Friday, September 25, 2020 09:06 AM

पाठ्यक्रम में साहित्य की मात्रा का औचित्य

अनंत आलोक, मो.- 9418740772

‘साहित्यसंगीतकला विहीनः साक्षात् पशुः पुच्छविषाणहीनः।’ (साहित्य, संगीत और कला से हीन पुरुष साक्षात् पशु ही है जिसके पूंछ और सींग नहीं हैं।) भर्तृहरि के इसी श्लोक से मैं अपनी बात का श्रीगणेश करना चाहता हूं। यद्यपि  इस बात को झुठलाया  नहीं जा सकता कि पशुओं में भी संगीत के प्रति रुचि-अरुचि देखी गई है। हां, साहित्य मानव सभ्यता की पहचान है और रहेगी। हो सकता है पशुओं में भी इस तरह की अपनी कोई संस्कृति-सभ्यता हो, जिसे हम तब तक नहीं जान सकते जब तक कि उनकी भाषा-संस्कृति को पहचान या समझ लेने में असमर्थ हैं।

बहरहाल, हम अपने मूल विषय पर आते हैं। पाठ्यक्रम में साहित्य की मात्रा का क्या औचित्य है, क्यों जरूरी है साहित्य? क्या इसके बिना काम नहीं चल सकता? शिक्षा का मूल उद्देश्य देश के लिए सर्वोत्तम नागरिक तैयार करना है और जैसा कि इस आलेख के आरंभ में दिए गए श्लोक से स्पष्ट होता है कि साहित्य के बिना मनुष्य पशु समान है। अतः पाठ्यक्रम में साहित्य का समावेश नितांत आवश्यक है ताकि भविष्य के नागरिकों को पशु होने से बचाया जा सके।

विद्यालयी पाठ्यक्रम की बात करूं तो मेरा व्यक्तिगत बीस वर्षों का शिक्षण अनुभव कहता है कि गणित, सामाजिक विज्ञान और विज्ञान विषय इस तरह से तैयार किए जाते रहे हैं जो विद्यार्थी को यांत्रिक बनाते हैं। विद्यार्थी इन  विषयों में रुचि ले भी तो कैसे? इन्हें रुचिकर बनाया ही नहीं गया। हिंदी इसलिए रुचिकर है कि उसमें साहित्य का समावेश है। हिंदी से यदि विद्यार्थी भाग रहे हैं तो उनका कोई दोष नहीं।

यहां सारा दोष अध्यापक का है, साहित्य जैसे विषय को यदि हम समाज विज्ञान की तरह बोझिल बना कर पढ़ाएंगे तो विद्यार्थी की अरुचि स्वाभाविक है। दोष केवल अध्यापकों को भी कहां तक दिया जाए, दरअसल उन लोगों ने अपने समय में जैसे पढ़ा है या जिस तरह उन्हें पढ़ाया गया, वैसे ही तो आगे पढ़ाएंगे न! आज आवश्यकता है पाठ्यक्रम के साथ-साथ अध्यापक भी स्वयं को बदले। इस समय हिमाचल ही नहीं, अखिल भारत में एनसीईआरटी का पाठ्यक्रम निर्धारित है। यह पाठ्यक्रम बहुत हद तक रुचिकर बनाया गया है। इस समय के पाठ्यक्रम में गणित को साहित्य के साथ जोड़ा गया है। इतिहास के साथ जोड़ा गया है और वह रुचिकर हो गया है। भले ही बहुत से अध्यापकों ने इसका विरोध किया। उनका कहना था कि गणित को पहले की तरह होना चाहिए था यानी सवाल दिए जाएं, मसलन जमा, घटा, गुणा, भाग और उन्हें हल करते जाओ। यही तो बोरिंग लगता है विद्यार्थी को, इसीलिए विद्यार्थी क्या, बड़े-बड़े भागते हैं गणित से। मैं तो कहूंगा कि इससे बेहतर गणित पढ़ाने का तरीका हो ही नहीं सकता। कितने छात्र हैं जो दसवीं के बाद गणित पढ़ना पसंद करते हैं? ये आप सब जानते हैं।

अगर इसी तरह का गणित उसके बाद भी हो तो कोई गणित से भागे ही नहीं। ऐसे गणित को पढ़ने में हरेक को आनंद आएगा, वह गणित की मूल अवधारणाओं के साथ मूल्य भी ग्रहण करेगा। हालांकि इसे और अधिक साहित्यिक बनाने की आवश्यकता है। इतना साहित्यिक भी कि वह गणित होते हुए भी गणित न लगे। विद्यार्थी की भावनाओं को आजकल के टीवी कार्यक्रमों, नेट, फोन आदि विकास और आधुनिकता के तथाकथित  प्रतीकों ने निचोड़ कर तो पहले ही रखा है, ऊपर से ऐसे विषय, तो विद्यार्थी क्यों न भागे।

आज जरूरत है कि साहित्य का अधिक से अधिक विषयों में समावेश किया जाए। यहां तक कि विश्वविद्यालयों के साहित्येत्तर विषयों  में भी साहित्य को जोड़ा जा सकता है।

मसलन आप इतिहास का पाठ्यक्रम बना रहे हैं तो क्या कठिनाई है कि हम उन्हें तथ्यों के साथ रुचिकर कहानियों में परिवर्तित करें। इतिहास के संस्मरण बनाए जाएं तो इसी तरह राजनीति शास्त्र पढ़ा लीजिए। विषयों में रोचकता के लिए उनमें साहित्यिक प्रयोग हों और अध्यापक आनंद लेते हुए पढ़ाएं। राजनीति को, गणित को, इतिहास को जब अध्यापक साहित्यिक पुट देते आनंद लेकर पढ़ाएंगे तो स्वाभाविक है छात्र-छात्राएं भी उसी आनंद के साथ विषय को बिना किसी अवरोध के ग्रहण करेंगे। उनमें मूल्यों का संचार होगा।

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