Sunday, July 25, 2021 09:11 AM

अब कोरोना का टीका मुफ्त

दिल्ली बैठकों का जाम पीकर हिमाचल कितने नशे में आता है, यह देखने की बात है, लेकिन हम कह सकते हैं कि मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के हाथ में फिर कुछ इबारतें खिंच गईं। कोरोना काल की बैठक में यूं तो किस्सा महामारी से वैक्सीन की भरपूर आपूर्ति का ही होना चाहिए, लेकिन यहां तैयारियों की मशक्कत में अगले साल का चुनाव फंसा है। हमें डबल इंजन के वादों पर अब दिल्ली दौरों का सूत्रधार बनना है, लिहाजा मुख्यमंत्री के पास अब हमेशा दिल्ली का खत होगा। खत में खुशखबरी, खत में खुशहाली और खत में ही अगले चुनाव की रखवाली होगी। दिल्ली की मुलाकातें फिर से लिखी जाएंगी, यह समुद्र के रास्ते हैं गहरे तो दिखाई देंगे ही। इसलिए जब मुख्यमंत्री देश के गृहमंत्री से मिलते हैं, तो मंत्रालय से कहीं हटकर ‘चुनावालय’ कर मौसम रहता है। बहरहाल अगर यही बरसात है, तो हम वर्षों के सूखे को मिटाना चाहेंगे। ऐसा नहीं कि कोई सूखा रहा नहीं और ऐसा भी नहीं कि इससे पहले बारिश हुई नहीं। प्रदेश जानता है कि जिन नेशनल हाई-वे और फोरलेन के निर्माण को गति देने के लिए मुख्यमंत्री केंद्रीय मंत्री नितिन गड़करी से मिले, वे भी कभी बरसात के मानिंद बरसे थे।

 शायद घोषणाओं का पुराना पानी बह गया होगा। तब कांग्रेसी मंत्री जीएस बाली और गडकरी के बीच पींगें दिखाई दी थीं व उम्मीद भी जागी थी कि हिमाचल अब फर्राटे से इन्हीं रास्तों पर दौड़ेगा, लेकिन घोषणाओं की कब्र पर भी घंघरू कभी शांत नहीं होते तो पिछला एक दशक यही सुनने को आतुर रहा कि कब शिमला-धर्मशाला और पठानकोट-मंडी फोरलेन सहित वे तमाम राष्ट्रीय उच्च मार्ग हमसे हमारी बैसाखियां छीन लेंगे। उम्मीद करनी चाहिए कि कोरोना काल के पन्नों पर हिमाचल का एक नया मान चित्र उभरेगा और जहां हर केंद्रीय मंत्री कुछ न कुछ उकेर देगा। इसलिए केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर का सवाल अहमियत रखता है कि आखिर ऊना के पीजीआई सेटेलाइट सेंटर के पत्थर आज तक शिलालेख क्यों नहीं बने। क्यों ऐसी महत्त्वाकांक्षी परियोजनाएं चुनाव के आसपास ही फड़फड़ाती हैं और आखिर इन्हीं उड़ारियों में मतदाता भी उड़ जाता है।

 हो सकता है कल अनुराग ठाकुर फिर विकास की झाडि़यों के कान पकड़ कर केंद्रीय विश्वविद्यालय को खींच लाएं और तब हम समझें कि इस बार स्थायी कुलपति की तलाश से पहले, परियोजना के नाम पर अब तक गले से लटके तमाम सूखे फूल फिर से खिल जाएं। खैर हिमाचल की किस्मत कहें या हमारा दस्तूर कि हर बार केंद्र के भरोसे दौड़ते अरमानों को हमने डबल इंजन बनाने की कोशिश की। हर बड़े प्रधानमंत्री ने हिमाचल से नाता जोड़ा, लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी की यादें कुल्लू व लाहुल-स्पीति को चिन्हित करती रहेंगी। वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंडी की छात्रा से दो दिन पहले ही सेपु बड़ी का हाल पूछा है तो यही खत सोलन के एक बच्चे से भी सीधा संवाद करता है। ऐसे अनेक अवसर आए जब प्रधानमंत्री ने हिमाचल से मुलाकात का नजरिया भी ब्रांड बनाया और इससे सम्मोहन से छवि तक इजाफा हुआ। देश अगर हमें समन्वित विकास के शिखर पर बैठाता है या एनीमिया नियंत्रण में हमें तमगे मिलते हैं, तो शिरोधार्य होते कर्ज को उतारना भी पड़ेगा। बहरहाल मुख्यमंत्री की दिल्ली मुलाकातों का एक सफर है, जिसे कमतर नहीं आंका जा सकता। दो सौ करोड़ का इथेनॉल संयंत्र या साठ करोड़ के स्टेट ऑफ आर्ट मार्डन अस्पताल की पेशकश में कृतज्ञ हिमाचल को ताली बजानी होगी। कौन नहीं चाहेगा कि हर बार मुख्यमंत्री दिल्ली जाएं और सारे हिमाचली ताली बजाएं। कई हाथ आज भी कुछ पाने और फिर ताली बजाने के लिए आतुर हैं। कुछ पद आज भी रिक्त रहने की सजा भुगत रहे हैं, जबकि कुछ चेहरे पाने की अभिलाषा में अपनी राजनीति के उपहार ग्रहण करने के लिए कदमताल कर रहे हैं। क्या कुछ ऐसा भी होगा, यही असली पिटारा है जो आसानी से नहीं खुल रहा।

प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन में घोषणा की है कि 21 जून से सभी देशवासियों को कोरोना टीका मुफ़्त मिलेगा। इसमें 18 साल की उम्र और उससे अधिक वाले सभी नागरिक शामिल होंगे। एक बार फिर टीकाकरण अभियान का दायित्व भारत सरकार पर आ गया है। केंद्र सरकार राज्यों को निःशुल्क टीका मुहैया कराएगी। राज्य सरकारें टीकाकरण को अंजाम देंगी और निगरानी रखेंगी। अब टीके की किल्लत और केंद्र के सौतेले व्यवहार सरीखी विपक्ष की चिल्ल-पौं शांत हो सकती है, लेकिन सियासत की नई भाषा गढ़ ली जाएगी। भारत सरकार के सामने गंभीर चुनौती यह होगी कि उसे टीकों का पर्याप्त बंदोबस्त करना है, ताकि देश के किसी भी राज्य में कोरोना के लिए ‘संजीवनी’ देने का काम अवरुद्ध न हो। टीकों का उत्पादन सीमित है। कंपनियां किस स्तर तक उत्पादन में बढ़ोतरी कर पाती हैं, यह जुलाई-अगस्त में स्पष्ट हो जाना चाहिए। प्रधानमंत्री ने टीकों की उपलब्धता को लेकर आश्वस्त किया है। बहरहाल एक कहावत याद आ रही है-‘लौट के बुद्धू, घर को आए।’ विपक्ष के ही कुछ मुख्यमंत्रियों ने सवाल उठाए थे कि टीकाकरण केंद्र सरकार के ही कब्जे में क्यों रहे? राज्यों को भी अपनी टीका-नीति तय करने का अधिकार है, क्योंकि संविधान में स्वास्थ्य को राज्य का विषय तय किया गया था।

 राज्यों को अधिकार दिए जाएं कि वे सीधा टीका कंपनियों से खरीद करें और वितरण कर सकें। इसी आशय का पत्र कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने 8 अप्रैल को प्रधानमंत्री को लिखा था। साफ  था कि मंशा टीकाकरण के विकेंद्रीकरण की थी। प्रधानमंत्री के संबोधन में भी इसका उल्लेख है। हालांकि अभी तक तमाम टीकाकरण कार्यक्रम केंद्र के नेतृत्व में ही संचालित होते रहे हैं और राज्यों की सहयोगी भूमिका रही है। बहरहाल संघीय ढांचे के विमर्श के तहत 18-44 आयु-वर्ग के नागरिकों के टीकाकरण का जिम्मा राज्य सरकारों को सौंपा गया। अभियान 1 मई से शुरू हुआ और जून में जब प्रधानमंत्री देश को संबोधित कर रहे थे, उससे  पहले ही विकेंद्रीकरण की सियासत की हवा निकल चुकी थी। भारत में टीकों के उत्पादन और उपलब्धता की सच्चाई सभी मुख्यमंत्रियों के सामने थी। भारत सरकार का कोटा 50 फीसदी और राज्यों-निजी अस्पतालों का 25-25 फीसदी तय किया गया। बहरहाल 12 राज्य सरकारों और 2 नगरनिगमों ने ग्लोबल टेंडर जारी किए, लेकिन न तो एक भी टीका आना था और न ही आया। विश्व की बड़ी टीका कंपनियों ने राज्य सरकारों के साथ करार और कारोबार करने से ही साफ इंकार कर दिया। राज्य सरकारों को हैसियत का आभास हो गया। प्रधानमंत्री को कोसने से न तो टीकाकरण चल सकता है और न ही राज्य खुदमुख्तार हो सकते हैं। हरेक काम की एक तय प्रक्रिया और प्रणाली होती है। हारकर ओडिशा, केरल, झारखंड आदि राज्यों के मुख्यमंत्रियों को गुहार करनी पड़ी कि टीकों की खरीद भारत सरकार ही देखे। वह ही टीकाकरण को आगे बढ़ाए और राज्यों को अभियान के साथ जोड़े। राज्य लोगों को टीका लगाने का काम कर सकते हैं। निर्णय पलटी का वक्त आ गया।

 पता नहीं, विकेंद्रीकरण का शोर कहां गायब हो गया? भारत सरकार अपने कोटे में से, खासकर 45 पार वाले नागरिकों के लिए, पहले भी निःशुल्क खुराकें राज्य सरकारों को मुहैया करवा रही थी और अब भी कराएगी। अब 75 फीसदी खरीद केंद्र सरकार करेगी और 25 फीसदी अस्पतालों का कोटा यथावत रखा गया है। अस्पताल 150 रुपए से ज्यादा सर्विस चार्ज नहीं वसूल सकेंगे। बुनियादी फर्क यह होगा कि कोरोना टीकों पर राज्यों को कुछ भी खर्च नहीं करना पड़ेगा। विपक्ष अपने गिरेबां में भी झांक कर नहीं देखेगा कि विकेंद्रीकरण पर कैसी बहस छेड़ी गई थी। भ्रम और अफवाहों को फैलाया गया था। भोले-भाले लोगों के साथ खिलवाड़ किया गया था। बेशक देश ने देखा होगा और अब नई नीति को सुन लिया होगा। सियासत अब भी जारी रहेगी, क्योंकि श्रेय लूटने की बारी है। सवाल शुरू हो गए हैं कि केंद्र को टीकाकरण नीति क्यों बदलनी पड़ी? संभव है कि सरकार पर सर्वोच्च न्यायालय की फटकार और टिप्पणियों का दबाव रहा होगा! सरकार को टीकाकरण नीति, टीकों की खरीद और भुगतान, टीकों की आपूर्ति आदि की दस्तावेजी जानकारियां शीर्ष अदालत को देनी हैं। अब बुनियादी और अहम सवाल टीकों की उपलब्धता का है। विदेशी कंपनियों में फाइज़र, मॉडर्ना, जॉनसन आदि से भारत सरकार की बातचीत हुई है। जब उनका टीका भारत में आएगा, तभी कुछ कहा जा सकता है। शेष यथार्थ देश के सामने है। फिलहाल प्रधानमंत्री की घोषणा पर उम्मीद रखनी चाहिए।