Sunday, March 07, 2021 10:32 PM

सेवानिवृत्ति के बाद : अजय पाराशर लेखक, धर्मशाला से हैं

समाज में बढ़ता नशा पंचायतों की गैर जिम्मेदारी वाली कार्यप्रणाली का नतीजा है। जनता को न्याय मुहैया करवाना केवलमात्र पुलिस का काम नहीं है। पंचायतों को भी पुलिस के समान अधिकार मिले हुए हैं, मगर उनकी पालना कौन करे? पंचायत प्रतिनिधियों में मनोबल की कमी ज्यादा है। नतीजतन गांवों में एकता, भाईचारा, सद्भाव, अपनापन खत्म होकर जंगलराज बनता जा रहा है। आज पंचायत का छोटा सा विवाद भी पुलिस चौकी और पुलिस थानों में जाकर खत्म होता है...

पंचायत चुनावों में अपनी जाति के प्रत्याशी की पराजय की वजह से नाक न कट जाए, इस अवधारणा के कारण जातिवाद और क्षेत्रवाद का बोलबाला अधिक है। मौजूदा समय में लोग राजनीतिक दलों की विचारधारा को दरकिनार करके अपने समुदाय के प्रत्याशियों के सिर सेहरा बांधने में मशगूल हैं। आखिर मतदाता भी बढ़ते प्रचार-प्रसार से प्रभावित होकर गलत उम्मीदवारों का कई बार चयन कर बैठते हैं। इस महादंगल में खड़े प्रत्याशियों की बजाय उनके आकाओं की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी हुई है। विधानसभा क्षेत्र में जिस राजनीतिक दल के प्रत्याशी अधिक विजयी बनेंगे, उतनी ही साख उनके आकाओं की भी पार्टी के समक्ष बनेगी। कुल मिलाकर कहा जाए तो आगामी विधानसभा चुनावों की रूपरेखा भी इस महादंगल के बाद बननी तय है।  कहने को यह चुनाव राजनीतिक दलों के निशान के आधार पर नहीं होते, मगर एक वार्ड सदस्य तक भी मतदाता उसकी पार्टी देखकर ही चुनते हैं। पंचायत चुनाव भी अगर जातिवाद के आधार पर किए जाते रहेंगे तो क्या भविष्य में कभी आरक्षण खत्म किए जाने की कामना की जा सकती है? आजादी के सात दशक बीत जाने के बाद भी हम लोग प्रत्याशियों की योग्यता की बजाय उनकी जाति को प्राथमिकता देंगे तो समाज में कभी एकता आएगी क्या? इसी वजह से गरीब लोग भी अपने राजनीतिक मत का उपयोग कर सकें, आरक्षण युक्त चुनावी रोस्टर सरकार ने तैयार किया है।

इस चुनावी रोस्टर का विरोध करने वाले ही जातिवाद को बढ़ावा दिए जा रहे हैं। आरक्षण आर्थिक आधार पर किए जाने को लेकर आए दिन लोगों में आपसी बहसबाजी को सुना जा सकता है। मगर चुनावों में जातिवाद ही नहीं, क्षेत्रवाद के आधार पर मतदाता अपने राजनीतिक मत का उपयोग करते रहे हैं। चुनावों में अपनी नैया पार लगाने के चक्कर में बड़े पदों पर अपना भाग्य आजमाने वाले प्रत्याशी निचले स्तर के लगभग सभी प्रत्याशियों के साथ गोटियां फिट करके रखते हैं। राजनीति में अनाड़ी प्रत्याशी अक्सर धोखा खाकर अयोग्य उम्मीदवार को चुन लेते हैं। अक्सर देखा जाता है कि एक बैल्ट के मतदाता क्षेत्रवाद के आधार पर बिना सोच-समझकर अपने मत का उपयोग कर डालते हैं। बेशक अन्य बैल्ट के प्रत्याशी कितने ही ऊर्जावान और अधिक सूझबूझ रखने वाले क्यों न हों, उन्हें नकार दिया जाता है।

पंचायत प्रधान कैसा हो, इस विषय को लेकर भी जनता में खूब आपसी संवाद होता रहा है। पंचायतों का स्वरूप ही नहीं बदला, उनकी कार्यप्रणाली में भी खूब अंतर आ गया है। सरकारें पंचायती राज को सशक्त बनाए जाने के लिए सदैव प्रयासरत रहती आई हैं। मगर सच्चाई यही कि पंचायत प्रतिनिधियों का फोकस केवलमात्र सरकार से मिलने वाली फंडिंग पर ही अधिक रहता है। सामाजिक सरोकार से उनका कोई नाता नहीं है। कुछेक पंचायत प्रधानों की मोहर उस आलू की तरह ड्राइंग बनने के लिए इस्तेमाल होती है जिसे कहीं भी बिना सोचे-समझे दाग दिया जाता है। ऐसे भी प्रधान मौजूद हैं जो लोगों का आपसी विवाद खत्म किए जाने की बजाय उन्हें आपस में उलझाकर अपना वोट बैंक बनाकर रखते हैं। सार्वजनिक स्थानों पर मदिरा पीने वाले, जुआ खेलने और गैर कानूनी कार्यों में संलिप्त रहने वाले पंचायत प्रतिनिधि लोकतंत्र की सफलता के लिए खतरा हैं। पंचायतों को जितना विकसित किया गया, उतना ही अधिक भ्रष्टाचार बढ़कर पंचायत प्रतिनिधियों को गैर-जिम्मेदार बनाता गया। एक समय ऐसा था कि गांवों में पीपल के नीचे चौपाल लगता था। पंचायत प्रतिनिधि जनता की समस्याएं सुनकर उनका समाधान भी निकालते थे। उस समय पंचायती राज को सशक्त बनाए जाने के दावे भी इतने नहीं किए जाते थे, जबकि पंचायत प्रतिनिधि अपने अधिकारों का सही उपयोग करते थे। उस समय सरपंच ही सर्वेसर्वा हुआ करता था। पंजाब राज्य में अभी भी ऐसी परंपरा है। पंचायत प्रतिनिधियों का आदेश ही जनता के लिए कानून मात्र बन जाता था। आज जनता के चुने प्रतिनिधियों को भरी ग्राम सभा की बैठकों में कोई गालियां निकालकर भी चलता बने, ऐसे लोगों के खिलाफ  कोई कार्रवाई नहीं हो पाती है। अधिकतर पंचायतें राजनीति का अखाड़ा बनकर कई गुटों में बंटकर एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाकर पांच वर्ष पूरे करती हैं। क्या ऐसे हालात में पंचायती राज के सशक्त होने की कभी कल्पना की जा सकती है? पूर्व वर्षों में बिना पंचायत प्रधान को सूचित किए पुलिस किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करके नहीं ले जा सकती थी।

आज बाहरी राज्य की पुलिस तक भी किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करके चलती बने, पंचायत प्रतिनिधियों को कोई जानकारी नहीं होती है। समाज में बढ़ता नशा पंचायतों की गैर जिम्मेदारी वाली कार्यप्रणाली का नतीजा है। जनता को न्याय मुहैया करवाना केवलमात्र पुलिस का काम नहीं है। पंचायतों को भी पुलिस के समान अधिकार मिले हुए हैं, मगर उनकी पालना कौन करे? पंचायत प्रतिनिधियों में मनोबल की कमी ज्यादा है। नतीजतन गांवों में एकता, भाईचारा, सद्भाव, अपनापन खत्म होकर जंगलराज बनता जा रहा है। आज पंचायत का छोटा सा विवाद भी पुलिस चौकी और पुलिस थानों में जाकर खत्म होता है। पंचायत प्रतिनिधियों में इतनी क्षमता नहीं कि किसी विवाद को अपने स्तर पर निपटाया जाए। पंचायत प्रतिनिधियों का चुनाव जब जाति, क्षेत्रवाद और अयोग्यता के आधार पर किया जाएगा तो फिर उनकी कौन सुनेगा? प्रदेश सरकार लोकतंत्र को सफल बनाने के लिए इन चुनावों पर करोड़ों रुपए खर्च करने वाली है। मतदाताओं को अपनी सूझबूझ बरतते हुए योग्य, ईमानदार, मेहनती, मृदुभाषी और मिलनसार पंचायत प्रतिनिधियों का चयन करना चाहिए। पंचायतों में तभी विकास हो पाएगा।

पिछले लगभग एक वर्ष से पूरे विश्व को कोरोना महामारी ने बुरी तरह से घेर रखा है। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा। भारत में एक करोड़ से भी अधिक लोग इससे संक्रमित हो चुके हैं और डेढ़ लाख से अधिक लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। वर्ष 2020 में इस महामारी ने देश के हर नागरिक को कहीं न कहीं परेशान करके रखा। नए वर्ष के शुरू में ही देश के वैज्ञानिकों की कड़ी मेहनत रंग लाई और इस महामारी से बचने के लिए वैक्सीन तैयार कर ली गई। इतने बड़े देश में हर व्यक्ति के टीकाकरण के लिए सरकार ने भी बड़े पैमाने पर तैयारी कर ली है, जिसे चरणबद्ध तरीके से देश के हर नागरिक तक पहुंचा जाएगा। इस टीकाकरण महाभियान का शुभारंभ देश के प्रधानमंत्री ने 16 जनवरी को कर दिया है। इस  अभियान के पहले चरण में तीन करोड़ स्वास्थ्य कर्मचारी (डॉक्टर, नर्स, पैरामेडिकल और स्वास्थ्य से जुड़े कर्मचारी) तथा फ्रंटलाइन वर्कर्स (पुलिस कर्मचारी, पैरामिलिट्री फोर्सेज, फ़ौज व सेनेटाइज़ैशन वर्कर्स) को यह वैक्सीन लगाई जाएगी। इसके दूसरे चरण में 50 साल से ऊपर उम्र वाले और 50 साल से कम उम्र वाले उन लोगों को जो किसी न किसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं, को वैक्सीन लगाई जाएगी। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार ऐसे लोगों की संख्या 27 करोड़ के लगभग है।

इस महामारी में सबसे अधिक प्रभावित लोगों में स्कूल व कॉलेज जाने वाले विद्यार्थी हैं, जोकि पिछले लगभग एक वर्ष से अपने घरों में ही बंद हैं। अब विभिन्न राज्यों की सरकारें स्कूलों व कॉलेजों को खोलने का निर्णय ले रही हैं। हमारे देश में शिक्षा के क्षेत्र में कोई बहुत बढि़या आधारभूत ढांचा नहीं है तथा कोविड-19 के सभी दिशा-निर्देशों का पालन करने के लिए भी कई प्रकार की दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा। जब स्कूल व कॉलेज खुलेंगे तब हर जगह तथा बसों में भीड़ भी होगी तथा कोरोना के फैलने का खतरा और भी बढ़ जाएगा। किसी एक भी शिक्षा संस्थान में अगर एक भी कोरोना संक्रमित पाया जाएगा तो अभिभावकों में डर की भावना पैदा होना स्वाभाविक है। सरकार को चाहिए कि वैक्सीन के तीसरे दौर में स्कूल व कॉलेज जाने वाले छात्रों व अध्यापकों को प्राथमिकता दे ताकि कोरोना के दोबारा फैलने के खतरे से बचा जा सके और शिक्षण संस्थान सुचारू रूप से चल सकें। ऐसा करके ही हम कोरोना वायरस को फैलने से रोक सकते हैं। साथ ही यह भी जरूरी है कि वैक्सीन आ जाने के कारण लोग लापरवाह न हों, वे पहले की तरह ऐहतियात बरतते रहें।

जैसे-जैसे प्रो. चौपट नाथ की रिटायरमेंट का समय नज़दीक आ रहा था, उनके माथे पर चिंता की लकीरें बढ़ती जा रही थीं। वह अपनी तमाम पारिवारिक चिंताओं से मुक्त होकर, बुज़ुर्गों के शब्दों में कहें तो ‘गंगा नहा चुके थे’। सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें भारी-भरकम पेंशन भी मिलने वाली थी। फिर भी उन्हें चिंता सताए जा रही थी कि रिटायरमेंट के बाद करेंगे क्या? उनका तो विषय भी ऐसा था कि अगर कॉलेज के बाहर कहीं पढ़ाना चाहते तो अपने सिवा दूजा नसीब न होता। संडे वाले दिन जब वह पंडित जॉन अली से मिलने उनके घर पहुंचे तो देखा कि वह घर में पोचा लगा रहे हैं। पंडिताईन आराम से धूप में बैठकर अ़खबार पढ़ रही हैं। प्रो. चौपट तंज़ कसते हुए बोले, ‘‘पंडित जी, भाभी जी की सेवा हो रही है।’’ पंडित जी ने कहा, ‘‘अमां यार! ़िफलहाल तो रिटायरमेंट की तैयारी हो रही है। तीन दशक से सरकारी नौकरी में हूं। काम करने की आदत रही नहीं। रिटायरमेंट के बाद समय गुज़ारने के लिए कुछ तो करना पड़ेगा।’’ प्रो. चौपट ने बताया कि वह भी इसी बारे बात करने आए थे। इस पर पंडित जी बोले, ‘‘मेरी तो आज तक यह समझ में नहीं आया कि जब राजनीति में आदमी तिरंगे में लिपटने तक देश की सेवा कर सकता है तो सरकारी नौकरी में क्यों नहीं? फिर हम तो तिरंगा भी नहीं मांगते। वैसे सेवानिवृत्ति के बाद आदमी को बाबू भैया के रोल में ढल कर, तीनों ऋणों की तरह अपनी धर्मपत्नी के ऋण से मुक्त होने के लिए उसकी सेवा में जुट जाना चाहिए। बिल तो आनलाईन भरे जा सकते हैं, लेकिन रसोई, झाड़ू-बर्तन-कपड़े जैसे काम स्वयं निपटाने पर, पेंशन में बरकत बनी रहेगी। चूंकि सरकारी नौकरी में रीढ़ अत्यंत लचीली बन जाती है; ऐसे में उम्र-दराज़ होने पर भी आदमी नाती-पोतों के लिए घोड़ा बन सकता है। अगर घर में बा़ग-ब़गीचे या खेती-बाड़ी है तो रत्तू माली की भूमिका निभाई जा सकती है।

इससे घर में चार पैसे ज़्यादा आने से इज़्ज़त पहले जैसी बनी रहेगी। अगर घर में मंदिर है तो बगुला भगत बन कर, सुबह-शाम बेसुरे, अशुद्ध मंत्रोच्चारण के अलावा आरती गायन कर सकते हैं। अगर आदमी मीठी-मीठी गप्पें मारने में माहिर हैं तो धार्मिक गुरू बन कर करोड़ों की संपत्ति बनाई जा सकती है। अगर परपीड़क और पड़ोसियों की ज़मीन पर नज़र रखने वाला है तो पड़ोसियों के ़िखला़फ झूठे मु़कद्दमे दायर कर सकता है। इससे हिंदुओं के पुनर्जन्म के सिद्धांत को समझने में मदद मिलेगी। अपने दुश्मनों को सबक सिखाने के लिए किसी अ़खबार या समाचार-पत्रिका में ़कलमघसीटू पत्रकार बन सकता है या अपना फेसबुकिया या वेब चैनल चला सकता है। उम्र भर की दिमा़गी खुजलाहट मिटाने के लिए सोशल मीडिया पर कहानियां, कविताएं और शेर-गीदड़ पेलने के अलावा अपनी किताबें छपा सकता है। सरकारी सेवा के दौरान अगर गली-मुहल्ले के छुटभैया नेता ट्रांसफर के नाम पर धमकाते रहे हैं तो उन्हीं के पद-चिन्हों पर चलते हुए किसी रंगे सियार का लोमड़ बना जा सकता है। समाज सेवा के नाम पर अपने गली-मुहल्ले से कोई चुनाव लड़कर अपनी औ़कात पता लगा सकता है या पोस्ट ऑफिस, बैंक या अस्पतालों में लोगों के फॉर्म भर सकता है। अतः समय रहते सेवानिवृत्ति के बाद की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अभी से तैयारी शुरू कर देनी चाहिए।’’