Sunday, November 28, 2021 04:15 PM

पोस्टर बदल गया

शहर का सबसे बड़ा पोस्टर इसी स्थान पर लगता है, बल्कि कई बार शहर इसी पोस्टर के आगे इतना झुक जाता है जैसे रेंग रहा हो। पोस्टरों के आगे हम भारतीय जितना रेंग रहे हैं, उसे देखते हुए पोस्टर का महत्त्व अब देश से भी बड़ा होने लगा है। यानी अब केवल पोस्टर ही बता पाता है कि जनता के लिए देश क्या कर रहा है। वह वर्षों से शहर के सबसे ऊंचे पोस्टर के ठीक नीचे बैठता है। पोस्टर बदल जाते हैं, लेकिन उसका जीवन वैसे का वैसा ही रहता है। पोस्टर उसे पृष्ठभूमि देता है और इस तरह वह हर सरकार के कारनामों के साथ जुड़ा रहता है। बड़े से बड़े संदेश उसकी पृष्ठभूमि से जुड़ते हैं और कई बार उसे यकीन हो जाता है कि देश को समझने के लिए बस एक न एक पोस्टर चाहिए। एक दिन सुबह उसने देखा कि कोई पोस्टर पर खड़े व्यक्तित्व के मुंह पर कालिख पोत गया है। वह सोचने लगा कि पोस्टर पर अगर बड़ा दिखना आसान है, तो उसके ऊपर कालिख पोतना और भी सरल है। पहली बार वह पोस्टर पर देश के सबसे बड़े नेता का चेहरा देखकर डर गया था। सारे नारे कालिख में छिप गए थे। अचानक वहां पुलिस पहुंच गई और उससे पूछताछ होने लगी, ‘कब से यहां हो?’ यह सुनते ही जैसे उसे राष्ट्रीयता का पदक मिल गया हो, इसलिए कह दिया, ‘बहुत पहले से, पोस्टर लगने की शुरुआत उसके यहां बैठे-बैठे ही हुई है।

 पहले पोस्टर नहीं होते थे, तब कालिख भी नहीं होती थी।’ यह सुनते ही पुलिस को प्रमाण मिल गया था। उसने कालिख का जिक्र किया था, इसलिए उस पर देशद्रोह का मुकदमा हो गया। पोस्टर के आगे बैठा व्यक्ति अगर इसकी रक्षा नहीं कर सकता, तो यह देश का सबसे बड़ा द्रोह है। उसे पकड़ कर जेल मेें ठूंस दिया गया। वहां सारे ही कैदी देशद्रोही कैटेगरी के थे। किसी ने पोस्टर फाड़ा था, तो किसी ने पोस्टर से असहमति जताई थी। एक ने तो घर में ही कहा था कि पोस्टर पर दिखाई दे रहा राष्ट्रीय नेता उसे पसंद नहीं कि उसके युवा बेटे ने शिकायत कर दी। सारे कैदी खुन्नस में थे कि मात्र एक नेता के पोस्टर के कारण वे देशद्रोही हो गए। उनका वश चले तो वे देश को पोस्टर से बाहर निकाल के ही दम लेंगे, लेकिन यह संभव नहीं था। अब तो हर घर में कोई न कोई पोस्टर है या उसे चस्पां किया जा चुका है। हर कैदी ने अपने घर में उगी दीवारों पर अनूठे पोस्टर देखे हैं। इन पोस्टरों ने मुफ्त का राशन, मुफ्त की दवाई व मुफ्त की स्कूली वर्दी तक का इंतजाम किया है। अब तो हर कोई नए पोस्टर का इंतजार करता है, न जाने कब कौनसा पोस्टर क्या कह जाए। कौनसा पोस्टर हमें गरीब या अति गरीब बनाकर लाभ दे जाए। हर पोस्टर हमसे दिवाली खेलते-खेलते कभी-कभी आतिशबाजी कर देता है।

 देशद्रोह के मामले में कैद तक पहुंचे लोगों ने अपने सामने सिर्फ पोस्टर को फटते देखा था। यही जुर्म है कि पोस्टर में देश की इज्जत बचाना अब शर्त बन गया है। बड़े पोस्टर के फटने पर देशद्रोही करार हुआ व्यक्ति सोच रहा था कि आखिर वह कालिख से पहले और कालिख के बिना पोस्टर पर विकृत दिखते रहे व्यक्ति को बचाता कैसे। वह इसी पोस्टर के कारण लोगों की गालियों का गवाह बनता रहा था, लेकिन यकीन था कि पूर्व की तरह यह भी बदल जाएगा। उसकी सांत्वना हमेशा पोस्टर के साथ रही है, क्योंकि एक ही जगह पर टंगे-टंगे उसका रंग निकल जाता है। आज का पोस्टर, कल की गाली बन जाता है। वे सब हैरान थे कि पोस्टर से असहमत होना कितना बड़ा जुर्म भी हो सकता है। अंत में उन्होंने कानून के सामने हल्फनामा देकर स्वीकार कर लिया कि पोस्टर में प्रकाशित नेताओं की छवि को बचाना भी उनकी यानी आम नागरिक की जिम्मेदारी रहेगी।

निर्मल असो

स्वतंत्र लेखक