Saturday, September 19, 2020 09:59 PM

पर्वतीय पैरवी का खाका

हिमाचल चाहे तो जल को वास्तव में अपनी शक्ति का आधार बना सकता है, लेकिन इस प्राकृतिक संसाधन का न सही इस्तेमाल हुआ और न ही इसकी कीमत राज्य वसूल सका। इस अपार शक्ति के साथ हिमाचल का सम्मान, आत्मनिर्भरता और भविष्य की कल्पना जुड़ सकती है, बशर्ते इसके लिए एक स्थायी खाका बने। हमारे लिए यह समझना जरूरी है कि प्रदेश में करीब सत्तर फीसदी जल मानसून से भरता है और इसी आधार पर नदी व्यवस्था तथा पर्वतीय जल की निकासी को नए सिरे से रेखांकित नहीं किया, तो प्रादेशिक प्रगति का एक बड़ा मूल्य चुकाना पड़ेगा।

हिमालयी क्षेत्र के पांच लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल के सहारे देश अपना एक चौथाई जल संसाधन प्राप्त करता है, जबकि 10 पर्वतीय राज्यों में देश की मात्र छह फीसदी आबादी ही निवास करती है। हिमाचल के संदर्भ में प्रमुख पांच नदियों में बहता पानी अब तक केवल यात्रा करता रहा, जबकि इनकी सहायक नदियों, नालों या खड्डों के व्यवहार से होते नुकसान को आंका ही नहीं गया। हिमाचल के माध्यम से देश की जलव्यवस्था में किए जा रहे योगदान का मूल्यांकन कभी नहीं हुआ, फिर भी नीति आयोग द्वारा तीन साल पूर्व घोषित कार्यदल से यह उम्मीद है कि पर्वतीय राज्यों के चहुंमुखी विकास की योजनाएं नई पैरवी तैयार करेंगी।

इसी परिप्रेक्ष्य में केंद्र के जल शक्ति मंत्रालय से मिली 7922 करोड़ योजनाओं का संदर्भ जुड़ता है। कुल दस परियोजनाओं में छह हासिल करके हिमाचल जिन सुर्खियों में आया, उनमें रेणुका बांध के निर्माण को ही 6947 करोड़ मिल रहे हैं जबकि धर्मपुर, कांगड़ा, सिरमौर, मंडी तथा रोहडू के नदी, नालों व खड्डों के बाढ़ नियंत्रण तथा सिंचाई परियोजनाओं के लिए 975 करोड़ मिल रहे हैं। हिमालय के पर्यावरणीय अध्ययन व संरक्षण को समर्पित राष्ट्रीय आयोग के माध्यम से पर्वतीय असंतुलन के सुधार पर राष्ट्रीय चिंतन अवश्य शुरू हुआ है। पर्यावरणीय सुरक्षा के नए मानदंड और वर्षा एवं जल के प्राकृतिक सर्किल का बेहतर उपयोग करने के लिए सर्वप्रथम पहाड़ी जीवन को मर्यादित व जलाधिकारों से परिपूर्ण करने की आवश्यकता है।

जलवायु परिवर्तन के बीच पिघलते ग्लेशियरों का रिसाव तथा पांच करोड़ पहाड़ी किसानों के जीवन चक्र को समझने के लिए जल संसाधनों का संरक्षण अति आवश्यक हो जाता है। स्वां तटीकरण परियोजना पर होती रही सियासत को नजरअंदाज कर दें, तो भी हिमाचली चेतना में अब पानी के प्रति सरोकार कुंद हो रहे हैं। पांच प्रमुख नदियों के लिए जल लाते नाले व खड्डें, जब तक अपने आवरण में तटीकरण की अनिवार्यता समाहित नहीं करतीं, जल निकासी का प्राकृतिक विध्वंस जारी रहेगा। पिछले कुछ सालों से अप्रत्याशित बारिश या सूखे का आलम, बादलों का फटना या बाढ़ का आना, वास्तव में बारिश व बाढ़ नियंत्रण का नया मसौदा पेश कर रहा है। शिमला जैसे शहर की अमानत में पलती अश्विनी खड्ड की प्रवृत्ति ही समझें, तो यह जल निकासी के बजाय शहरी गंदगी को ढो रही है। कई प्राकृतिक स्रोतों या जल निकासी के मार्ग पर खड़ी इमारतों की बुनियाद दरअसल शहरी विकास के खतरनाक अंजाम को न्योता दे रही है। कभी धूमल सरकार ने वाटर हार्वेस्टिंग का जिस तरह बीड़ा उठाया था, वह आज दिखाई नहीं देता। वाटर शैड परियोजनाओं की देखभाल न के बराबर है।

सबसे खतरनाक मंजर अव्यवस्थित रूप से फैलते शहरों के आसपास देखा जा सकता है। श्रीनयनादेवी, दियोटसिद्ध, चिंतपूर्णी व ज्वालामुखी जैसे धार्मिक स्थलों का विकास हो या कुल्लू-चंबा और शिमला में विकसित हो रही विद्युत परियोजनाओं को लेकर पैदा हो रहे खतरे हों, हिमाचल का पर्यावरणीय आंचल पूरी तरह असुरक्षित है। ऐसे में हिमाचल को अपनी समस्त खड्डों व नालों का तीव्रता से तटीकरण करने के अलावा प्राकृतिक कूहलों को पुनर्जीवित करना होगा, ताकि बरसाती पानी का निकास हो जाए। जलापूर्ति तथा विद्युत आपूर्ति के ढांचागत विकास को यह सुनिश्चित करना होगा कि इनके कारण बरसाती खतरे न बढ़ें, जबकि सड़कों पर भी स्थायी रूप से जल निकासी का स्थायी ढांचा विकसित करना होगा। प्रदेश को ईको टूरिज्म के साथ-साथ पर्यटक आगमन का नियमन करना होगा। कृषि, बागबानी तथा वानिकी को परंपरागत तथा वैज्ञानिक ढंग से नया आधार देने की जरूरत रहेगी।

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