Tuesday, December 07, 2021 05:58 AM

आंदोलन के रूट पर

परिवहन निगम के कर्मचारी अब आंदोलन की राह पर अपने वित्तीय अधिकारों का हिसाब करेंगे। एचआरटीसी संयुक्त समन्वय समिति ने 18 अक्तूबर की तारीख चुनते हुए न केवल एक दिन की पूर्ण हड़ताल की घोषणा की, बल्कि सरकार के समक्ष अपनी मांगों का पिटारा खोला है। कर्मचारी हितों की पैरवी में परिवहन कर्मियों का दर्द समझा जा सकता है, लेकिन आचार संहिता के बीचोंबीच हड़ताल की नुमाइश सजा देने का अर्थ तो यही है कि इसका संदेश उपचुनावों की पड़ताल करे। यानी एक मुद्दा भले ही दूर से फंेका जा रहा हो, लेकिन इसके मायने वर्तमान सत्ता को परेशान करने के हैं, इसमें दो राय नहीं। परिवहन निगम कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लगभग 582 करोड़ का भुगतान लंबित है और इस तरह हड़ताल का डंका पीट-पीट कर जो बताया जाएगा, उससे समस्त कर्मचारी वर्ग का एहसास जागृत होगा। यह मसला सार्वजनिक क्षेत्र के एक निगम के संचालन से भी जुड़ा है और यह भी कि घाटे की व्यवस्था को ढोना कितना घातक हो सकता है। हिमाचल प्रदेश परिवहन निगम के खाते में 1533 करोड़ का घाटा इसकी तकदीर नहीं बदल सकता और न ही कोरोना काल के जख्म यूं ही धुल जाएंगे। सरकारी बसों के कुल 2514 रूटों में से अगर 2463 घाटे में चल रहे हों, तो दोष सरकार का मानंे या कर्मचारियों की मेहनत पर शक करें।

 जाहिर तौर पर बढ़ते घाटे पर नकेल नहीं कसी तो वित्तीय कतरब्यौंत में साधारण कर्मचारी ही पीसा जाएगा, जबकि इसके विपरीत परिवहन निगम में पसरी अफसरशाही के नखरों का बोझ भी घाटा बढ़ा रहा है। परिवहन निगम के करीब 29 डिपुओं की क्षमता का मूल्यांकन, उनकी कमाई और खर्च के आधार पर होना चाहिए, लेकिन यहां तो राजनीतिक प्रभाव और दबाव का राज चलता है। यहां फौरी तौर पर परिवहन निगम के लिए अपने कर्मियों के मसलों का हल तो शायद हो भी जाएगा, लेकिन उसकी अपनी सेहत का कोई भी हल निकालना मुश्किल होता जा रहा है। यह स्थिति अगर प्रदेश के ग्यारह बोर्ड एवं निगमों की है, तो वित्तीय सुधारों की गुंजाइश बढ़ जाती है। परिवहन निगम कर्मियों की हड़ताल से जुड़ी वित्तीय अनियमितताएं का हवाला ऐसा तर्क नहीं कि इसे अनसुलझा छोड़ दिया जाए। पहले ही पीस मील वर्कर अपनी व्यथा को आक्रोशित करते रहे हैं और अब समस्त कर्मचारी वित्तीय अधिकारों की मांगों को लेकर आंदोलन का रूट पकड़ रहे हैं। परिवहन कर्मी अपने अधिकारों की खुशी के लिए निजी क्षेत्र के खिलाफ भी हल्ला बोल रहे हैं, जबकि मसला दो तरह की व्यवस्थाओं को समझने का भी है। इसके मुकाबले निजी बसों का संचालन पूर्ण व्यावसायिक होने के साथ-साथ घाटे को अनियंत्रित होने से बचाता है।

 परिवहन निगम के प्रबंधन में आई गिरावट दूर न हुई या फिजूलखर्ची से अलाभकारी होती सरकारी बसों की मिलकीयत को सक्षम न बनाया गया, तो आज का सोलह सौ करोड़ का घाटा आगे चलकर और कमर तोड़ेगा। परिवहन सेवाओं का अधिकतम राष्ट्रीयकरण राज्य की वित्तीय सेहत के लिए ठीक नहीं। इसी के साथ निजी बस संचालन को तिरस्कृत करके जनापेक्षाएं पूरी नहीं होंगी। क्या सरकार परिवहन कर्मियों की जायज मांगों का निपटारा करते हुए यह विचार करेगी कि एचआरटीसी को सफेद हाथी बनने से किस प्रकार रोका जा सकता है। क्या परिवहन निगम अपने डिपुओं की आधी संख्या करते हुए उच्च स्तरीय प्रबंधन को किफायती बनाने में सक्षम होगा या सियासी आपूर्ति में सरकारी बसों पर सत्ता के इश्तिहार ही चस्पां होते रहेेंगे। बहरहाल अगले सोमवार अगर सरकारी बसें नहीं चलती हैं, तो यह सत्ता के लिए परेशानी का सबब हो सकता है। परिवहन सेवाओं का कोई नकारात्मक पक्ष चार उपचुनावों के तहत बीस विधानसभा क्षेत्रों के लिए शुभ संकेत नहीं होगा। ऐसे में उपचुनावों में कर्मचारी आक्रोश का बिगुल बज गया है और अगर इसके समर्थन या अपनी-अपनी वेदना का इजहार करते अन्य विभागीय कर्मी भी कूद जाते हैं, तो यह अप्रत्याशित मुद्दा बन जाएगा।