Friday, October 30, 2020 05:04 AM

प्रशासन की सैरगाह

तमाम स्थानांतरणों के बीच हिमाचल में नौकरशाही के साथ राज्य की तस्वीर का मुआयना लाजिमी है। यह इसलिए भी कि जिस तरह केंद्र की मोदी सरकार ब्यूरोक्रेसी को नाप रही है, उसे देखते हुए हिमाचल में प्रशासनिक सुधारों की बड़ी गुंजाइश दिखाई देती है। यह इसलिए भी कि राज्य ने कद से बड़ी शुमारी में अफसरशाही को जन्म नहीं दिया, बल्कि पास पोस कर इतना विस्तार दे रखा है कि अब इसके औचित्य पर सोचना होगा। हिमाचल से कहीं कम आईएएस अधिकारी जम्मू, कश्मीर व लद्दाख में हैं। करीब तीन साल पहले तक हिमाचल में 115 आईएएस अधिकारी थे, जबकि तत्कालीन जम्मू-कश्मीर में यह संख्या 91 तक थी। उसी दौर में उत्तर प्रदेश के पास 515, बिहार 243 और तेलंगाना में 130 आईएएस अधिकारी थे। अब जबकि स्वीकृत पदों की संख्या 147 है, हिमाचल में 153 आईएएस अधिकारी कार्यरत हैं। इसके अलावा एचएएस 228, आईपीएस 94, एचपीएस 189, आईएफएस 114 और एचएफएस की तादाद 160 तक पहुंच गई है। हिमाचल में धीरे-धीरे अफसरशाही की पकड़ में सरकारों की उदारता बढ़ती गई और पुलिस महकमे में ही चार डीआईजी, पांच आईजी तथा तीन डीजीपी हैं जबकि आईपीएच व पीडब्ल्यूडी में मुख्य अभियंताओं की संख्या पंद्रह तथा वन विभाग के मुख्य अरण्यपालों जैसे वरिष्ठ पदों की तादाद तेरह हो चुकी है।

बेशक प्रशासनिक क्षमता विकास की निरंतर प्रक्रिया है और इसके तहत सुशासन का एक आवश्यक ढांचा निर्धारित होता है, लेकिन उत्तर प्रदेश की 23 करोड़ जनता के लिए 515 आईएएस अधिकारियों के मुकाबले हिमाचल के 68 लाख लोगों के लिए वर्तमान अधिकारी संख्या तार्किक व बुनियादी तौर पर अधिक है। सरकार का आकार बढ़ाने के लिए अगर कर्ज बढ़ रहा है, तो इस दिशा में गंभीरता  से सोचना होगा। हिमाचल में केवल सभी तरह के प्रशासनिक अधिकारियों में ही दो से अढ़ाई हजार की शुमारी कई प्रश्न खड़े करती है। ऐसे में हिमाचल को केंद्र सरकार की तर्ज पर इस अमले के प्रदर्शन का मूल्यांकन करना होगा। इतना ही नहीं केंद्र सरकार में पचास साल की उम्र तक पहुंची सारी अफसरशाही को खंगाला जा रहा है ताकि दागदार अधिकारियों से किनारा किया जा सके। हिमाचल के दागी अधिकारियों की सूची में कलंकित पन्ने आज भी चस्पां हैं, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। केंद्र ने अपने कर्मयोगी मिशन के जरिए अधिकतम सुशासन की दिशा में कम से कम सरकार के आकार का जो खाका खींचा है, उसके परिप्रेक्ष्य में हिमाचल को इन दिशा-निर्देशों का उल्लंघन समझना होगा। मात्र 68 लाख की जनसंख्या के लिए सरकार का आकार और सुशासन की दरकार में ‘टॉप हैवी एडमिनिस्ट्रेशन’ की वर्तमान रिवायत पर अंकुश नहीं लगाया, तो यह प्रदेश प्रशासन की सैरगाह ही बना रहेगा।

देखना यह भी होगा कि सरकार खुद का आकार घटाने की इच्छाशक्ति रखती है या केंद्र के पद चिन्ह हिमाचल में अर्थहीन ही रहेंगे। हालांकि कर्मयोगी मिशन के तहत ब्यूरोक्रेसी को तकनीक, सृजनशील, व्यावसायिक तथा प्रो-एक्टिव बनाने के लिए एक परिषद का गठन होना है, जिसमें नेतृत्व केंद्रीय मंत्री, राज्यों के मुख्यमंत्री व कार्मिक विशेषज्ञ इसके सदस्य होंगे, लेकिन इससे पूर्व हिमाचल को अपने आधार का मूल्यांकन करना होगा। बेशक मुख्यमंत्री के रूप में जयराम ठाकुर ने नए विचारों को अहमियत देते हुए ब्यूरोक्रेसी को आगे रखा है, लेकिन शिमला केंद्रित सोच को  पूरे प्रदेश की संवेदना से जोड़ना बाकी है। खास तौर पर राज्य सचिवालय की दीवारों के भीतर कई तरह की ग्रंथियां तथा वर्षों से चढ़ी परतें जब तक अलग नहीं की जातीं, हर सरकार के लिए प्रशासनिक भंवर उभरते रहेंगे। ऐसे में मुख्यमंत्री ने अगर नए विचारों के मौजूदा दौर को प्रदेश के हर छोर के लिए उपयोगी बनाना है, तो सुशासन के भीतर पल रहे जरूरत से अधिक आकार के प्रशासनिक ढांचे को सीमित तथा पूरे प्रदेश में रेखांकित करना होगा।

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