सेब के पौधे बहुत जगह लोगों ने लगा रखे हैं, लेकिन कुछ जगह ऐसी भी हैं, जहां 200 से 300 तक सेब के पौधे तैयार किए गए हैं। इनमें भोरंज का सेऊ और हमीरपुर का गसोता, बड़सर की मैड़ और नादौन का गलोड़ शामिल है। बागबानी विभाग की मानें, तो सेब की फसल के लिए मिनिमम टेंप्रेचर सात डिग्री होना चाहिए। हमीरपुर में सर्दियों का अधिकतर तापमान 20 और गर्मियों में 40 डिग्री के आसपास रहता है। हालांकि स्टोन फ्रूट के लिए यहां का तापमान काफी अच्छा है। यहां ज्यादातर आम, लीची, आड़ू और नींबू प्रजाति संतरा, किन्नू, मालटा, नींबू और गलगल के फलों की पैदावार की जाती है, लेकिन पिछले कुछ समय से यहां अनार, नाशपाती, पलम, जामुन और कटहल की डिमांड भी ज्यादा होने लगी है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार हमीरपुर में लगभग 1000 हेक्टेयर में आम, 100 हेक्टेयर में लीची, 250 हेक्टेयर में कटहल और करीब 300 हेक्टेयर जमीन में गलगल तैयार किया जा रहा है।

बिलासपुर की प्रचंड गर्मी में भी चमक रहा सेब

बिलासपुर जिला के प्रचंड गर्म मौसम में भी अब सेब की पैदावार होने लगी है। जिला भर के कई बागबानों के प्रयास सराहनीय रहे हैं। हालांकि अभी तक जिला बिलासपुर के बागबान इसे व्यावसायिक तौर पर प्रयोग नहीं कर पाए हैं, लेकिन जिन भी बागबानों ने सेब के प्लांट लगाए हैं, उनमें से अधिकतर बागबानों ने बेहतर पैदावार की है। जिला बिलासपुर में बागबान ज्यादातर दो किस्मों अन्ना, डाट सेट गोल्डन के अलावा एचएमआर-99 किस्म के सेब के पेड़ लगा रहे हैं। जिन बागबानों ने सेब के पौधे लगाए हैं, उनमें बेहतर पैदावार हो रही है, लेकिन अभी तक इसे प्रारंभिक चरण ही कह सकते हैं। विभागीय अधिकारियों की मानें, तो जिला बिलासपुर में सेब की फसल ज्यादा समय नहीं रहती है, जबकि ऊपरी हिमाचल का सेब करीब एक माह तक का समय पूरा कर लेता है। यहां का सेब महज दस दिन तक ही टिक पाता है। इसके बाद सेब के खराब होने की संभावना ज्यादा बन जाती है। सेब की फसल के लिए ठंडे मौसम की आवश्यकता होती है, जो कि ऊपरी हिमाचल के बागवानों को ही मिल पाता है। यहां पर सेब की लो चीलिंग वैरायटी का ही ज्यादातर प्रयोग किया जाता है। जिला बिलासपुर में कई बागबानों ने 150 से 200 पौधे भी लगाए हैं। करीब 40 हजार तक सेब की फसल बेच  भी रहे हैं, लेकिन ये बागबान शौकीया तौर पर ही सेब उगा रहे हैं। व्यावसायिक तौर पर बागबान इसे नहीं अपना पा रहे हैं, लेकिन सरकार की ओर से इन बागबानों को और अधिक सुविधा प्रदान की जाए, तो हो सकता है कि ये बागबान इसे व्यावसायिक तौर पर भी अपना लें।

आम-पपीता-माल्टा भी ठीकठाक

बिलासपुर जिला में सेब के अलावा आम, पपीता, लीची, संतरा, किन्नू, मालटा सहित अन्य फलों की बेहतर पैदावार होती है, जिसका लाभ बागबानों को मिल रहा है। सेब की फसल को यदि छोड़ दिया जाए, तो अन्य फलों को बेहतर मार्केटिंग की सुविधा नहीं मिल पाती, जिसके चलते बागबानों को निराशा ही झेलनी पड़ती है।

सरकार बागबानों को प्रोत्साहित कर रही है। सरकारी योजना का लाभ बागबान उठा सकते हैं। बिलासपुर में कई बागबान सेब उगा रहे हैं, लेकिन वैरायटी हल्की होने के चलते इन बागबानों को कोई खासा लाभ नहीं मिल पा रहा है

— विनोद शर्मा, उपनिदेशक उद्यान विभाग, बिलासपुर

सरकार की ओर से बागबानों को सेब की फसल को लेकर कोई खास प्रोत्साहित नहीं किया जा रहा है। यदि सरकार की ओर से बागबानों को सुविधा मुहैया करवाई जाए, तो यहां के किसान सेब को व्यावसायिक तौर पर भी अपना सकते हैं। सरकार बागबानों की समस्याओं के लिए भी उचित कदम उठाए

 —हरिमन शर्मा, प्रगतिशील बागबान

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