Sunday, July 25, 2021 09:18 AM

‘पंडित जी’ बजाएंगे शंख!

दिल्ली के खत अकसर कोमल नहीं होते और इसीलिए कमोबेश हर सत्ता को पीछे मुड़कर देखना पड़ता है। वर्तमान दौर में भाजपा की राष्ट्रीय सियासत को पढ़ने के लिए उत्तर प्रदेश के योगी आदित्य नाथ के नाम खत के कई अर्थ समझे जाएंगे। इससे पहले उत्तराखंड में उस्तरा चला और भाजपा अपनी झोली में नए मुख्यमंत्री को नगीना बनाकर भी कोरोना काल के अभिशप्त अध्यायों को फनां नहीं कर सकी, तो अब यह स्पष्ट हो रहा है कि तमाम विडंबनाओं के बावजूद उत्तर प्रदेश में योगी रहेंगे। योगी के रहने या जाने से हिमाचल की सियासत के पत्ते न खुलें, लेकिन संघ परिवार के मंथन ने इतना समझ लिया है कि आगामी विधानसभा चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रमुख चेहरा नहीं होंगे। यानी दिल्ली का दस्ती खत लेकर लौटे मुख्यमंत्री के पास साहस, समर्थन और सुविधा के सबसे बड़े अधिकार हैं। इसीलिए उनके लौटते पांव हिमाचल की सतह पर मजबूती से देखे जा रहे हैं यानी वह प्रदेश के सियासी रथ को अब चुनाव की प्रत्येक राह पर खुद ही चलाएंगे।

 आज जबकि भाजपा के शक्तिमान और देश के सबसे बड़े प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ पार्टी और संघ परिवार के किंतु-परंतु में फंसे हैं, तो दूसरी ओर छोटे से हिमाचल से जयराम ठाकुर का ताल्लुक पुरस्कृत होकर लौटा है और इसीलिए वह हर किसी विरोध या साजिश से आंख मिलाकर पूछ सकते हैं,‘कोई शक’। प्रदेश को अब संदेह करने की कोई गुंजाइश नहीं मिलती, लेकिन केंद्रीय प्रश्रय के ताबीज पहनकर अब मुख्यमंत्री को एक ओर प्रदेश को कोरोना से बचाना है, तो दूसरी ओर आर्थिक गतिविधियों के समानांतर विकास के रुके पहिए को भी घुमाना पड़ेगा। दिल्ली की कसरतें यूं तो फरियादी चिट्ठियों से अटी पड़ी हैं, लेकिन इन्हें चुनकर कौन जवाब देगा, इसका इंतजार रहेगा। मुख्यमंत्री खुद से कुछ सवाल पूछ सकते हैं और इनमें सबसे अहम है केंद्रीय प्रश्रय में ताकतवर होना व दिखाई देना। दूसरा यह है कि अपनी टीम के मंत्रियों को काम की दृष्टि से सफल बनते देखना और जनता को दिखाई देना। तीसरा, उपचुनावों की कड़ी में क्षेत्रीय महत्त्वाकांक्षा के फलक पर जननायक बनना और दिखाई देना। राजनीतिक नियुक्तियों में पार्टी के खाली छोर को भरना तथा भरते हुए दिखाई देना।

 वर्तमान सरकार के कद और प्रारूप में विद्यार्थी परिषद की पृष्ठभूमि से अलहदा भाजपा की पृष्ठभूमि का नया कैनवास पैदा करना और यह करते हुए दिखाई देना भी मुख्यमंत्री के सामने प्रश्न होना चाहिए। मुख्यमंत्री हर विभाग के प्रश्नों में मंत्रियों से प्रश्न करें और प्रश्न करते हुए दिखाई दें और इसी कड़ी में मंत्रिमंडल के सबसे ताकतवर मंत्री महेंद्र सिंह के वजन से बड़ा दिखना और दिखाई देना भी इन्हीं कसौटियों का अहम हिस्सा है। प्रदेश की राजनीति में इससे पहले महेंद्र सिंह ने एक बार धूमल सरकार का पलड़ा अपनी ओर झुका लिया था। इसका परिणाम उन्हें तो सफल कर गया, लेकिन धूमल सरकार को रिपीट करने के खिलाफ गया। अब पुनः सशक्त महेंद्र सिंह का दायरा उनकी निजी सफलता को तो पारंगत कर रहा है, लेकिन इस दोष के छींटे सरकार पर पड़ रहे हैं। इसकी पुष्टि हाल ही में प्रशासनिक फेरबदल में हुई है। जिस तरह वरिष्ठ व तेज तर्रार आईएएस अधिकारी आेंकार शर्मा को बागबानी विभाग से जोड़ने के फैसले को महेंद्र सिंह ने कचरे के डिब्बे में डाल दिया, उससे मंत्री का कद तो बढ़ गया, लेकिन सरकार झुक गई या उनकी अहमियत के पीछे छिप गई। इसलिए दिल्ली से लौटे मुख्यमंत्री ने जिस तरह जोशीले संदेश में अपनी अहमियत बताई है, उसी तरह सरकार की अहमियत में उन्हें महेंद्र से ऊपर दिखना है और यह करते हुए दिखाई देना है, वरना अतीत के जख्म सुखराम से धूमल तक आज भी रिसते हैं, इसकी वजह और प्रमाण हैं।

पूर्व केंद्रीय राज्यमंत्री जितिन प्रसाद व्यक्तिगत और जातीय आधार पर ब्राह्मण नेता हैं, लेकिन वह समूचे उप्र में 12-14 फीसदी ब्राह्मण समुदाय के नेता नहीं माने जा सकते। उनके आह्वान भी ब्राह्मणों के समर्थन से किसी की झोली नहीं भर सकते। कमोबेश उनकी हैसियत वह नहीं है, जो उप्र में गोविंद वल्लभ पंत, हेमवती नंदन बहुगुणा, सुचेता कृपलानी और नारायण दत्त तिवारी सरीखे कद्दावर ब्राह्मण नेताओं, मुख्यमंत्रियों की होती थी, लेकिन जितिन प्रसाद कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में शामिल हुए हैं, लिहाजा कांग्रेस के लिए झटका तो साबित होंगे। वह ब्राह्मण चेहरा और आवाज़ तो हैं ही। गौरतलब यह है कि कांग्रेस में अधिकतर युवा नेता, जिन्हें राहुल गांधी का बेहद करीबी माना जाता था और इसीलिए उन्हें छोटी उम्र में मंत्री पद से भी नवाजा गया था, बारी-बारी कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में आ रहे हैं, तो यह चिंतन-योग्य सवाल तो है। आखिर उनका मोहभंग क्यों होता जा रहा है? वर्ष 2016-20 के दौरान 170 से अधिक विधायकों ने कांग्रेस के डूबते जहाज को छोड़ा है।

 उनमें न जाने कितने युवा नेता होंगे? असम के मौजूदा मुख्यमंत्री हिमंता बिस्व सरमा और मप्र में ज्योतिरादित्य सिंधिया से लेकर उप्र में जितिन प्रसाद तक सभी कांग्रेस से ‘भाजपाई’ हुए हैं। सिंधिया के कारण तो मप्र की कमलनाथ सरकार गिरी। इससे बड़ा धक्का क्या हो सकता है कांग्रेस के लिए? अब राजस्थान में सचिन पायलट, मुंबई में मिलिंद देवड़ा, पंजाब कांग्रेस में कई चेहरे और हरियाणा में दीपेंद्र हुड्डा आदि युवा नेता असंतोष और अलगाव की दहलीज़ पर मौजूद हैं। जी-23 समूह के नेता अलग हैं, जिनका हिस्सा जितिन और दीपेंद्र भी रहे हैं। बहरहाल एक लंबी सूची है, जिसमें एसएम कृष्णा, नारायण राणे, विजय बहुगुणा (सभी पूर्व मुख्यमंत्री) समेत राधाकृष्ण विखे पाटिल, चौ. बीरेंद्र सिंह, जगदंबिका पाल, संजय सिंह और टॉम वडक्कन सरीखे बुनियादी कांग्रेसियों के नाम हैं। जितिन प्रसाद के पुरखों की तीन पीढि़यां भी 60 साल से अधिक समय तक ‘कांग्रेसी’ रही हैं। जितिन के पिता जितेंद्र प्रसाद दो प्रधानमंत्रियों-राजीव गांधी और पीवी नरसिंहराव-के राजनीतिक सलाहकार रहे थे। केंद्र में कैबिनेट मंत्री भी रहे। कांग्रेस अध्यक्ष पद पर सोनिया गांधी के चयन का विरोध किया और उनके खिलाफ चुनाव लड़े, तो बगावत की दबी-छिपी चिंगारी महसूस होने लगी थी। बहरहाल अब युवा पीढ़ी के तौर पर जितिन प्रसाद भाजपा के लिए शंख बजाएंगे और ब्राह्मणों को भाजपा के खेमे में लाने की  शुरुआत करेंगे, तो कांग्रेस की बची-खुची हिस्सेदारी भी लुट सकती है। यकीनन उप्र में ‘क्षत्रिय बनाम ब्राह्मण’ समीकरणों से पंडित भाजपा से खिन्न हैं और भाजपा को ब्राह्मण-विरोधी करार दिया जाता रहा है, लेकिन अब जितिन उल्टी दिशा में प्रचार करेंगे। कुछ तो प्रभाव पड़ेगा।

 लिहाजा राशिद अल्वी सरीखे कांग्रेस नेता ने ज़मीनी नेताओं के संग ‘आत्मचिंतन’ की जरूरत की बात कही है। बेशक जितिन कांग्रेस के टिकट पर दो बार लोकसभा सांसद चुने गए, केंद्र सरकार के कई मंत्रालयों में राज्यमंत्री भी बनाए गए, पार्टी में बहुत कुछ मिला, लेकिन ऐसा कुछ भी होगा, जो उन्हें अप्रासंगिक लगा होगा, राजनीतिक स्तर पर करियर की बर्बादी महसूस हुई होगी और पार्टी के लगातार डूबने के आसार पुख्ता लग रहे होंगे, नतीजतन उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया। अब गांधी परिवार और कांग्रेस आलाकमान के शेष चेहरे हाथ मसलने और अफसोस करने अथवा जितिन को ‘कचरा’ करार देने के अलावा और क्या कर सकते हैं? उप्र में मार्च 2022 से पहले ही विधानसभा चुनाव होने हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का नेतृत्व ही रहेगा। साफ है कि भाजपा हिंदू पत्ता ज्यादा चलेगी! उसके लिए ब्राह्मणों की लामबंदी बेहद जरूरी है। हालांकि भाजपा में कई स्तरों पर ‘पंडितों’ का प्रतिनिधित्व है, फिर भी जितिन को पार्टी पूरी तरह इस्तेमाल करेगी। उन्हें विधान परिषद में भेजने का विचार हुआ है, लेकिन जितिन घूम-घूम कर शंख बजाएंगे और पंडितों को एकजुट करेंगे कि कांग्रेस छोड़ कर युवा चेहरे भाजपा में आ रहे हैं, तो कोई महत्त्वपूर्ण बात है। उन्होंने भाजपा को ही एकमात्र ‘राष्ट्रीय पार्टी’ माना है, जबकि कांग्रेस को पारिवारिक और क्षेत्रीय पार्टी का दर्जा दिया है। बहरहाल ऐसे आरोप स्वाभाविक हैं। जितिन के आह्वान कितने कारगर और भाजपोन्मुखी साबित होंगे, यह चुनाव से पहले ही स्पष्ट होने लगेगा।