Sunday, May 09, 2021 07:16 PM

कोरोना काल में अन्य बीमारियां

हिमाचल में बीते दिनों चार नगर निगमों के चुनावों के जो परिणाम आए हैं, उनसे 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव के बारे में लोगों के मन का अंदाजा लगाया जा सकता है। चार नगर निगमों में जहां दो नगर निगम एक पार्टी ने जीते, जबकि मुख्यमंत्री के अपने गृह जिले में ही सत्ताधारी पार्टी कामयाब हो सकी। सबसे रोचक परिणाम धर्मशाला नगर निगम के रहे जिसमें महापौर बनाने के लिए निर्दलीयों की भूमिका अहम रहेगी। शायद कुछ ही समय में होने वाले फतेहपुर और मंडी के उपचुनाव से तस्वीर और भी ज्यादा साफ  होती नजर आएगी। चुनावों के दौरान चाहे वह नगर निगम के हों, विधानसभा के या लोकसभा के, उनका आयोजन करवाने की जिम्मेदारी चाहे चुनाव आयोग की रहती है, पर इसमें कोई दो राय नहीं कि चुनावों को शांतिपूर्ण ढंग से सफल बनाने की सबसे अहम भूमिका अर्द्ध सैनिक बलों की रहती है। सेना का एक ऐसा अंग जिसे गृह मंत्रालय जरूरत के अनुसार देश की आंतरिक सुरक्षा के लिहाज से इस्तेमाल करता है। अगर अर्द्ध सैनिक बलों की बात की जाए तो यह एक ऐसा सैन्य हिस्सा है, जो शांति के समय में सीमाओं की रक्षा के साथ-साथ आंतरिक सुरक्षा के लिए जिम्मेदार होता है। दो दशक पहले आई वाजपेयी सरकार, जिसमें आडवाणी जी गृह मंत्री थे, ने अर्द्ध सैनिक बलों की पेंशन बंद करने पर एक अहम फैसला लिया था। जिस तरह भारतीय सेना के हर मुद्दे पर फैसला रक्षा मंत्रालय लेता है, उसी तरह अर्ध सैनिक बल के हर मुद्दे पर फैसला गृह मंत्रालय लेता है।

आंतरिक सुरक्षा के लिए जिम्मेदार गृह मंत्रालय जिस तरह से सेना के इस अंग की नियुक्तियों में निर्णय लेता है, उस पर विचार करने की जरूरत है। पिछले दिनों एक सीनियर रैंक के अधिकारी का वर्तमान गृह मंत्री के साथ डाइनिंग टेबल पर फोटो सोशल मीडिया में काफी चर्चा का विषय बन रहा है। प्रशासनिक अधिकारियों का राजनेताओं के साथ उठना-बैठना तथा उनकी कार का दरवाजा खोलना या चाय की प्याली सर्व करना अक्सर देखा जाता है, पर एक अर्ध सैनिक बल के अधिकारी का यह सब करना नए रिवाज का आगमन है। इसके अलावा एक और चिंता का विषय जिस पर मंथन और तार्किक बहस होना बड़ा जरूरी है, वह यह कि चुनाव के दौरान एक तरफ  तो अर्द्ध सैनिक बल चुनाव को सफल करवाने के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं, पर चुनावों के समय में ही अर्धसैनिक बलों की  शहादत चिंता का विषय है। पिछले लोकसभा  चुनावों से पहले जब ज्यादातर बटालियन चुनावी सुरक्षा की तैयारी में व्यस्त थीं, तब पुलवामा होना तथा अब जब यही सेनाएं पांच राज्यों की चुनावी सुरक्षा में दिन-रात पहरेदारी कर रही हैं, तब नक्सली मुठभेड़ में बीसीयों सैनिकों की शहादत चिंता का विषय है। अभिनंदन और राकेश्वर के मुद्दे पर सरकार जरूर अपनी पीठ थपथपा रही है, पर इन सब घटनाओं पर गंभीरता से सोचना होगा तथा ऐसी घटनाएं भविष्य में न हों, उसके लिए सही रणनीति बनाना अति आवश्यक है। सवाल यह है कि आखिर सैनिक कब तक शहादत देते रहेंगे?

सरकारी अस्पतालों में तैनात डाक्टरों के स्थानांतरण हेतु स्थानीय राजनीतिज्ञ के हस्तक्षेप पर रोक लगानी चाहिए। दवा बनाने वाली फार्मा कंपनियों द्वारा दवाइयों की मनमानी कीमत निश्चित करने पर अंकुश लगाना चाहिए। स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की सख्त जरूरत है...

समाज के व्यापक कल्याण हेतु केन्द्र सरकार व राज्य सरकारों ने स्वास्थ्य क्षेत्र में बहुत से कदम उठाए हैं, ताकि कोई भी व्यक्ति बिना इलाज के अपना जीवन व्यतीत करने के लिए मजबूर न हो पाए। जिला मुख्यालय के अतिरिक्त हर गांव व कस्बे में किसी न किसी प्रकार की स्वास्थ्य संबंधी सुविधा प्रदान करने की कोशिश की गई है। विभिन्न नीतियों के अंतर्गत न केवल स्वास्थ्य सुविधा बल्कि स्वास्थ्य बीमा करने की सुविधा भी उपलब्ध की गई है। इसी के साथ-साथ निजी अस्पतालों को भी मान्यता दी गई है ताकि मरीजों को हर प्रकार का इलाज उपलब्ध हो सके। भारत सरकार ने कई स्कीमें जैसे कि प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना, आयुष्मान भारत स्कीम व आम आदमी बीमा योजना इत्यादि चलाई हैं तथा मरीजों के इलाज के लिए लाखों-करोड़ों रुपए खर्चे जा रहे हैं। इन सबके बावजूद भ्रष्टाचार के सर्वत्र तांडव में आज सरकारी व निजी दोनों अस्पतालों में कई प्रकार के किस्से सुनने को मिलते हैं जिन्हें सुनकर शर्मसार होना पड़ता है। वास्तव में भ्रष्टाचार का रास्ता चिकना व ढलानदार भी है तथा यही कारण है कि इसने शिक्षा व चिकित्सा के क्षेत्र को भी नहीं बख्शा। कोरोना काल की विकट घड़ी में भी कई निजी व सरकारी अस्पतालों में दवाइयों व संबंधित उपकरणों की खरीद में घोटालों की घटनाएं देखने को मिलती रही हैं। कई फार्मा कंपनियां डाक्टरों से मिलीभगत करके घटिया व महंगी दवाइयों का उत्पादन करके मरीजों के जीवन से खिलवाड़ कर रही हैं। डाक्टरों के पास विभिन्न कंपनियों के मेडिकल प्रतिनिधि किसी भी समय मंडराते हुए देखे जा सकते हैं जो कि उनकी मुट्ठी गर्म करते रहते हैं तथा इस सभी का नुक्सान मरीजों को ही उठाना पड़ता है।

सरकार ने कुछ एक जैनरिक दवाइयों का उत्पादन अवश्य किया है, मगर डाक्टर लोग इन दवाइयों को मरीजों द्वारा खरीदे जाने के लिए प्रेरित नहीं करते तथा जिस कंपनी के साथ सांठ-गांठ हो, उसी की दवाई खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है। कई डाक्टर तो इन दवाइयों को खरीदने के लिए मरीजों को इतना मजबूर कर देते हैं कि वे खरीदी गई दवाइयों को उन्हें दिखाने के लिए मजबूर करते रहते हैं। बात यहीं समाप्त नहीं हो जाती, सरकार द्वारा अस्पतालों को उपलब्ध करवाई गई दवाइयां जब वितरित नहीं की जाती तो उन्हें नष्ट करवा दिया जाता है। इसके अतिरिक्त कई बार बिना जरूरत के ही महंगे परीक्षण करवाने के लिए मरीजों को बाध्य कर दिया जाता है। आज अधिकतर सरकारी अस्पतालों की स्थिति इतनी दयनीय बनी हुई है कि विशेषज्ञ डाक्टरों की तैनाती तो कर दी गई है, मगर उनके पास छोटे-मोटे परीक्षण करने की सुविधा भी नहीं है। परिणामस्वरूप मरीजों को पीजीआई या फिर अन्य निजी अस्पतालों के लिए रैफर कर दिया जाता है तथा कई मरीज तो रास्ते में ही दम तोड़ जाते हैं। ऐसी भयावह स्थिति को क्या कहा जाए? क्या यह सरकार की उदासीनता का परिणाम है या फिर संबंधित विभाग के अधिकारियों व राजनीतिज्ञों की सांठ-गांठ का कोई रूप है। बहुत से निजी अस्पतालों के तो बारे ही न्यारे हैं। इनके मालिकों व डाक्टरों को पता है कि कोई भी मरीज उनके पास किसी मजबूरी के कारण ही आता है तथा वे मरीजों के साथ न केवल तानाशाही व्यवहार करते हैं बल्कि उन्हें ऐसी बीमारी का रूप बता दिया जाता है जिसका इलाज शल्य चिकित्सा या फिर महंगी दवाइयों द्वारा ही संभव बताया जाता है। मरीज को पर्ची बनवाने के लिए 200 से 1000 रुपए  तक शुल्क देना पड़ता है तथा उसके बाद भी डाक्टर की मर्जी है कि मरीज को कब और कितनी बार आने के लिए मजबूर करना है। अस्पतालों को चलाने के लिए संबंधित राज्यों की स्वीकार्यता आवश्यक होती है तथा ये लोग किसी न किसी ढंग से अपने अस्पताल को सरकारी स्वीकृति लेने में सफल हो जाते हैं तथा उसके बाद कुछ अस्पताल मरीजों को मनमाने ढंग से लूटने का काम आरंभ कर देते हैं। कुछ ही वर्ष पहले कुछ शीर्ष निजी अस्पतालों की करतूतें सामने आई थीं, जब इन्होंने कुछ गरीब मरीजों के इलाज हेतु बहुत ही ऊंची दरों पर बिल चार्ज किए थे जिसमें पाया गया था कि किस तरह डाक्टरों द्वारा मरीजों के दैनिक परीक्षण तीन-चार बार दर्शा कर उनसे मनमाने ढंग से पैसे वसूल किए गए। विडंबना यह है कि स्वास्थ्य मंत्रालयों के अधिकारी आंखें मूंद कर बैठे रहते हैं तथा वे सुनिश्चित नहीं करते कि गरीब लोगों का शोषण न हो पाए। इस संबंध में मैं कुछ सुझाव प्रस्तुत कर रहा हूं जिसकी तरफ  सरकार को ध्यान देना चाहिए।

निजी अस्पतालों को मान्यता देने के लिए उच्च स्तरीय कमेटी का गठन करना चाहिए जिसमें संबंधित जिलों के डिप्टी कमिश्नर, मुख्य चिकित्सा अधिकारी व स्वास्थ्य मंत्रालय का संबंधित उच्च स्तरीय अधिकारी इन अस्पतालों का भ्रमण करें तथा मान्यता देने से पहले सुनिश्चित करें कि संबंधित अस्पताल आवश्यक मापदंड पूर्ण करता है। अस्पताल के डाक्टरों व स्टाफ का मरीजों व उनके अभिभावकों के साथ उचित सौहार्दपूर्ण व्यवहार संबंधी साक्षात्कार रखा जाना चाहिए।

वर्ष में कभी भी गठित की गई उच्च स्तरीय कमेटी द्वारा औचक निरीक्षण करना चाहिए तथा जरूरत के अनुसार उनकी मान्यता पर पनुर्विचार करना चाहिए। अस्पताल में उचित स्थान पर एक शिकायत पत्र पेटी लगानी चाहिए जिसमें कोई भी व्यक्ति अस्पताल में मिल रही सुविधाओं तथा डाक्टरों व स्टाफ का मरीजों के साथ व्यवहार संबंधित शिकायत पत्र डाल सके। यदि कोई अस्पताल किसी बात की अवहेलना करता पाया जाता है तो उसकी मेनेजिंग कमेटी को एक-दो बार वार्निंग देने के उपरांत उस अस्पताल की मान्यता रद्द कर देनी चाहिए। जिला स्तरीय सतर्कता कमेटी में किसी रिटायर्ड आईएएस या आईपीएस अधिकारी को सम्मिलित करना चाहिए। डाक्टरों, मेडिकल कंपनियों व कैमिस्टों की आपसी सांठ-गांठ के संबंध में भी समय-समय पर जांच होनी चाहिए। सरकारी डाक्टरों, जिन्हें एनपीए भी दिया जाता है, द्वारा अपने घरों में या किसी निजी अस्पताल में सेवाएं देने के लिए स्थानीय विजीलेंस पुलिस या किसी अन्य संस्था को निगाह रखने के लिए अधिकृत किया जाना चाहिए। सरकारी अस्पतालों में तैनात डाक्टरों के स्थानांतरण हेतु स्थानीय राजनीतिज्ञ के हस्तक्षेप पर रोक लगानी चाहिए। दवा बनाने वाली फार्मा कंपनियों द्वारा दवाइयों की मनमानी कीमत निश्चित करने पर अंकुश लगाना चाहिए। इस तरह हम कह सकते हैं कि डाक्टरों को चाहिए कि वे लालच व धन की होड़ में न पड़ कर लोगों का इलाज हमराज, हमदर्द व हमसफर बनकर करें।

कोविड-19 के लिए जरूरी स्वास्थ्य सुविधाओं और स्वास्थ्यकर्मियों की बढ़ती मांग के कारण अन्य स्वास्थ्य समस्याओं की व्यवस्था पर बहुत मार पड़ी है और इनका संचालन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। डब्ल्यूएचओ ने संक्रामक रोगों के संदर्भ में कहा है कि जब स्वास्थ्य व्यवस्थाओं पर बोझ पड़ता है तो वैक्सीन से रोकी जा सकने वाली एवं अन्य शोधनीय स्थिति से होने वाली मौतों का आंकड़ा भी बहुत बढ़ सकता है। डब्ल्यूएचओ ने इस संदर्भ में एक विशिष्ट उदाहरण पश्चिम-अफ्रीका के तीन देशों में ‘इबोला’ संक्रामक रोग के असर का दिया है। वर्ष 2014-15 में इबोला प्रकोप के दौरान जब स्वास्थ्य सेवाएं लगभग पूरी तरह इस संक्रामक रोग पर केंद्रित हो गईं तो खसरा, मलेरिया, एड्स और तपेदिक से जो अतिरिक्त मौतें हुईं, वे इबोला रोग से होने वाली मौतों से अधिक थीं। यह उदाहरण एक डरावनी संभावना को उजागर करता है और कोविड-19 का सामना करने के दौर में कुछ सावधानियों की जरूरत के लिए चेतावनी भी देता है...

पिछले साल-सवा साल से कोविड-19 संक्रमण दुनियाभर को हलकान किए है, लेकिन क्या इसके चलते दूसरी बीमारियों की तरफ  से मुंह फेरा जा सकता है? क्या आमतौर पर होने वाली बीमारियां कोविड-19 की अफरातफरी में इलाज न मिलने के कारण अपना असर नहीं दिखाएंगी? इस विषय की पड़ताल करना जरूरी हो गया है। इस समय विश्व स्वास्थ्य व्यवस्था का ध्यान कोविड-19 से लोगों को बचाने पर केन्द्रित है। इस स्थिति में एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि इस दौर में क्या स्वास्थ्य व्यवस्थाएं अन्य स्वास्थ्य समस्याओं के प्रति पर्याप्त ध्यान दे पाएंगी? यदि ऐसा नहीं हो सका तो उन करोड़ों मरीजों पर क्या प्रभाव पड़ेगा जिन्हें अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं, बीमारियों या दुर्घटनाओं के कारण तुरंत इलाज की बहुत जरूरत है। इस संदर्भ में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने विशेष दिशा-निर्देश जारी किए थे कि कोविड-19 महामारी का सामना करते हुए विभिन्न देशों को अन्य जरूरी स्वास्थ्य सेवाएं देना जारी रखना चाहिए। ये दिशा-निर्देश सुनने में जितने भी सरल लगें, उनका क्रियान्वयन उतना ही सरल नहीं है, विशेषकर उन स्वास्थ्य व्यवस्थाओं में जो पहले से कमजोर हैं। डब्ल्यूएचओ ने इस दस्तावेज में खुद इंगित किया है कि कोविड-19 महामारी के कारण विश्व स्तर पर अन्य स्वास्थ्य सेवाएं प्रतिकूल प्रभावित हुई हैं।

कोविड-19 के लिए जरूरी स्वास्थ्य सुविधाओं और स्वास्थ्यकर्मियों की बढ़ती मांग के कारण अन्य स्वास्थ्य समस्याओं की व्यवस्था पर बहुत मार पड़ी है और इनका संचालन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। डब्ल्यूएचओ ने संक्रामक रोगों के संदर्भ में कहा है कि जब स्वास्थ्य व्यवस्थाओं पर बोझ पड़ता है तो वैक्सीन से रोकी जा सकने वाली एवं अन्य शोधनीय स्थिति से होने वाली मौतों का आंकड़ा भी बहुत बढ़ सकता है। डब्ल्यूएचओ ने इस संदर्भ में एक विशिष्ट उदाहरण पश्चिम-अफ्रीका के तीन देशों में ‘इबोला’ संक्रामक रोग के असर का दिया है। वर्ष 2014-15 में इबोला प्रकोप के दौरान जब स्वास्थ्य सेवाएं लगभग पूरी तरह इस संक्रामक रोग पर केंद्रित हो गईं तो खसरा, मलेरिया, एड्स और तपेदिक से जो अतिरिक्त (सामान्य से अधिक) मौतें हुईं, वे इबोला रोग से होने वाली मौतों से अधिक थीं।

यह उदाहरण एक डरावनी संभावना को उजागर करता है और कोविड-19 का सामना करने के दौर में कुछ सावधानियों की जरूरत के लिए चेतावनी भी देता है। विश्व में प्रतिवर्ष कुल 5 करोड़ 70 लाख (570 लाख) मौतें होती हैं। यदि स्वास्थ्य व्यवस्थाओं पर पड़ने वाले कोविड-19 के बोझ के कारण अन्य कारणों से होने वाली इन मौतों की संख्या में 5 प्रतिशत की बढ़ोतरी होती है तो इसका मतलब है कुल 28 लाख मौतें। यह आंकड़ा कोविड-19 से होने वाली अनुमानित मौतों से बहुत ज्यादा है। जब हम विश्व स्तर पर मौतों के प्रमुख कारणों पर नजर डालते हैं तो यह और स्पष्ट हो जाता है। ‘इस्केमिक हृदयरोग’ एवं ‘स्ट्रोक’ के कारण वर्ष 2016 में 152 लाख मृत्यु दर्ज की गईं। सभी प्रकार के कैंसर से 96 लाख मौतें हुईं। फेफड़ों के कैंसर (‘ट्रेकिया’ और ‘ब्रोंकस कैंसर’ के साथ) के कारण 17 लाख मौतें हुईं। ‘लोअर श्वसन संक्रमण’ के कारण 30 लाख मौतें हुईं। डायबिटीज के कारण 16 लाख मौतें हुईं। एड्स के कारण 10 लाख मौतें हुईं। (यह समस्त आंकडे़ दुनियाभर के 2016 के हैं।) ये सभी बीमारियां ऐसी हैं जिनमें मरीज को अस्पताल में भर्ती करने, पूरी देखभाल करने एवं नियत समय पर दवा देने जैसे नियमों के सख्त पालन की आवश्यकता होती है। इन बीमारियों में या अन्य कई बीमारियों में तत्काल एवं आपातकालीन उपचार आवश्यकताओं से इंकार किए जाने पर मृत्यु की एवं अपंगता की संभावना बढ़ जाती है। इसी प्रकार कई प्रकार की गंभीर चोटों की स्थिति में भी स्वास्थ्य सेवाओं का न मिलना मृत्यु और अपंगता का कारण बन सकता है। कोविड-19 संकट की गंभीरता के बीच मानसिक रोगियों की देखभाल करने की आवश्यकता और बढ़ गई है। शोधकर्ता आत्महत्या में वृद्धि की आशंका जता रहे हैं। इसके अतिरिक्त एक अन्य महत्त्वपूर्ण स्वास्थ्य व्यवस्था मातृत्व एवं जच्चा-बच्चा है जिसे पूर्व स्तर पर बनाए रखने की आवश्यकता है अन्यथा मातृ एवं बाल मृत्यु दर का आंकड़ा भी बढ़ सकता है।

कोविड-19 की चुनौतियों के लिए नीतियां बनाते समय विभिन्न सरकारों को इन सभी तथ्यों व कारकों का भी ध्यान रखना होगा व सभी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के इलाज की व्यवस्था को बनाए रखना होगा। जहां तक भारत का सवाल है, अभी कोविड की वैक्सीन को लेकर ही रार चल रही है। पर्याप्त मात्रा में वैक्सीन न मिलने के आरोप कई राज्यों ने लगाए हैं। इस स्थिति में जब कोरोना का ही इलाज संभव नहीं हो पा रहा है, जिसकी ओर सबसे ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है, तो अन्य बीमारियों से ग्रस्त लोगों का इलाज किस तरह संभव हो पाएगा। भारत में आम लोगों के लिए कई स्वास्थ्य योजनाएं जरूर चल रही हैं। उन पर पर्याप्त मात्रा में धन भी खर्च किया जा रहा है। सरकारी व निजी अस्पतालों को सुदृढ़ बनाने की पहल की जा रही है। इसके बावजूद स्वास्थ्य के क्षेत्र में कोरोना काल में भी घोटाले सामने आ रहे हैं। इस तरह के भ्रष्टाचार के कारण स्वास्थ्य सेवाओं को लकवा मार गया लगता है। निम्न आय वर्ग वाले लोगों को इलाज करवाना मुश्किल हो गया है। भरपूर प्रयासों के बावजूद सरकारी योजनाएं नाकाफी साबित हो रही हैं। अतः स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार की सख्त जरूरत है। डाक्टर भी अगर अपना फर्ज समझकर रोगियों का ठीक उपचार करेंगे, तभी आम जन तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंच पाएंगी।

                               -(सप्रेस)