Tuesday, June 15, 2021 12:55 PM

चुनाव बाद का दर्द

आज इस महामारी ने हमारी आंखें खोल दी हैं। देश की अर्थव्यवस्था, रोजगार और अस्मिता बचाने का शायद आत्मनिर्भरता यानी ‘स्वदेशी’ ही एक सही रास्ता है। इसलिए हमें स्वदेशी के विचार को मजबूत करना होगा...

हाल ही में अमरीकी प्रशासन द्वारा इस महामारी में जनता के सुरक्षा कवच के नाते भारत के वैक्सीन उत्पादन के लिए आवश्यक कच्चे माल की आपूर्ति रोकने और उसके पास बेकार पड़ी वैक्सीन की चार करोड़ खुराकों के स्टॉक को भारत और अन्य देशों को भेजने पर रोक लगाने वाले फैसले की अमरीका सहित दुनिया भर में आलोचना हुई। गौरतलब है कि अमरीका के बाइडेन प्रशासन ने पहले यह फैसला लिया था कि ‘पहले अमरीका’ की नीति के तहत वैक्सीन के कच्चे माल और वैक्सीन को भारत में नहीं भेजेंगे। हालांकि अब अमरीका ने वैक्सीन के लिए कच्चा माल भेजने का निर्णय ले लिया है, इससे यह सबक जरूर मिलता है कि हम आवश्यक वस्तुओं के लिए दूसरे मुल्कों पर निर्भर नहीं रह सकते। उल्लेखनीय बात यह है कि इस वैक्सीन के स्टॉक की अमरीका को फिलहाल कोई जरूरत नहीं है और न ही कच्चे माल की अमरीका में कोई कमी है, जिससे उसे भारत को देने में उसे कोई नुकसान होगा। ऐसे में अमरीका के इस फैसले से न केवल अमरीका की असंवेदनशीलता उजागर होती है, बल्कि हमें आत्मनिर्भर होने की प्रेरणा भी मिलती है। वह देश जिन्होंने दुनिया को एक गांव है और आपसी व्यापार और सहकार ही जनता के कल्याण के लिए जरूरी होने का दंभ भरते हुए हमें भूमंडलीकरण की ओर धकेला, वही देश बिना वजह (कहा जा सकता है कि भारत को परेशान करने के लिए) हमारी आवश्यकता की चीजों को बेवजह रोकने की कोशिश कर रहे हैं। चीन से आए वायरस ने पिछले एक साल से भी ज्यादा समय से पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया है। एक ओर स्वास्थ्य संकट और उपकरणों का अभाव, संक्रमण के डर से मानसिक तनाव और मौत का तांडव, तो दूसरी ओर अर्थव्यवस्था में भारी गिरावट तथा बेरोजगारी के कारण अमीर-गरीब और मध्यम वर्ग के सामान्य नागरिकों पर कहीं थोड़ा तो कहीं ज्यादा असर हुआ है।

 जहां तक बीमारी के असर की बात है, वहां भी सभी वर्ग प्रभावित हुए हैं। लेकिन दूसरी ओर दुनिया की बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां हैं- चाहे वे दवा कंपनियां हों, कृषि कंपनियां हों, ई-कॉमर्स कंपनियां हों, सोशल मीडिया कंपनियां हों या बड़ी टेक-कंपनियां, सभी के लाभ और व्यवसाय में लगातार पहले से ज्यादा वृद्धि हुई है। समझना होगा कि दुनिया के मुट्ठी भर अरबपतियों (वे लोग जिनके पास अरबों डॉलर की परिसंपत्तियों है) के पास ही उपरोक्त इन सभी कंपनियों का स्वामित्व है। पिछले 30 वर्षों का भी यदि इतिहास देखा जाए तो भूमंडलीकरण के इस युग में सबसे ज्यादा लाभ यदि किसी को हुआ है तो भी इन्हीं बहुराष्ट्रीय कंपनियों को इसका लाभ हुआ है। इन कंपनियों के व्यवसाय और परिसंपत्तियां कई गुना बढ़ गई हैं। अधिकांश बौद्धिक संपदा अधिकार हो अथवा अन्य परिसंपत्तियां, इन कंपनियों के हाथों में केंद्रित होती जा रही हैं। असमानता की बात करें तो दुनिया भर में आय और संपत्ति की असमानताएं भी बढ़ी हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियों की बात करें तो अधिकांश बड़ी कंपनियां अमरीका, यूरोप और जापान में हैं और अब चीन में भी इन कंपनियों का प्रादुर्भाव हुआ है। भूमंडलीकरण के लाभों का लालच दिखाकर विकासशील देशों को मुक्त व्यापार और विदेशी पूंजी के भंवर में फंसाया गया। कहा गया कि मुक्त व्यापार से प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, जिससे हमारे उद्योग-धंधे और खेती पनपेगी। लेकिन इसका असर एकदम उल्टा हुआ। चीन के डब्ल्यूटीओ में प्रवेश के बाद उसने नियमों को धत्ता दिखाते हुए, गलत तरीके से दुनिया भर के देशों में अपना माल डंप करना शुरू कर दिया। नतीजतन अमरीका, यूरोप, भारत समेत अनेक देशों के घरेलू उद्योग दम तोड़ने लगे और उनका चीन के साथ व्यापार घाटा लगातार बढ़ने लगा। भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा 2000-01 में 0.2 अरब डॉलर से बढ़ता हुआ 2017-18 तक 63 अरब डॉलर यानी 315 गुना बढ़ गया। साथ ही साथ भारत हर जरूरी या गैर जरूरी वस्तुओं के लिए चीन पर निर्भर हो गया।

 इलेक्ट्रॉनिक्स, टेलीकॉम, एपीआई समेत तमाम ऑर्गेनिक और इनऑर्गेनिक कैमिकल्स, मशीनरी, स्टील, खिलौने, साइकिल समेत सभी चीजें चीन से आने लगी थीं। नरेंद्र मोदी द्वारा 2014 में सत्ता सूत्र संभालने के बाद ‘मेक इन इंडिया’ का नारा आया। कुछ प्रयास भी हुए, लेकिन चीन से आयात बदस्तूर जारी रहे। यह सही है कि कई चीनी और अन्य विदेशी कंपनियों ने मेक इन इंडिया के तहत भारत में उत्पादन केंद्र शुरू कर दिए, जिसके कारण व्यापार घाटा थोड़ा कम जरूर हुआ। लेकिन मार्च 2020 में महामारी के बाद देश को चीन पर अत्यधिक निर्भरता की गलती का एहसास पूरी तरह से हो गया। यह भी सही है कि उससे भी चार-पांच वर्ष पहले से ही चीन की विस्तारवादी नीति और सीमाओं के अतिक्रमण के कारण देश की जनता ने चीनी वस्तुओं का बहिष्कार शुरू कर दिया था। सरकारी प्रयासों और जनता के चीन के प्रति आक्रोश के बावजूद चीन से व्यापार घाटा 2019-20 तक मात्र 48 अरब डालर तक ही घट सका। फिर मार्च 2020 से आए कोरोना ने तो नीति निर्माताओं की आंखें खोल दी। पीपीई किट्स, मास्क, टेस्टिंग किट्स, वेंटिलेटर और अन्य जरूरी मेडिकल उपकरणों की कमी ने तो जैसे देश को झकझोर कर रख दिया था। ऐसे में पूरे देश की एक आवाज थी कि देश को आत्मनिर्भर बनाने की जरूरत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आह्वान किया कि हमारा लक्ष्य आत्मनिर्भर का है और उसके लिए देश में सभी को जुटना होगा। बड़े उद्योग, छोटे उद्योग या सामान्य जन सभी को आह्वान किया गया। उत्तर प्रदेश सरकार ने ‘एक जिला-एक उत्पाद’ का नारा दिया, तो हरियाणा के जन संगठनों ने ‘आत्मनिर्भर हरियाणा’ का। गांवों की आत्मनिर्भरता की बात होने लगी है। गांवों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए वहां सामान्य खेती-बाड़ी के अलावा मुर्गीपालन, पशुपालन, डेयरी, मशरूम उत्पादन, बांस उत्पादन, मछली पालन, बागवानी, खाद्य प्रसंस्करण, ग्रामीण उद्योग, हस्तकला-हथकरघा समेत सभी प्रकार के उपायों द्वारा गांव को आत्मनिर्भर बनाने की योजनाओं पर विचार होने लगा है।

 उसका परिणाम यह निकला कि आज हम पीपीई किट्स, मास्क, वेंटिलेटर, चिकित्सा उपकरण ही नहीं, कई अन्य आवश्यक सामग्री का देश में ही उत्पादन करने लगे हैं। यानी हमने दुनिया को दिखा दिया कि आत्मनिर्भरता की नीति के जरिए न केवल हम अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकते हैं, बल्कि दुनिया के लिए भी राहत का सामान पहुंचा सकते हैं। आज भारत दुनिया को पीपीई किट्स, टेस्टिंग किट्स, वेंटिलेटर, दवाइयां ही नहीं वैक्सीन भी पहुंचा रहा है। दुनिया भर में भारत की भूरि-भूरि प्रशंसा भी हो रही है। आज वक्त है कि हम विचार करें कि क्या हुआ है कि चीनी सामान की डंपिंग के कारण हमारे औद्योगिक विकास पर विराम लग गया। गलती कहां हुई? क्यों जब भारत के उद्योग चीनी सामानों के आक्रमण के कारण दम तोड़ रहे तो उस समय की सरकार आयात शुल्क और अधिक घटाकर उस प्रक्रिया को और तेज करने का काम कर रही थी? क्यों हमारे अर्थशास्त्री उपभोक्ता को सस्ता सामान मिलने के नाम पर आंखें मूंदकर अपने उद्योगों के नष्ट होने का तमाशा देख रहे थे? लेकिन आज इस महामारी ने हमारी आंखें खोल दी हैं। देश की अर्थव्यवस्था, रोजगार और अस्मिता बचाने का शायद आत्मनिर्भरता यानी ‘स्वदेशी’ ही एक सही रास्ता है।

डा. अश्विनी महाजन

कालेज प्रोफेसर

चुनाव का बखेड़ा भी बड़ा अजीब है। शुरू होंगे तो कार्य फैला रहता है-निपट जाए तो जीतने वाला खुश और हारने वाला दुःखी। सारे घोषणा पत्र और आश्वासन मटियामेट, रह जाता है तो सिर्फ चंद लोगों का रोना-पीटना। चुनाव बाद जो लोग सर्वाधिक रोते पाए जाते हैं, उनमें हैं-माइकवाला, जीपें किराए पर देने वाला, ढाबे वाला तथा तोरणद्वार सजाने वाला। पिछले दिनों जो चुनाव निपटे हैं, उनमें से एक चुनाव क्षेत्र का दौरा किया तो मैंने हालात एकदम जीवंत पाए। एक कस्बे से गुजरा तो बंदनवारें फटी हुई जार-जार रो रही थीं। लगा मानो कह रही हों कि अब उनका महत्त्व कुछ नहीं रह गया है-इसलिए कि हारने वाला और जीतने वाला दोनों उसे छोड़ गए हैं। तोरणद्वार उजड़े-उजड़े हो उदासी में मुंह लटकाए अपनी दुर्दशा की कथा आप कह रहे थे। जीपें एकदम छकड़ा होकर धूल से ढकी पंचर हुई पड़ी थीं। जो जीप कल तक फर्राटे से दौड़ रही थी-उनकी गति को जैसे किसी ने कील दिया है।

 पेट्रोल-पम्पवाला अपना बिल लिए घूम रहा है तो जीतने वाला परमिट रद्द करने की धमकी दे रहा है। मैंने एक मतदाता से कहा-‘कहो लाला कैसी रही?’ बात सुनकर माथा पीटकर बोला-‘क्या बताएं भाई साहब, नेताजी ने बड़े-बड़े आश्वासन दिए थे। कल-कारखाने खोलने, रोजगार के अवसर बढ़ाने तथा गरीबी दूर हटाने की बड़ी-बड़ी बातें कह गए थे, परंतु सारी बातें दिवास्वप्न हो गई हैं। नेताजी मिलते नहीं और मिलते हैं तो पहचानते नहीं, पहचानते हैं तो आश्वासनों से मुकरते हैं।’ ‘तो फिर चुनाव से तुम्हें क्या फायदा हुआ?’ मैंने पूछा। मतदाता बोला-‘सिर्फ तीन फायदे हुए-पहला मारामारी में कम्बल मार लिया, दूसरा, पांच-सात बार नशा-पता हो गया, तथा तीसरा, दो-चार बार ढाबे में दाल-रोटी खा ली।’ ‘तो फिर क्या बात है, तुम्हारे तो वोट कीमत वसूल हो गई-अब तो शांत रहो।’ मैंने कहा।

 उत्तर में वह बोला-‘अजी भाई जी, वोट की भी कोई कीमत होती है, वह तो अमूल्य है अमूल्य।’ ‘जिसका कोई मूल्य नहीं होता, वह चीज मुफ्त की होती है और मुफ्त की चीज का जो भी मिल जाए, बड़ी बात है। तुम्हें वोट का मूल्य मिल चुका है।’ ‘अजी हम तो कार्यकर्त्ता हैं-इसलिए फिर भी ये चीजें हाथ लग गई वरना फकत मतदाता को तो उपहार में उबासियां मिली हैं।’ वह बोला। लगे हाथ मैं थोड़ी देर में उस ढाबे वाले के यहां जा धमका-जहां चंद रोज पहले लंगर लगा करता था। सिर पर हाथ लगाए रोने ही वाला था कि मैंने पूछा-‘क्यों क्या बात है?’ ढाबे वाले ने कहा-‘पांच हजार रुपए बाकी रह गए, हारने वाले पर। अब कहता है मेरा तो दिवाला ही पिट गया। चाहे तो मुझे रख ले अपने यहां नौकर।’

पूरन सरमा

स्वतंत्र लेखक