Tuesday, December 07, 2021 04:33 AM

क्रिकेट नहीं, बदला चाहिए

क्रिकेट का रोमांच जरूरी है अथवा आतंकियों से बदला लेना अनिवार्य और अहम है। देश के गांव-घरों में तिरंगे में लिपटे ताबूत आ रहे हैं और हम क्रिकेट के चौके-छक्कों पर तालियां बजाएं! एक पूरी पीढ़ी और वर्ग का खून खौल रहा है। देश भर में आक्रोश महसूस किया जा रहा है। घरों के चिराग बुझ रहे हैं और सुहागिनों की मांग सूनी हो रही है। ऐसे माहौल में हम पाकिस्तान के साथ टी-20 का मैच खेलें! एक ही दिन में हज़ारों ट्वीट देख-पढ़ कर सवाल पैदा होता है कि ना’पाक आतंकी देश पाकिस्तान के साथ भारत का मैच खेलना क्या मज़बूरी है? क्यों न मुहिम चलाई जाए कि समूचा क्रिकेट संसार ही पाकिस्तान की क्रिकेट पर पाबंदियां थोप दे? क्यों न ना’पाक देश का बहिष्कार किया जाए? क्या अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) के कायदे-कानूनों से हम इतने बंधे हैं कि भारत के रणबांकुरों की शहादत को भी नजरअंदाज़ कर दें? क्या आईसीसी भारतीय क्रिकेट टीम को दंडित कर सकती है? तो फिर राजस्व का क्या होगा? आईसीसी को 90 फीसदी पैसा भारतीय क्रिकेट बोर्ड (बीसीसीआई) और प्रचार करने  वाली भारतीय कंपनियां ही मुहैया कराती हैं। यदि बीसीसीआई के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी और खेल नहीं होगा, तो भारतीय कंपनियां विज्ञापन और प्रायोजन के जरिए करोड़ों रुपए क्यों मुहैया कराएंगी? हम पाकिस्तान की फितरत से आजिज आ चुके हैं। समूचा विश्व जानता है कि पाकिस्तान आतंकवाद और आतंकियों की पनाहगाह है। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ही आतंकियों को फंडिंग करती है और फिर जम्मू-कश्मीर मंे आतंकी हमलों की साजि़शें रचती है। पाकिस्तान की फितरत ही भारत के प्रति नफरत पर टिकी है। क्रिकेट खेलने वाले देशों के सामने यह सवाल रखा जाना चाहिए कि इंग्लैंड और न्यूज़ीलैंड की टीमों ने पाकिस्तान में खेलने से इंकार क्यों किया था और वे वापस अपने देश चली गई थीं? श्रीलंका तो पाकिस्तान का पड़ोसी देश है।

 उसने पाकिस्तान के साथ क्रिकेट खेलने को खारिज क्यों किया? क्या क्रिकेट और आतंकवाद दोनों साथ-साथ चल सकते हैं? बेशक टी-20 विश्व कप की शुरुआत हो चुकी है। मेजबानी भारत कर रहा है, लेकिन मैच संयुक्त अरब अमीरात और ओमान में खेले जाने हैं। यह निर्णय कोरोना वायरस के चरम काल के दौरान लिया गया था। 24 अक्तूबर को भारत-पाकिस्तान मंे मैच होना है, जिसकी उत्तेजना अभी से महसूस की जा रही है। विश्व कप के दौरान शेष देश आपस में जरूर खेलें और अमन-चैन, भाईचारे और दोस्ती की मिसालें कायम करें, लेकिन आतंकिस्तान पाकिस्तान पर सभी देशों को बैन लगा देना चाहिए। विश्व कप में बिखराव बिल्कुल भी नहीं होगा। बीसीसीआई को आईसीसी और अन्य क्रिकेट देशों को आश्वस्त करना है कि पाकिस्तान के साथ खेलना इंसानियत के खिलाफ और दहशतगर्दी के समर्थन में खेलने बराबर होगा। पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (पीसीबी) वैसे ही दिवालियापन के हालात में रहता है। उसके चेयरमैन रमीज राजा ने ही सार्वजनिक बयान दिया है-‘प्रधानमंत्री मोदी जब चाहें, तब पीसीबी को बर्बाद कर सकते हैं। भारतीय कंपनियों के पैसे से ही पीसीबी चलता है।’ आईसीसी को भी यह सोचने पर बाध्य करना चाहिए कि टीम इंडिया नहीं होगी, तो पैसा कहां से आएगा? दरअसल हमारी पैरोकारी और दलीलें मानवीय हैं। सिर्फ जम्मू-कश्मीर में ही बीते दिनों में आतंकियों ने 12 जवानों और नागरिकों की हत्याएं की हैं। गैर-कश्मीरी प्रवासी मजदूरों को निशाना बनाया जा रहा है। विश्व कप के मैच में खेलना ही क्या मजबूरी है? घर के बाहर जब सैनिक और जवान का ताबूत पहुंचता है, तो आत्मा चीत्कार कर उठती है। शहीद के रोते-बिलखते परिजन यही बोल पाते हैं-बदला चाहिए। क्या उन चीत्कारों को नकार कर क्रिकेट मैच देखा जा सकता है? यह निर्णय भारत सरकार के खेल मंत्रालय और बीसीसीआई को मिलकर लेना है।