Sunday, July 25, 2021 07:40 AM

शांत होती महामारी!

चरित्र हनन की बिसात पर हर बार जब शोशा बिखरता है, तो हिमाचल को यह मालूम हो जाता है कि चुनाव की परिक्रमा में कहीं राजनीतिक अभिलाषा घूम रही है। यही सब बखिया उधेड़ने की फिराक में जयराम सरकार के एक मंत्री के पीछे पड़ा, तो कहीं कोई सकते में नहीं आया, लेकिन सवाल तो बनता है। इसलिए जब पूछा गया, तो मुख्यमंत्री ने मामले के पीछे छिपे भौंडेपन को ललकारते हुए जांच की भट्ठी पर चढ़ाने का ऐलान किया है। इससे यह स्पष्ट हो गया कि इस दुष्प्रचार की फिलहाल कहीं कोई खुजली नहीं और न ही सरकार अपने दामन पर बेवजह शक कर सकती है। हालांकि इससे साफ हो गया कि हिमाचली राजनीति की बदनाम गलियां अपने नजारों को बरकरार रखते हुए, एक बार फिर किसी सरकार को सिफर बनाने का प्रयत्न कर रही हैं। धुंध के बीच आहट चाहे अपने ही कदमों की हो, सफर पर संदेह करना चाहिए। यह इसलिए कि जहां घुप अंधेरे हों, वहां आवाज को माप कर असावधानी से बचा जा सकता है। इसलिए पत्र भले ही गुमनाम हो, लेकिन धुंध में काले साये की तरह मौजूद रहेगा।

 आज की स्थिति में सोशल मीडिया खुद सबसे बड़ा विरोध है, तो इस तरह की चिट्ठियां किन अंगारों पर तपी होंगी। बहरहाल राजनीतिक चरित्रहनन की परंपराओं से क्या कांग्रेस और क्या भाजपा, दोनों ही पार्टियों की सत्ता के दौर गुजरते रहे हैं। कौन नहीं जानता कि अदृश्य खौफ के बंजारे कभी वीडियो रिकार्डिंग, तो कभी गंदे लिफाफों में महिला आचरण को भरते हुए समय-समय के मुख्यमंत्रियों को डसते रहे। पत्र बम कभी छुप के आए, तो कभी इश्तिहार बन कर आए, लेकिन इस मुराद का टीकाकरण हमेशा मीडिया ने ही किया। इस मामले में पहली बार उछलती चिट्ठी को मीडिया के सीधे शब्द नहीं मिले और न ही यह मुद्दा सड़क तक पहुंचा। बेशक यह खत अभी खाक नहीं हुआ और न ही मजमून शांत हुआ है, लेकिन पत्रकारिता के डेस्क पर डाक बन कर पड़ा यह बम पटाखा भी साबित नहीं हुआ। पहली बार कोई सरकार या मुख्यमंत्री इस तरह के प्रहार में, मीडिया के सामने सीधे उत्तर दे रहा है तो यह संदेश भी काफी है। यह इसलिए भी कि राजनीति में मीडिया के बोल अमूमन माप-तोल करने लगे हैं या किस्तों में बंधी मेहनत का एहतिमाम भी होने लगा है। इसी सरकार में सबसे पहले भी पत्र चल चुके हैं और उनकी चपेट में आकर कुछ नेता चुक चुके हैं, लेकिन यहां मांझी खुद आगे आकर भंवर में फंसे एक मंत्री को बचा रहा है, तो इससे कवायद व रिवायत बदल सकती है।

 आश्चर्य यह कि मीडिया में अब खोज खबर के लिए सोशल मीडिया की निरंकुश सत्ता में झांकना पड़ता है, जबकि यह कहा जा सकता है कि वहां न दायित्व बोध है और न ही नैतिकता का कोई मानदंड। यहां सवाल पत्र बमों का नहीं और न ही चरित्र हनन का, फिर भी यह तो सामने आ रहा है कि भाजपा के दालान में अपने ही पर्दे झांक रहे हैं। यह सुगबुगाहट किसी विपक्ष की नहीं, बल्कि दरक रहीं सत्ता की दरी है, जिस पर बैठ कर हर कोई लाभार्थी बनना चाहता है। विडंबना यह है कि पिछले दशकों से सत्ता के भीतर के शह मात ने इस प्रदेश को इसकी वास्तविक मंजिल दिखाई तक नहीं, जबकि वहां तक पहुंचना तो काबिलीयत का प्रश्न है। दुर्भाग्य भी यही है कि जिनके कारण हिमाचल प्रतिष्ठित हुआ या हो रहा है, उनके बजाय वे पूजे जाते हैं जो किसी न किसी तरह सत्ता तक पहुंचे। आश्चर्य यह है कि हिमाचली खेतों के तमाम फूल जिनकी गर्दनों को सहलाते हैं, क्या उस मेहनत का यही श्रम है या हम उन लोगों को कभी सम्मान देंगे जो इसके वास्तविक हकदार हैं। बदलती कार्य संस्कृति या नैतिकता के नए पैमानों में जब स्पष्ट प्रमाण भी कोई हैसियत नहीं रखते, तो किसी गुमनाम पत्र की क्या औकात। अलबत्ता अब तो विरोध के हर्फ मिटाने के लिए नेताओं का कौशल और प्रभाव इतना दबंग हो चुका है कि किसी नियम की चुगली पर भी पीडि़त नागरिक को ही सजा दे सकती है। देश हो या प्रदेश, सत्ता के मंच पर कई नाटक देखने को मिलेंगे, लेकिन जनता का संवाद गूंगा होकर परिस्थितियों का मौन अवलोकन करता रहेगा। न सीधा आंदोलन और न ही सही विरोध।

प्रकृति और समय का पहिया इसी तरह घूमता है। गहरी, काली रात के बाद दिन का सूरज उगता है। उजाले फूटने लगते हैं। निराशा और अवसाद के बाद उम्मीदें जगती हैं। सुख के साथ   दुख भी जुड़ा है। बीमारी का निष्कर्ष मौत है, तो स्वस्थ होना भी तय है। जो पुनर्जन्म को मानते हैं, उनके लिए मौत के मायने हैं-नया जन्म, नया जीवन और नया प्राकृतिक चक्र। कोरोना वायरस की भी यही नियति होगी। हम आज से ही कोविड का आतंक और खौफ ओझल होते देख रहे हैं। संक्रमण की दूसरी लहर को शांत होते महसूस कर रहे हैं। देश और सूबों में तालाबंदी की दुनिया खुल रही है, तो कुदरती चक्र की शाश्वतता के प्रति भी आस्था और विश्वास गहरे हो रहे हैं। यह उल्लास, आनंद और विजय का दौर नहीं है।

 अनुशासन और एहतियात अब भी अपेक्षित हैं। बेशक बीते सप्ताह के दौरान कोरोना के संक्रमित मरीज 32 फीसदी घटे हैं, सक्रिय मरीजों की संख्या करीब 38 लाख से घटकर 10 लाख से भी कम हो चुकी है और संक्रमण की औसत राष्ट्रीय दर 4.25 फीसदी तक लुढ़क आई है। यकीनन मौतों की संख्या 5-6 फीसदी बढ़ी दिख रही है, लेकिन उनमें पीछे छूट गई मौतों की संख्या भी शामिल है। सिर्फ महाराष्ट्र, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, दिल्ली और उप्र में एक अप्रैल के बाद 1.18 लाख से अधिक मौतें दर्ज की गई हैं। ऐसी मौतों का आंकड़ा करीब 2.1 लाख बताया जा रहा है। दक्षिण के चार राज्यों और महाराष्ट्र में रोज़ाना 100 और उससे ज्यादा मौतें दर्ज की जा रही हैं। करीब 71 फीसदी सक्रिय मरीज दक्षिण भारत और महाराष्ट्र तक ही सिमटे हैं। शेष भारत अब राहत महसूस कर रहा है। देश के 12 राज्यों में संक्रमण दर सिर्फ  तीन फीसदी से मात्र 0.30 फीसदी के बीच है। लगभग इतने ही राज्यों में यह दर 5 फीसदी से 13.9 फीसदी के दरमियान है। देश के कुल 718 जिलों में से 421 जिले ऐसे हैं, जहां कोरोना वायरस की संक्रमण दर 5 फीसदी से कम हो चुकी है। 121 जिलों में संक्रमण दर 5-10 फीसदी है और 192 जिलों में 10 फीसदी से ज्यादा संक्रमण अब भी है। अर्थात कोरोना वायरस हमारे बीच अभी मौजूद है। अलबत्ता उसके जानलेवा प्रहार अब थक चुके हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानदंडों पर आकलन करें, तो जिन इलाकों में संक्रमण दर 5 फीसदी से कम हो चुकी है, वहां संक्रमण काबू में है।

 अब वह बेलगाम होकर नहीं फैलेगा। भारत के संदर्भ में यह कोरोना महामारी के शांत होने का दौर है। अब एक दिन में 70,000 से कम मरीज सामने आ रहे हैं। मई में रोज़ाना 4 लाख से अधिक मरीजों का ‘पीक’ हम देख चुके हैं। उसकी तुलना में यह आंकड़ा बेहद कम है। इतना होने के बावजूद कोरोना की तीसरी लहर को लेकर चिंताएं और संभावनाएं जताई जाने लगी हैं। ऐसे आकलन भी सामने आ रहे हैं कि वह लहर बच्चों के लिए खतरनाक साबित हो सकती है। इसका बुनियादी कारण यह है कि बच्चों के लिए दुनिया भर में कोई भी टीका नहीं है। अमरीकी कंपनी फाइज़र ने 12-15 साल के किशोरों के लिए टीका बनाया है, जिसे आपात मंजूरी मिल चुकी है। कंपनी 0-6 साल और 6-17 साल के बच्चों के लिए टीके का परीक्षण कर रही है। कमोबेश छह माह बाद कोई परिणाम सामने होगा। भारत में भी कोवैक्सीन के बच्चों पर परीक्षण जारी हैं। इनमें डॉक्टरों के बच्चे भी शामिल किए गए हैं। एम्स के प्रोफेसर एवं सामुदायिक मेडिसन के विशेषज्ञ डॉ. संजय राय का सवाल है कि जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर  कोई भी साक्ष्य सामने नहीं आया है अथवा परीक्षण का डाटा प्रकाशित नहीं किया गया है, तो किस आधार पर तीसरी लहर को बच्चों के लिए खतरनाक आंका जा सकता है? ऐसे ही सवाल एम्स के निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया समेत कई वरिष्ठ चिकित्सकों ने भी उठाए हैं, लिहाजा डॉक्टरों और बहस के हिस्सेदारों से आग्रह है कि न तो भ्रम फैलाया जाए और न ही भयावहता का माहौल बनाया जाए। फिलहाल हम एक नारकीय दौर से निजात पाने की प्रक्रिया में हैं। बेशक सरकारें तीसरी लहर के मद्देनजर अपनी तैयारियां जरूर दुरुस्त कर लें।